Monday, 19 January 2015

मैं हूँ अग्नि

मैं हूँ अग्नि
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मैं हूँ अग्नि
ऐ हवा
तुम संतुलित बहो
दिये में बाती बनो
जलूंगी
करूंगी मैं
आँगन , घर , बाहर
रौशन

ऐ हवा
तुम धीरे बहो
आंधियों में
जल जायेंगे
मेरी लौ से यदि
किसी का घर
फिर
दोषी होगे तुम

मत खेलना मुझसे
कहीं मुझे
खाक करते करते
राख न हो जाए
तुम्हारा
सम्पूर्ण
अस्तित्व
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©Copyright Kiran singh

Sunday, 18 January 2015

शायद

मेरा मन
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क्यों बेचैन है
सबकुछ तो है
और क्या चाहिए
शायद शिकायत है उसे
अपने आप से
इसी लिए असंतुष्ट
भटक रहा
भौरों की तरह
मेरा मन

मेरा मन
देखता है
स्वर्ण पिंजर में
कैद पक्षियों को
और तुलना करता है
वेफिक्र उड़ते हुए
नील गगन में पक्षियों से
तभी एक आह
निकलता है
और तड़प उठता है
मेरा मन

मेरा मन
पतंगे उड़ाने के लिए
सुलझाने लगा
उलझे हुए पतंग की डोर को
और शायद भूल गया
स्वयं ही स्वयं को
और खुद ही उलझ गया
खुद को सुलझाने में
मेरा मन

शायद नहीं देखा सकता
प्रतिभाओं को कुण्ठित होते हुए
और चाहता है उनका
समुचित मूल्यांकन
मेरा मन

शायद नहीं देख सकता
सत्य को न्यायालयों के चौकठ पर
सर झुकाकर न्याय की
गुहार लगाना और फिर
उसे हारते हुए
मेरा मन

शायद नहीं सहन होता है उसे
उन अजन्मी कन्याओं का
करुण क्रन्दन
और अपनी
विवशता पर
छटपटाता
मेरा मन

शायद नहीं देख सकता
मजदूरों को
औरों के लिए महल बना कर
स्वयं सड़कों पर
बेफिक्र सोते हुए
मेरा मन

शायद नहीं देख सकता
बालश्रमिकों को
रोटी के लिए
जूठन साफ करते हुए
और फिर प्लेट टूटने पर
बेरहमी से पिटते हुए
मेरा मन

शायद नहीं देख  सकता
भोले भाले लोगों को
ढोंगी बाबाओं के जाल में फसते हुए
और चाहता है उन्हें
अंधविश्वास के
मकड़जाल से निकालना
मेरा मन
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©Copyright Kiran singh

