Thursday, 18 December 2014

जहां जन्म रणवीर लिए


जहां जन्म रणवीर लिए , किए प्राण देश के नाम
भारत माँ के उस मिट्टी के ,कण कण को प्रणाम

त्याग दिए सुख चैन स्वयं , चल पड़े वीर जवान
छीन लिए आजादी लड़कर , दिए प्राण बलिदान

चलो चलें हम सब मिलकर, पदचिन्हों पर उनके
देश रत्न को करें समर्पित, कुछ श्रद्धा सुमन चुनके

अहो भाग्य हमारा , हम सब हैं भारत के वासी
रक्षण करना मातृ भूमि का , हो जाए चाहे फांसी

करो प्रण अब नहीं लड़ेंगे , आपस में ही भिड़कर
अमन चैन की करो स्थापना , रहो सभी मिलजुलकर

आजाद हिन्द आजादी , हम सब का अभिमान है
सबसे ऊंचा रहे तिरंगा , जो भारत माँ की शान है
***********************
© Copyright Kiran singh

Friday, 12 December 2014

तेरी मधुर स्मृतियों में खोकर , तुम संग प्रिय दिन रैन जिए हैं
उर भाव लहर बेचैन स्पन्दन  ,  कलम किनारा थाम लिए हैं
तेरे नाम की पाती प्रियतम ,  कुछ गीत लिखे  कुछ छंद गढ़े
अनुभूतियों में रस श्रॄंगार भर ,  प्रेम कविता का नाम दिए हैं 
************************
© Copyright Kiran singh

Sunday, 30 November 2014

प्रश्न पत्र

! !!!!!!!!!!! प्रश्न पत्र !!!!!!!!!!!
*********************
प्रश्न पत्र को प्रश्न पत्र ही रहने दो 
प्रश्न पत्र पर उत्तर कैसे लिख दोगे 
हस्ती लकीरें क्या कहती हैं छोड़ो भी
उसने क्या लिखा है कैसे पढ़ लोगे 

अंत तक कौतुहल कहानी में रहने दो 
क्या रहस्य है कैसे तुम समझ लोगे 
स्थिर रह उल्झन मे थोड़ा  धीरज रख 
उलझे धागों को झट कैसे सुलझा लोगे 

स्वयं से स्वयं का कारो साक्षात्कार 
वर्ना तुम औरों को कैसे समझोगे 
कर्म करो निज जीवन साकार करो
फल की इच्छा ऐसे कैसे कर लोगे
***********************
© Copyright Kiran singh

घनघोर घटाएं

!!!!! घनघोर घटाएं!!!!!
****************

घिर आई घनघोर घटाएं
कजरी गाने लगी हवाएं
रिमझिम बूँदें बरसने लगी
तोड़ कर सभी वर्जनाएं

झूम झूम और चूम चूम
नृत्य करने लगी लताएं
भूल कर तपती दोपहरी
शीतलहर की यातनाएं

पता है उन्हें सुख दुख के
आने जाने की परम्पराएं
बहुत रखा है धीर धरा ने
आस किरण मन में उगाए

चलो हम प्रकृति से सीखें
सकारात्मक कुछ कलाएं
और जी लें जिन्दगी को
भूलकर अपनी  ब्यथाएं
…………………………………………...
© copyright @ Kiran singh

Monday, 24 November 2014

चूड़ियाँ


कितनी मधुर होती हैं
इनकी की खनकार
जिनके मधुर संगीत
मंत्रमुग्ध कर
खींच लेती हैं अपनी ओर
सजना के
मन की डोर
तभी तो
खूबसूरत अहसासों के
के सम्मोहन में
फंस फँसकर
हम स्त्रियाँ
पहन लेतीं हैं
हथकड़ी
खूबसूरत
जो इतराती हुई सी
करती हैं
कलाइयों में
खनक - खनक कर
अठखेलियाँ
ये सुन्दर सुन्दर
नागों से जड़ी रंगबिरंगी
ठगिन
कांच की चूड़ियाँ

©किरण सिंह

सखि काहे

सखि काहे तोरी सुधि आए

स्मृति वन में मन हिरण
करत रहत विचरण
सब जन बीच रहूँ हम तबहूँ
एकल मन होई जाए

सखि काहे तोरी सुधि आए

राग गीत संगीत बजत हैं
किछु नहीं मन भाए
सब जन झूम झुम नाचत हैं
म्हारो मन नाहीं हरसाए

सखि काहे तोरी सुधि आए

करत रहत सब हंसी ठिठोली
म्हारो मन नैहर जाए
माटी चूल्ह माटी को बासन
खेलत ब्यजन पकाए

