Friday, 10 October 2014

आसमाँ से चाँद

आसमाँ से चाँद
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आसमाँ से चाँद फिर
लगा रहा है कक्षा
देना है आज हमें
धैर्य की परीक्षा

सोलह श्रॄंगार कर
व्रत उपवास कर
साक्षी तू प्रेम का
देना है तुझे अर्घ

उग आना जल्द आज
कर देना पूरी माँग
बड़ी हठी हैं हम
वर दो रहे अखंड सौभाग्य
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Thursday, 9 October 2014

आखिर में

आखिर में
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कितनी देर तक
छुपा पाएगा
मूर्ख बादल
दमकते रवि को
और
चमकते शशि को
आखिर में बादल
बरसकर
छट ही जाएगा
किरणें
विखर ही जाएंगी
चाँदनी
फैल ही
जाएँगी
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Tuesday, 7 October 2014

कोयला

कोयला
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क्यों न जले कोयला
कभी क्रोध में
कभी
हीरे से बिछडकर
विरह में
तो कभी ईर्ष्या अग्नि में
कि सबके काम
आता है वो
फिर भी हीरे को सहेजा
जाता है
और उसे जलाया
जाता है
सोंचता है
जलना ही है उसकी
नियति
कोसता है
अपने आप को कि
आह
क्या है भाग्य है हीरे का
साथ ही तो था मेरे
वो भी, काला
काश
कोई जौहरी मुझे भी
तराश कर
चमका देता
बना देता मुझे भी कीमती
सजा देता
राज मुकुट में
मूर्ख
कोयले को नहीं पता
कि सिर्फ साथ रहने से
वो
हीरा नहीं है
कौन समझाए
उसे
कि वह है ही
जलने के लिए
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Monday, 6 October 2014

स्वर्ग से सुन्दर

स्वर्ग से सुन्दर
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विश्व धरा देखता
मधुकर मन
खिलखिलाते हुए
वन और उपवन

पत्तियों को छूकर
सहलाती पवन
साथ फूलों की खुशबू
ले आती पवन

पाप धोती गंगा
स्वयं है पावन
बढ़ रही वो करने
सिंधु से मिलन

धरा ओढती स्वयं
रंग बिरंगी चुनर
एकटक देखता है
दूर से गगन

क्यों चाह हो हमें बनाना
चाँद पर महल
जब धरा ही है स्वयं
स्वर्ग से सुन्दर
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Sunday, 5 October 2014

विनम्रता

विनम्रता
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सर चढकर
बोलती है सफलता
तब
हो ही जाता है
अभिमान
पर
विनम्रता को आता है
मेकअप के परतो में
छुपाना
अभिमान के लकीरों को
जो दमका देती हैं
चेहरे को
और भी आकर्षक
जिसे देखने को आतुर
जमाना
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राम राज्य

राम राज्य
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ज्ञानी था रावण
बलशाली भी था
फिर भी जल गई उसकी
स्वर्ण लंका
उसके विशाल सेना का मान
हवन हो गया अग्नि में
अभिमान
एक स्त्री पर कुदृष्टि का
नतीजा
खत्म कर दिया रावण
राज्य

वहीं विजयी हुए राम
क्योंकि
उनके साथ था एक स्त्री का
विश्वास
प्रेम , पूजा , शुभकामनाएं और
समर्पण का भाव
तभी तो अनेकों बाधाओं को तोड़
छुड़ा लाए
रावण के चंगुल से
सीता को
राम
और निर्मित हुआ
राम राज्य
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Friday, 3 October 2014

समझौता पत्र

समझौता पत्र
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क्यों नहीं समझते हो
प्रतिद्वंदी नहीं हूँ
तुम्हारी
तुम्हारे सत्ता को
ललकारा भी नहीं मैंने
अबतक
शायद तुम पहले ही
भाप गए थे
हमारी
शक्ति को
इसीलिए तो
नित्य नई
एक चक्रव्यूह
रचते रहे हो
छलकर

क्यों नहीं स्वीकार करते हो ?
अभी तक तो सिर्फ
पांच
गाँव ही मांगा है हमने
भेज रहे हैं
शान्ति दूत
कर देना
हस्ताक्षर
समझौता पत्र पर
वर्ना
छिड़ जाएगा
जंग
और शुरू हो जाएगा
फिर एक
नया
महाभारत

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