Saturday, 17 January 2015

आत्मकथ्य

आज सोंचती हूँ कुछ अपने विषय में भी लिखूँ. :-)
याद है वो क्षण जब मेरे पिता ने मेरे हांथ में डायरी पकड़ाते हुए कहा था कि अभिव्यक्ति से सशक्त  व्यक्तित्व का निर्माण होता है ! तब मैं करीब दस वर्ष की थी और पांचवीं कक्षा में पढती थी .! कलम से कितनी ही बार मै लिख लिख कर काटती.. फिर लिखती फिर.........! मैं अपनी रचनाओं में कभी अपने विद्यालय को विषय बना देती थी तो कभी शिक्षक एवं शिक्षिकाओं को, तो कभी  माता पिता और भाई बहनों पर ही काव्य गढ़ देती थी..कभी दहेज प्रथा पर तो कभी दाई नौकरों पर लिख दिया करती थी ! जब पहली बार मेरे स्कूल के पत्रिका में मेरी कविता छपी उस समय मुझे जो खुशी मिली थी उसका वर्णन मैं शब्दों में नहीं कर सकती  ..............फिर चलती रही लेखनी रुक रुक कर ....!
साहित्य , संगीत और कला की तरफ बचपन से ही रुझान रहा है ! बी ए में मेरा विषय हिन्दी , मनोविज्ञान और सितार था !मै स्कूल और कालेज में खेलकूद , वादविवाद प्रतियोगिता , अंत्याक्षरी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती रही थी और पुरस्कृत भी होती रही थी  !
जीव जन्तुओं से बचपन से ही प्रेम और सहानुभूति था ! एकबार मैं बचपन में बकरी कटते हुए देख ली , तब से मैंने मांसाहार छोड़ दिया  और एक मुर्गा जो मेरे पास आकर छुप गया था जिसे काट कर खाने के लिए लाया गया था उसे मैंने  बचा लिया नहीं काटने दिया ......तब मैं सरस्वती शिशु मंदिर में दूसरी कक्षा में पढती थी जहां कक्षा में जीवों पर दया करने का पाठ पढाया गया था !
वैसे तो मेरे पिता मुझे आगे पढ़ाना चाहते थे... मेरे लिए बहुत सारे सपने देखा करते थे किन्तु छह पुत्रियों के पिता की मैं ठहरी पहली संतान जो उनके पिता मन को सामाजिक दायित्व का बोध कराने लगा था..! जब घर में मेरे विवाह की बात चली तो बहुत ही परेशान हो गई और अपने मन में उठे हर भावों को लिख कर उनके टेबल पर रख दिया..! किन्तु पिता को परेशान नहीं देख सकती थी और विवाह के लिए आनाकानी नहीं की..! और मेरा विवाह    १८ वर्ष की उम्र जब मैं बी ए के द्वितीय वर्ष में प्रवेश ही की थी कि १७ जून १९८५ में मेरा विवाह सम्पन्न हो गया !
शिव के नाम के समानार्थी मेरे पति का नाम (  श्री भोला नाथ सिंह ) जो अभी बिहार राज्य विद्युत बोर्ड में कार्यकापालक अभियन्ता हैं का स्वभाव भी कुछ शिव के समान ही है  !अपने माता पिता की बड़ी संतान होने के साथ साथ मैं अपने सास ससुर की भी बड़ी और प्यारी  बहू  हूँ !
ईश्वर की कृपा से मुझे मायके और ससुराल दोनो ही जगह बहुत ही स्नेह और मान सम्मान मिला ! मैने भी बेटी, बहन , बहू और पत्नी की भूमिका इमानदारी से निभाया  ! मैंने नौकरी करने की इच्छा जताई तो पतिदेव ने कहा तुम्हें नौकरी से जितना मिलेगा मुझसे ले लिया करना..! इसके पूर्व पिता ने भी कहा था कि शिक्षा दान किया जाता है बेचा नहीं जाता..! चूंकि मैं अपनी इच्छाओंमैं से अधिक अपनों के भावनाओं को तरजीह दी इसलिए अपनी स्थिति से समझौता कर उनकी इच्छा को सहर्ष स्वीकार कर लिया..!
२८ मार्च १९८८ में मुझे प्रथम पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम हमने कुमार ऋषि आनन्द रखा..! जाति पाति का भेदभाव के हूँ सख्त खिलाफ थे इसलिए नाम के साथ जाति का चिन्ह सिंह नहीं जोड़ा..! मै अपने सुन्दर संसार में खुद को भूलकर घर गृहस्थी में पूरी तरह से उलझ गई..! उसी बीच मैंने सितार से संगीत प्रभाकर भी किया ! २४ मार्च १९९४ में मुझे द्वितीय पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम कुमार आर्षी आनन्द है..!
बच्चों की परवरिश और पढाई लिखाई मेरी पहली प्रार्थमिकता रही ! किन्तु मेरी आत्मा जब जब सामाजिक कुरीतियाँ , भ्रष्टाचार , दबे और कुचले लोगों के साथ अत्याचार देखती तो मुझे बार बार पुकारती रहती थी  कि सिर्फ घर परिवार तक ही तुम्हारा दायित्व सीमित नहीं है .......समाज के लिए भी कुछ करो .....निकलो घर की चौकठ से....! तभी एक दिन अचानक रात के करीब दो बजे मेरी सांसे तेजी से चलने लगीं जैसे बहुत तेजी से मीलों दौड़ कर चलती हैं..! फिर डाक्टर ने चेकप कर बताया कि मेरे हॄदय के वाल्व में छेद है......१३ फरवरी सन २००६ में मेरा ओपेन हार्ट सर्जरी ( स्कार्ट हार्ट हास्पिटल दिल्ली ) मे हुआ जिसमें मेरे हृदय का दो वाल्व बदला गया ...! अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ किन्तु अधिक भागदौड़ वाला काम नहीं कर सकती...!
बच्चे बड़े हो गए और उच्च शिक्षा के लिए बाहर चले गए ..! मैं थोड़ा खालीपन महसूस करने लगी .! कई बार बच्चों ने मुझे फेसबुक से जुड़ने की सलाह दी लेकिन मैने रूचि नहीं दिखाई..! अन्ततः मेरी बहन रागिनी सिंह ने जोड़ ही दिया फेसबुक से यह कहकर कि तुम अच्छा लिखती हो शायद तुम्हारे विचार लोगों को पसंद आए.........! पहले तो मैंने फेसबुक पर सिर्फ पांच मित्रों को ही जोड़ा जिसमें रागिनी दोनों बेटे और मेरे ममेरे भाई भाभी शामिल थे..! धीरे धीरे मैं अपने विचार और रचनाएँ पोस्ट करने लगी जिसे बच्चों ने भी लाईक किया..! जैसे जैसे आत्मविश्वास बढ़ने लगा मैने और मित्रों को भी मित्रता सूची में जोड़ना आरम्भ किया..!  फेसबुक मित्रों द्वारा मेरी अभिव्यक्तियों को सराहना मिली और मेरा सोया हुआ कवि मन  फिर से जाग उठा .....फिर करने लगी मैं भावों की अभिव्यक्ति..!
मेरे इस शौक को ध्यान में रखते हुए मेरा प्रथम पुत्र कुमार ॠषि आनन्द ने मेरे लिए उपहार स्वरूप टैबलेट भेट दिया जो मेरे पथ को और भी सरल बना दिया !फेसबुक मित्रों से मिली प्रेरक टिप्पणियाँ मेरा उत्साह वर्धन करने लगी और मुझे अधिक से अधिक लिखने को प्रेरित करने लगीं..!
पिता से मिली डायरी , पति से मिला प्रेम और पुत्र से मिले उपहार के फलस्वरूप मिल गई मुझे वो डगर जिसकी मुझे तलाश थी..! और मैं चल पड़ी इस डगर पर ... छपने लगीं पत्र पत्रिकाओं में मेरी अभिव्यक्तियाँ  ! अब देखें कहाँ ले जाती हैं राहें..!
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किरण सिंह