सखि काहे तोरी सुधि आए

छाती पीर पाती में  लिखूं तब
नयन नीर झरि जाए
काहे न ईश कृपा करि हम पर
सखि तोसे देत मिलाए

सखि काहे तोरी सुधि आए
*************************
©Copyright Kiran singh

Saturday, 22 November 2014

नव वर्ष आयो

[[ नव वर्ष आयो ]]
*******************
मतवाली सखी ज्यों भंग पिए
नव वर्ष आयो नव रंग लिए
अलसाए जिया मन भाए पिया
अलसाई किरण सकुचात जिए

धरणी ठिठुरे नभ से टपके
ओस बूंद हरस अँखियन से झरे
जुड़ जाए धरा मदमस्त हवा
ले आई खुशी मन पीर हरे

सुरभित पुष्पित लतिकाएं सजी
चित चंचल चलत उमंग लिए
इठलाती चले बलखाती चले
उर में अपने वर वरण किए

प्रण कर निज से कुछ वचन लिए
चन्द्र तारे से रात श्रृंगार किए
दूलहिन जैसे पिया मिलन को
हांथो में वरमाल लिए

मनमीत विषय नव गीत लिखे
नव साज सजे मन गाए प्रिये
मिटे पिप्सा मन आस जगे
नव वर्ष के संग नचाए लिए
*************************
© Copyright Kiran singh

Friday, 21 November 2014

लेकर स्मृतियों को

लेकर स्मृतियों को मन में
*****************
चलो पथिक निज पथ में
लेकर स्मृतियों को मन में

पलकों में सुन्दर स्वप्न लिए
मन में कर अपने प्रण लिए
विश्वास दिये को कर प्रज्वलित
प्रकाश लिए तम घन में
लेकर स्मृतियों को मन में

बहुत पथिक पथ में मिलेंगे
कुछ दर्द तो कुछ हमदर्द बनेंगे
नयनों में बस जाता केई
कोई ओझल हो जाता क्षण में
लेकर स्मृतियों को मन में

उर राज करे मल्लिका सी
मुख बन्द किए कलिका सी
खिल जाते मन भाव कुमुद
देखते  नयन दर्पण में
लेकर स्मृतियों को मन में

उर भाव जुड़े कविता की तरह
बहे निर्झर सरिता की तरह
लहर लेखनी चूम कदम
फहराती सत्य ध्वज रण में
लेकर स्मृतियों को मन में

लेकर स्मृतियों को मन में
********************
copyright  Kiran singh

Friday, 14 November 2014

दूसरा पहलू

दूसरा पहलू
********
एक तरफ समाज की यह बिडम्बना है जहाँ  दहेज आदि जैसे समस्याओं को लेकर महिलाएँ ससुराल वालों के द्वारा  तरह- तरह से घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं , सिसकती है उनकी जिन्दगी, और कभी कभी तो क्रूरता इतनी चरम पर होती है कि छिन जाती है स्वतंत्रता और सरल भावनाओं के साथ साथ उनकी जिन्दगी भी ! कड़े कानून तो बने हैं फिर भी स्त्रियों के साथ क्रूरता बढती ही जा रही है ! बढता जा रहा है उनके साथ दिनोदिन अत्याचार! नहीं सुरक्षित हैं उनके अधिकार !.चाहे जितना भी नारी सशक्तिकरण की बातें क्यों न हम कर ले ! इसका मुख्य कारण है नारी स्वयं ही स्वयं के लिए लड़ना नहीं चाहती क्योंकि उसे तो बचपन से ही त्याग, बलिदान, सहनशीलता, लज्जा आदि का पाठ पढ़ाया जाता है ! हर दुख सहकर, अपनी इच्छाओं का गला घोटकर, घर परिवार की खुशियों में खुश होने का दावा या फिर अभिनय करना ही उनकी नीयति बन जाती है! उसका कोई अपना घर नहीं होता ! मायके में ससुराल के उलाहने तथा ससुराल में मायके के उलाहने हमेशा ही उसे ही सुनना पड़ता है जबकि इसमें उसका कोई दोष भी नहीं होता फिर भी वह मायके और ससुराल के उलाहने और ताने सुनकर  अपने में ही समेट लेती है  दोनों ही घर की इज्ज़त की रक्षा करना उसका पहला कर्म और धर्म बन जाता है क्योंकि कि वह दोनों घर को ही वह अपना मानती है!

