Monday, 8 September 2014

मुस्कानों में छुपी

!!! मुस्कानों में छुपी !!!

मुस्कानो में ...छुपी हुई
वेदना को व्यक्त कर दूँ 
भावनाओं को पिरोकर 
छन्द में अभिव्यक्त कर दूँ 

चेतना जड़ में जगाकर 
संवेदना ..स्पंद कर दूँ 
सृष्टि के ...सौन्दर्य को 
शब्द में अनुबंध कर दूँ 

मूक हॄदय में पीर रूके हैं
सस्वर उसे सशक्त कर दूं
मुस्कानों में .....छुपी हुई
वेदना को ...व्यक्त कर दूं

( किरण सिंह )

Friday, 5 September 2014

!!!!! चिट्ठी !!!!!

!!!!!! चिट्ठी !!!!!!

कितनी प्रतीक्षा रहती थी
उन दिनों
चिट्ठियों की
जब हर आहट पर
खोलते थे
द्वार
और डाकिया
थमा देता
किसी का
तार
तब कितना
मन होता
उदास
तब
कौवों को उचारते थे
बार बार
करते थे उनके
पाती का
इन्तज़ार
हर पत्र सपने गढते
रोज नए
जीवन के
सुखद एहसासों के
चांद तारो संग बातें करते
बीतते
अनगिनत
रातें
जाने कितनी
बार
अब कहां गए वो
दिन
चिट्ठियों के.................किरण सिंह

Thursday, 4 September 2014

जैसे ही

!!!!जैसे ही!!!!

जैसे ही नैहर की
चौकठ पर
रखा पांव
बड़े नेह से भौजाई
लिए खड़ी हांथो में
थाल
सजाकर
जुड़ा हमारा
हॄदय
खुशी से आया
नयन भर
हमने
दिया आषीश
मन भर
सजा रहे भाई का
आंगन
भरा रहे भाभी का
आँचल
रहे अखंड
सौभाग्य
हमारा
नैहर रहे
आबाद...............किरण सिंह

नित्य नई मैं

नित्य नई मैं

नित्य नई मैं
विषय बनूंगी
लिखो
काव्य
मैं वेदना
हूँ

सात सुरो में
राग जिन्दगी
छेडो
तान
मैं वन्दना
हूँ

सरल सुन्दर
जीवन पथ पर
बढे
चलो
मैं प्रेरणा
हूँ

तुमसे मैं हूँ
मुझसे तुम हो
पूर्ण हो
तुम
मैं अन्नपूर्णा
हूँ

चाह यही
उर में बस जाऊँ
करो
प्रेम
मैं प्रेम लता
हूँ

करो तपस्या
शांति स्थापना
करूंगी मैं
तेरी
साधना
हूँ

नील गगन में
चलो उड़ चले
डरो नहीं
मैं हौसला
हूँ

रंग हीन जो
चित्र दिखेंगे
भरो
रंग
मैं चित्रकला
हूँ

सॄष्टि का हम
सर्जन कर दें
तुम
पुरूष
मैं प्रकृति धरा
हूँ.................... किरण सिंह

Wednesday, 3 September 2014

जीवन के गीतों में

जीवन के गीतों के
आरोहों और अवरोहों में
मेरा समर्पण
पकड़
चल रही सांसों की
सरगम
निरन्तर

तुम्हारे मन्द्र सप्तक के
सात स्वर
मेरे तार सप्तक के स्वरों से
मिलकर
मध्य सप्तक को पकड़
गढ़ जाते हैं राग एक
सुन्दर

खनक कंगन
छनक पायल
तोड़ तुम्हारे नींद निशा में
भर श्रॄंगार रस
लिखा काव्य
मन से गढ़
सुन्दर

कुछ तुम कहकर
कुछ हम सहकार
प्रेम का समन्वय यह
जीवन
चल रहा है
बहती सरिता सी
छल छल
निर्मल
सुन्दर...............किरण सिंह

Monday, 1 September 2014

बिदाई की घडियां

!!!!!!!!!!! बिदाई की घडियाँ!!!!! !!!!

जब भी याद आती  बिदाई की. घड़ियाँ
आज भी भर आती है आंसू से अखियाँ

बड़े लाड़ से माँ ने ....मुझको सजाकर
डोली में बिठाया ज्यों रबर की गुड़िया

पिता के रूंधे से स्वर .....आषीश देते
अश्रुधारा लिए माँ की ममता की लडियां

जहां खेलकर बढ़ा ......बचपन हमारा
लुकाछिपी खेलती ढूंढे सखी सहेलियाँ

वो आंगन हमारा .......लिए अश्रुधारा
बिदा कर दिया छूटा. नैहर की गलियां

डाली से टूटी ज्यों .फूलों की कलियाँ
पीहर को चली सच ..पराई हैं बेटियाँ

वो लड़ाना झगड़ना तुम्हारे संग बहना
अब लागे है ज्यों ..थी नेह की बतिया

आज भी खीचते हैं... वो नेह की डोरी
जो बांधा था मैंने .वो भैया की रखिया........किरण सिंह

सिर्फ

!!!! सिर्फ !!!!

सिर्फ
उसकी आँखें
कह रही थी
जिसे वो
मुस्कुरा कर
अश्रुओं को पलको में
बंद कर
छुपाने की नाकाम
कोशिशें
कर रही थी
जब वो
पीहर से लौटी थी
नैहर
कहां हो पाते हैं पूरे
सबके स्वप्न
जो देखते हैं नयन
शायद
यही कहना चाहती थी
वो पर
कह न सकी
क्यों कि
सम्मान  जो बचाना था उसे
नैहर और
पीहर का
इसलिए सहा उसने
सौत का भी दंश
झेला उसने
हारती कैसे वो
बोया था उसकी माँ ने जो बीज
शहन शक्ति की
आखिर
हिम्मत के दम पर
दुखों से लडकर
अकेली
खिल ही गई वो
पंक में
कमल सी , कंटकों में
गुलाब सी
वो..........................किरण सिंह