वहीं समाज का एक दूसरा सत्य पहलू यह भी है कि , बहुओं और बहुओं के मायके वालों के द्वारा भी उनके ससुराल वाले अत्यंत पीडित हैं जिसपर ध्यान कम ही लोगों का जा पाता है क्योंकि महिलाएँ कमजोर हैं तो उन्हें समाज की सहानुभूति ज्यादा मिल जाती है! जो कानूनी हथियार महिलाओं को सुरक्षा के लिए प्रदान किया गया है उसी कानूनी हथियार का दुरुपयोग करके ससुराल वालों को तबाह करके रखी हुई हैं ! झूठा मुकदमा दर्ज कराकर , धज्जियां उड़ा रही हैं ससुराल वालों की इज्जत प्रतिष्ठा की.......! शायद ऐसी ही स्त्रियों के लिए महाकवि तुलसीदास ने लिखा होगा ...!
ढोल गंवार शुद्र पशु नारी ]
ये सब तारन के अधिकारी ]]
ऐसी ही स्त्रियों की वजह से ,समस्त स्त्री जाति को प्रतारणा सहनी पडती है !
कुछ के तो घर टूट जाते हैं !
और कुछ लोग घर न टूटे , इस डर से अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए अपनी बहुओं के प्रत्येक मांग को मानने को मजबूर हो  जाते हैं !
इसमें सीधे साधे , शरीफ और संस्कारी लडके अपनी माँ , बहन और पत्नी के बीच पिस से जाते हैं ..! और सबसे मजबूरी उनकी यह होती है , कि वो अपने दुखों की गाथा किसी को सुना भी नहीं सकते  क्यों कि पुरूष जो हैं ! .कौन सुनेगा उनकी दुखों की गाथा ....? कौन समझेगा उनके दुविधाओं की परिभाषा  ?
माँ और पत्नी दोनों ही उनकी अति प्रिय होती हैं..! किसी एक को भी छोडना उन्हें अधूरा कर देता है !.यदि लडके के माता पिता समझदार एवं सामर्थ्यवान होते हैं , तो ऐसी स्थिति में दे देते हैं अपने अरमानों की बलि देकर कर देते हैं अलग अपने कलेजे के टुकड़े को , टूट जाता है घर ,  चकनाचूर हो जाता है माता - पिता का हृदय !
कुछ महिलाओं का तो मुकदमा करने का उद्देश्य ही ससुराल वालों को डरा धमाका कर धन लेने का होता है जिसमें उनके माता पिता का सहयोग होता है ! वो लोग अपनी बेटियों का इस्तेमाल सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की तरह करते हैं , और समाज का सहनुभुति भी प्राप्त कर लेते हैं !
चूंकि बेटे वाले हैं तो समाज की निगाहें भी उनमें ही दोष ढूढती है इसलिये सहानुभूति तो बेटी वालों को ही मिलेगी ऊपर से कानून का भय अलग !
यह सब देखकर तो मन बार-बार प्रश्न करता है कि आखिर क्यों बनती हैं महिलाएं नाइका से खलनायिका ?
क्यों करती हैं विध्वंस ?
क्यों नहीं बहू बेटी बन पाती ?
क्यों नहीं अपना पाती हैं वे ससुराल के रिश्तों को  ?
क्यों बनती है घरों को तोड़ने का कारण ?
क्यों नहीं छोड़ पाती ईर्ष्या द्वेष जैसे शत्रुओं को ?
क्यों सिर्फअधिकारो का भान रहता है और कर्तव्यों का नहीं ?
इस प्रश्न का उत्तर देना होगा!
नारी तुम शक्ति हो , सॄजन हो पूजनीय हो , सहनशील हो मत छोडों ईश्वर के द्वारा प्राप्त अपने मूल गुणों को !नहीं है तुम्हारे जितना सहनशक्ति पुरुषों में इसे मानो , पुरुष नहीं कर सकते तुम्हारे जितना त्याग यह जानो ! पुरुष नहीं दे पाएंगे  पीढी दर पीढी वो संस्कार जो तुम्हारी धरोहर हैं ! मत छोडो अपनी संस्कृति और सभ्यता!
माना कि अबतक तुम्हारे साथ नाइन्साफी होती रही है , बहुत सहा है तुमने, बहुत दिया है तुमनें. सींचा है तुमने निस्वार्थ भाव से परिवार , समाज  तथा सम्पूर्ण सॄष्टि को चलो माना ! अब समाज की विचारधाराएं बदल रही है ..! तुम भी पूर्वाग्रहों से ग्रसित मत हो! मत लो बदला नहीं तो तबाह हो जाएगा सम्पूर्ण जगत, विनाश हो जाएगा  सम्पूर्ण सॄष्टि का !
महाकवि जयशंकर प्रशाद ने तुम्हारे लिए कितनी सुन्दर पंक्तियों लिखी हैं
नारी तुम केवल श्रद्धा हो , विश्वास रजत नभ पग तल में
पीयूष श्रोत सी बहा करो , जीवन के सुन्दर समतल में ]]
************************
© किरण सिंह

खग मन

!!!!!!! खग मन !!!!!!!
****************
चंचल यह खग मन  
कागज की कस्ती सी 
करता स्मृति में विचरण  
निर्झर बहती दी सी 
बनाते थे बालू से घर
बूनते थे सुन्दर स्वप्न
करके आँखें अपनी बन्द
भविष्य निधि में भरते थे रत्न
कहाँ गये वो पल
प्रश्न उठता है रह रह कर
खुश हो जाता है मन
अतीत का चित्र देख सुन्दर
धीरे धीरे बढ़े हैं पग
पथ ले जाए अब जहां
सोचता है मन कभी
कि अतीत लौटेगा कहाँ 
……………………………………………
© copyright @ Kiran singh
,

Wednesday, 12 November 2014

विश्व धरा

विश्व धरा
***********
विश्व धरा देखता
मधुकर मन
खिल रहे हैं पुष्प गगन
बरस रहा आंगन

ओढकर दूल्हन धरा
रंग बिरंगी चुनर
विजयी मुद्रा सुन्दरी सी
ज्यों स्वर्ग से सुन्दर

अमॄत कलश लिए गंगा
बह रही निर्झर
कर कल कल छल छल
बढ़ रही  निरन्तर

जो धो रही थी पाप
उसे शापित किए हो तुम
जो स्वच्छ पावन थी
उसे दूषित किए हो तुम

संतान कैसे हो तुझे
संवेदना नहीं है क्या
पीर सहकर चुप रही तो
उसे वेदना नहीं है क्या

काटकर वन उपवन
निर्जीव हो किए
सुन्दरी प्रकृति चुप है
अश्रु को पिए

प्रकृति के प्रकोप से
प्रलय न हो जाए कहीं
मत करो अत्याचार तुम
नर हो पिशाच नहीं
***********************
© copyright Kiran singh

ईश्वर तुम

ईश्वर तुम अन्तर्यामी हो
*****************
सच
ईश्वर तुम अन्तर्यामी हो
तभी तो  प्रेम ,मेमता ,
करुणा ,त्याग ,
के साथ साथ
शक्ति
और सहनशक्ति भी
भरकर
भेज दिया
बलिदानों की बेदी पर
बसुन्धरा की गोद में
बिठाकर
जहाँ
सीता ने भी दिया था
अग्नि परीक्षण
***********************
© copyright Kiran singh

Thursday, 6 November 2014

नारी तुम

!!!!!!! नारी तुम !!!!!!!
****************
नारी तुम माधुर्य हो इस 
सृष्टि की सुन्दर रचना का 
स्वर से सज्जित रागिनी हो 
विश्व वीणा के सप्तक का 

शक्ति तुम्ही हो लक्ष्मी तुम्ही हो 
सर्व गुण सम्पन्न शारदा    
श्रद्धा स्नेह, करुणा , ममता हो 
तुम्ही प्रिया , प्रियंवदा

सॄजन तुम्ही से है सॄष्टि का
तुम्ही श्रद्धा तुम्ही अर्चना
घर मंदिर की ऋद्घि सिद्धि तुम
सम्पूर्ण सॄष्टि की वंदना

संस्कार दीक्षा तुमसे है
संस्कृति की रक्षा तुमसे है
अन्नपूर्णा तुम ही हो धरणी
धर्म अधर्म कक्षा तुमसे है

प्रतिस्पर्धा पुरुषों से कर के 
अस्तित्व तेरा कम हो न कहीं 
अधिकार के खातिर लड़ो मगर
भूलो न कर्तव्य कहीं 

जीवन के बहती सरिता को ,
पार करो  डूबो न कहीं 
माझी से पतवार छीन तुम
खुद ही मुश्किल में पडो नहीं 

कर्कषता , कटुता , छल, इर्ष्या
में क्या रखा है पाने को 
जब बाँह पसारे खड़ी स्वयं 
सम्मान तुम्हें अपनाने को 
……………………………………………
© copyright @ Kiran singh

Wednesday, 5 November 2014

सीख लिया

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! सीख लिया !!!!!!!!!!!!!!!!!!!
*********************************
मर - मर कर ही जिंदगी ने , मरकर जीना सीख लिया
लगा पाँव में ठोकर तब से , स्वयं सम्हला सीख लिया

मॄगतृष्णा में भटक-भटक कर , भाग रहे हैं लोग यहाँ
सोच रहा है चातक पंक्षी , बूंद स्वाति की मिले कहाँ

छलकर विजयी झूठ हो रहा , टूट रहा सच का दर्पण
लोग मुखौटा लिए लगाए , बदल रहे देखो क्षण - क्षण

जड़ें जमाकर भ्रष्टाचार की , लगता है आचार बनी
इसीलिये तो आज हमारी , माँ  बहनें लाचार बनी

किस - किस को कोसोगे बोलो क्या बोलोगे चोरों को
जब लोग प्रलोभन स्वयं दे रहे , लोभी रिश्वतखोरों को

सीधेसादे लोगों ने भी , छलप्रपंच जो सीख लिया
मार स्वयं ही मानवता को, दानव से तारीख लिया

© किरण सिंह

Sunday, 2 November 2014

दोषी कौन

दोषी कौन
*********

आए दिन नारी संवेदना के स्वर गूंजते रहते हैं .....द्रवित करते रहते हैं हॄदय को ....छलक ही आते हैं आँखों से अश्रुधार ....पर प्रश्न यह उठता है कि दोषी कौन है .....पुरुष या स्वयं नारी ?
कहँ होता है महिलाओं की शोषण घर या बाहर ?
किससे करें फरियाद ......किससे माँगे अपना हक  ...... .... पिता से जिसे पुत्री के जन्म के साथ ही  ...उसकी सुरक्षा और विवाह की चिन्ता सताने लगी थी . या भाई से जिसने खेल खेल में भी अपनी बहन की सुरक्षा का ध्यान रखा..... तभी तो वो ससुराल में सबकुछ सह लेती हैं हँसते हुए कि उनके पिता और भाई के सम्मान में कोई आँच नहीं आए ! वो तो नैहर से विदा होते ही समय चावल से भरा अंजुरी पीछे बिखेरती हुई चल देती हैं कुछ यादों को अपने दिल में समेटे ससुराल को सजाने संवारने ......रोती हैं फिर सम्हल जाती हैं क्यों कि बचपन से ही सुनती जो आई हैं कि बेटियाँ दूसरे घर की अमानत हैं !
छोड़ आती हैं वो अपने घर का आँगन ...लीप देती हैं अपने सेवा और प्रेम से पिया का आँगन..... रहता है उन्हें अपने कर्तव्यों का भान ....दहेज के साथ संस्कार जो साथ लेकर आती हैं ......किन्तु क्या उनकी खुशियों का खयाल इमानदारी से रखा जाता है ससुराल में....... उनकी भावनाओं का कद्र किया जाता है ? यह प्रश्न विचारणीय है !
बहुत से लोग इसका उत्तर देंगे कि मैं तो अपनी बेटी से भी अधिक बहू को मानता हूँ ......आदि आदि..... कुछ लोग हैं भी ऐसे परन्तु गीने चुनें ही ...अधिकांशतः वो लोग  जिनके बेटे बहू बाहर नौकरी करते हैं !
शायद इसीलिए आजकल नौकरी वाले दूल्हे का मांग ज्यादा है जहां महिलाओं को...नहीं रहना पड़ता ससुराल कैदख़ाने में ......सुरक्षित रहतीं है उनकी आजादी.....

परन्तु कुछ वर्ग ऐसा भी है जहां ससुराल वाले पहले से ही अपेक्षा रखते हैं कि उनकी पुत्रवधू लक्ष्मी , सरस्वती , और अन्नपूर्णा की रूप होगी ....वो अपने साथ ऐसी जादुई छड़ी साथ लेकर आएगी कि छड़ी धुमाते ही ससुराल के सभी सदस्यों की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाएं ....या बहू के रूप में ऐसा रोबोट चाहते हैं जो बटन दबाने के साथ ही काम शिघ्रता से सम्पन्न कर दे .....बात बात पर बहू के माँ बाप तक पहुंच कर ताने सुनाना तो सास का मौलिक अधिकार बन जाता है ! बहू के रूप में मिली नौकरानी को मां बाप से मिलने पर भी पाबंदी होती है क्यों कि बहू के मायके वाले उनके मांग को पूरा नहीं कर पाते.... बेटे का कान भरने से भी नहीं चूकतीं वो सास के रूप धरी महिलाएं...... क्या तब वो महिला नहीं रहती .....क्यों बेटियों का दर्द सुनाई देता है और बहुओं की आह नहीं  ?.क्यों पिसी जाती हैं महिलाएं
मायके और ससुराल के चक्की के मध्य ?
कौन सा है उसका घर मायका या ससुराल ?
और यदि ससुराल तो क्यों ताने दिये जाते हैं मायके को ?
कबतक होती रहेगी महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार
? क्यों नहीं सुनाई देता है सास बनते ही नारी को नारी की संवेदना के स्वर ?
जागो नारी जागो ....सोंचो , समझो और सुनों नारी की संवेदना के स्वर !
जब तक तुम नारी नारी  की शत्रु बनी रहेगी तबतक  होती रहेगी बेवस महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार !
************************
© copyright Kiran singh

क्यों न तुझे ही

!!!!!! क्यों न तुझे ही !!!!!!
********************
शब्द चुनकर छन्द में गढ
उठे मन के भावना भर
सुन्दर सॄजन कर डालूं
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

कोरा कागज़ मन मेरा है
जहाँ बेरंग चित्र तेरा है
भर प्रीत रंग चित्र रंगा लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

नित्य भोर उठ कर्म भैरवी
प्रार्थना नित करूँ पैरवी
दिए गए कुछ वचन निभा लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

शाम सुरीली साज सजी है
जुगलबंदी सुर ताल बजी हैं
रागिनियाँ संग राग मिला लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

रात चाँद और तारे प्रहरी
नयन देखते स्वप्न सुनहरी
तुम रूठो मैं तुझे मना लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ
***********************
© copyright Kiran singh

Friday, 31 October 2014

जिन्दगी का हुनर

!!!!जिन्दगी का हुनर !!!!!
******************
जिन्दगी का हुनर सीखकर
तय करती रही मैं सफ़र

खुशियों को लुटाती रही मैं
रह गए कुछ गम बचकर

गिला भी करूँ क्यूं किसी से 
खुश हूँ आदत से मजबूर होकर 

घर दियों से सजाती रही हूँ 
चाहे बह जाए मोम पिघलकर 

गूथती रही प्रेम धागों से माला 
कहीं मुरझा न जाएँ वो खिलकर
 
खुशियों को समेटा है मैंने
निभाया है रिश्ते सम्हलकर

पलकों ने अश्रुओं को सम्हाला
गिर न पाएं कहीं वो छलककर
***********************
© copyright Kiran singh

Wednesday, 29 October 2014

प्रश्न चिन्ह

!!!!!!!!!!!!!!!!प्रश्नचिन्ह!!!!!!!!!!!!!!!!!
***************************
राष्ट्र की अखंडता पर फिर से प्रश्नचिन्ह है
बंट रहे हैं जाति धर्म सबके मत भिन्न है

भाग रहे लोग  सब , .मुकाम की तलाश में
छोड़कर जमीन को वो , उड़ रहे आकाश में

जनतंत्र के देश में , जनता बेचारी है खड़ी
डालरों की दौड़ में , रुपया लाचार है पड़ी

कृषि प्रधान देश में क्यों कृषकों..की दुर्दशा
रोटी के लाले पड़े हैं ,किन्तु बढ़ रहा नशा

झूठ के बाजार में ,.. सच का भाव मन्द है
दिमाग सब चला रहे , दिल का द्वार बन्द है

बढ़ रहा अधर्म , आस्था का हुआ खण्ड है
धर्म के नाम पर  , हो रहा.......पाखण्ड है

कानून व्यवस्थाओं को , . तोड़ रहा तंत्र है
न्याय के विरुद्ध  ,  अन्याय का षड्यंत्र है

अधिकार मांग रहे सभी , कर्तव्य याद नहीं
कैसे रूके भ्रष्टाचार, सुने कोई फरियाद नहीं
******************************
Copyright © Kiran singh

Tuesday, 28 October 2014

दीप जलाना है

!!! दीप जलाना तुझे !!!
****************

भेद तम कर उज्ज्वल मन
लक्ष्य को पाना है
हर अंधेरे रास्तों में
दीप जलाना है

सुना है पत्थर भी पिघलकर
मोम बनते हैं
दुश्मन भी कभी मिलकर
दोस्त बनते हैं

इस नदी सी जिन्दगी के
लहरों संग बहना ही है
डूबकर या तैर कर
पार करना ही है
***********************
© copyright Kiran singh

दहेज

एक परीचित अपने बेटे के विवाह का आमन्त्रण कार्ड लेकर मेरे घर आए थे और आत्मप्रशंसा किए जा रहे थे ! मैं उनकी आतमकथा ध्यान पूर्वक सुन रही थी !
मैंने उन लोगों को चाय का कप पकडाते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में पूछ ही लिया -  तिलक त ढेरे मीलत होई  ? ( दहेज़ तो काफ़ी मिल रहा होगा  )
तब वो सज्जन बड़े ही मासूमियत से बोले जा रहे थे-ना ना कूछू ना हम त लइकी वाला लोग के साफे कह दीहनी हं कि देखी हामरा कुछ चाही उही ना खाली आपना लड़की केपचास भर सोना के गहना ,   बारात के खर्चा बर्चा खातिर दस बारह लाख ले रूपया , अउरी जब हम आतना कह दीहनी तब हामार पत्नी खाली अतने कहली कि हामारा हीत नाता , आ बेटी दामाद लोग के बिदाई खातिर हामरा हांथ में तीन चार लाख दे देब  ( नहीं कुछ नहीं हमने तो लड़की वालों से कह दिया है कि हमें कुछ नहीं चाहिए , सिर्फ लड़की के जेवर के लिये पचास भर सोना , बारात का पूरा खर्चा- बर्चा , बारातियों का अच्छी तरह से स्वागत - सत्कार और अच्छी तरह बारातियों की बिदाई कर दीजिएगा , और जब हमनें यह सब कह दिया तो अन्त में मेरी पत्नी बस इतना ही  कहीं कि हमारे रिश्तेदारों का बिदाई जो हम करेंगे उसके लिए सिर्फ तीन चार लाख दे दीजिएगा )और फिर उनकी पत्नी मेरी तरफ मुखातिब होकर बोलने लगी - बताईं जी अब बेटो के बियाह में घरे से खार्चा करीं ?  (  बताइए जी अब बेटे की शादी में भी घर से खर्च करें  ?
हम उनकी बातों को अपनी हंसी रोकते हुए सुन रहे थे और हमें हां में हां मिलाना पड़ रहा था क्यों कि कौन उन्हें बेकार का उपदेश देकर उनकी खुशी में खलल डालता , लेकिन मन ही मन सोंच रहे थे कि लोग बेटे की छट्ठी , जन्मदिन , और पढाई लिखाई आदि का खर्च तो खुद उठाते हैं तो फिर विवाह का खर्च खुद क्यों नहीं उठा सकते ?
किरण सिंह

Monday, 27 October 2014

जीवन पथ


!!!!! !!जीवन पथ !!!!!!!
******************
मन कौतूहल प्रश्न निरुत्तर
जीवन एक पहेली है
कौन पढ़ेगा उसका लिखा
जो लिखा लेख हथेली है

डोर उसके हांथों में है
उडाता जैसे तितली है
हम तो दुनियां रंगमंच पर
करते नर्तन कठपुतली हैं

जीवन पथ रहस्यमय है
क्षण क्षण इसपर शंशय है
लक्ष्य सबका एक मगर
अलग अलग समन्वय है

जीवन एक नदी सी है
पार करना कुशल नीति है
खेता माझी जीवन कस्ती
कर्मयोग ही विश्व रीति है

कैसा विधि विधाता का है
सब करता अपने मन का है
विन पूछे आते सब जग में
और बिन आज्ञा के जाता है
…………………………………………..
© copyright @ Kiran singh

सो गई हँसते हँसते

चली गई हँसते हँसते
***************
पहनी लाल नई चूनरिया
मांग सिंदूरी भरी सुहागन
लाल सजी माथे पर बिंदिया
चूड़ी हाथों में मनभावन

सजी पालकी द्वार खड़ी है
लेने द्वार आ गये साजन
रो रही हैं सखियाँ सहेली
गोरी छोड़ चली घर आँगन

अन्त हो गया उसके जीवन का
थक गई थी चलते चलते
हर खुशियाँ लाती थी लेकर
चली गई हंसते हंसते

खुश किस्मत वो सदासुहागन
रो रोकर सब कहते हैं
कितने छोडे स्वप्न अधूरे
सभी कहानी कहते हैं
************************
© copyright Kiran singh

Sunday, 26 October 2014

अन्तिम वार्तालाप

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! अन्तिम वार्तालाप !!!!!!!!!!!!!!!!!!!
***************************************
शाम को करीब सात बज रहा था , मैं अपनी सहेली के गृह प्रवेश में जाने के लिए तैयार हो रही थी .....तभी मेरी बहन रागिनी का मेरे मोवाइल पर काल आता है ..पापा से बात कर लो वो तुमसेबात करना चाहते हैं ! मैंने पापा का नम्बर डायल किया...... उधर से पापा का भावुक स्वर सुनाई देता है जिसे मैं उनके मुख से पहली बार सुन रही थी क्यों कि इतना भावुक होकर कभी बात ही नहीं किए थे !
पापा कह रहे थे- का जाने काहे आज तोहरा से बतियावे के बड़ा मन करत रहे ( पता नहीं क्यों तुमसे बात करने का बड़ा मन हो रहा था ! ) 
मैंने कहा - प्रणाम
पापा - बंटी ( मेरा भाई , पापा का इकलौता पुत्र ) के त ज्ञान हो गईल बा , जेकरा ज्ञान हो जाला ओकरा मोहमाया ना रहेला आ जेकरा परमानन्द के प्राप्ति हो जाला ओकरा दुनिया से मोह माया ना रहेला ..एसे हम सोचतानी कि बंटी के सबकुछ देके कतहूँ चल जाईं ! ( बंटी को तो ज्ञान हो गया है जिसको ज्ञान हो जाता है उसे मोह माया नहीं रहता है और जिसको परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है उसे दुनिया से मोहमाया नहीं रहता है...इसलिए मैं भी सोच रहा हूँ कि सबकुछ बंटी को देकर कहीं चला जाऊँ )

मैं सोंच में पड़ गई कि आखिर पापा ऐसा क्यों कह रहे हैं मुझे लगा शायद बंटी उसबार रक्षाबंधन में लखनऊ से बलिया नहीं आ रहा था और पापा को उससे मिलने का मन कर रहा होगा इसी लिए ऐसा कह रहे हैं !
फिर मैंने कहा कि आपको बंटी से मिलने का मन है तो उसे बुला लीजिए ....नहीं तो कहिए मैं ही कह देती हूँ और मुझसे बात करने का मन है तो आ जाइए पटना ही !........तब पापा ने कहा एक शर्त पर मैं पटना आऊँगा.......कि तुम बंटी को भी पटना बुलाओगी......तब मैने कहा बलिया क्यों नहीं बंटी को बुला लेते.......तब उन्होंने झुंझलाकर कहा तुम नहीं समझोगी..... तुम बंटी को पटना बुलाओ.......तभी मेरी अम्मा पापा से फोन लेकर मुझसे कहती हैं अब फोन रखो तब से बंटी को चाटे और अब तुम्हें............ फिर फोन रख देती हैं  !  और मैं तैयार होने लगी पार्टी में जाने के लिए !
सुबह मैं बलिया माँ से पापा के बारे में बात करने की कोशिश भी की पर अम्मा जल्दी में थी और थोड़ा बात करके फोन रख  दीं
शाम को करीब पांच बज रहा होगा.. मैं बालकनी में गई तो मेरे पति की आवाज़ सुनाई पडती है ...मेरे ससुर जी गिर गए हैं किस नर्सिंग होम में ले जाना ठीक रहेगा ........फिर मैं बलिया काल करती हूँ और उधर से मेरे भतीजे की रोते हुए आवाज़ आती है नाना जी गिर गए हैं !
मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई और मै आवाक .......जैसे ही मेरे पति घर में प्रवेश करते हैं मैंने कहा
मुझसे कुछ छुपाने की जरूरत नहीं है और मैंने पापा से बातचीत के प्रसंग को सुनाया........और समझ आने लगा कि पापा बंटी को पटना बुलाने की बात क्यों कर रहे थे ........मैंने बंटी एवं सभी बहनों को  भी सारी बातें बताई और सभी जैसे तैसे पटना आने के लिए चल दिए  !
पापा अचेतन अवस्था में पटना आए लेकिन किसी से बात नहीं कर पाए ....डाक्टर बताया कि ब्लडप्रेशर हाई हो गया था जिससे ब्रेन का नस फट गया है बचने का उम्मीद नहीं है फिर भी वेन्टीलेटर पर करीब चौबीस घंटा रखा  जबतक उनकी सांसें चल रही थीं और फिर ईश्वर की मर्जी के सामने चलती किसकी है.............. ?

सचमुच बंटी के लिए सबकुछ छोड़ कहीं चले गए ....शान्ति का भाव स्पष्ट दिख रहा था..... परमानन्द की प्राप्ति हो गई थी उन्हें ....नहीं था उन्हें दुनियाँ से मोह माया   ! उनके कहे एक एक शब्दों का अर्थ समझने लगी थी मैं............ तब और भी स्पष्ट हो गया जब मैं बलिया गई और मकान के बाहर के नेमप्लेट पर मेरे भाई का नाम लिखा था जिसपर पापा ने अपना नाम मिटाकर बंटी का नाम छपवाया था  !
आज भी मेरे मन में यह प्रश्न बार बार उठता है कि क्या दुनियां से जाने वालों को पहले ही ज्ञान हो जाता है
उनसे हुई मेरी अन्तिम वार्तालाप शायद अन्तिम दीक्षा थी !
***************
किरण सिंह