Sunday, 11 January 2015

श्वेत मन

श्वेत मन बेरंग सा चित्रण
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श्वेत मन, बेरंग सा.. चित्रण 
उसमें तुम अपना रंग भरकर 
सुन्दर चित्रण... कर जाते हो 
मुझे प्रीत में....छल जाते हो

खग सा चंचल हो जाता मन 
बिखरे लट आ गिरते मुख पर 
तब तुम दर्पण बन जाते ..हो 
मुझमें मुझको दिखलाते हो 

पथ में मेरे संग संग चलकर
बाधाओं को.. तोड़ निरन्तर
कालचक्र से लड़ . जाते हो
जड़ में चेतना भर जाते हो

अन्तर्तम में दीप .जलाकर
लाते हो नव विषय बनाकर
छन्द अलंकृत कर जाते हो
स्याही कलम में भर जाते हो
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© copyright Kiran singh

Wednesday, 7 January 2015

देखो सखि

देखो सखि ऋतु राज आ गया
बासंती बयार आ गया
पीताम्बरी पुष्पित चुन्दरी
धरणी के मन को भा गया

कूके कोयलिया तान आ गया
गीतों मे सुर ताल .आ गया 
बज उठी वीणा के .सरगम
जैसे उसमें प्राण ..आ गया 

हवाओं में खुमार आ गया
प्रकृति को मुस्कान आ गया
बरसे मन  प्रीत सावन
भीगना अब रास आ गया

मन में नव उल्लास आ गया 
रचना मे अनुप्रास आ गया
ठहरी हुई लेखनी के
छन्द में रस श्रॄंगार आ गया

जीवन में रफ्तार आ गया
मुट्ठी में .संसार आ गया
वर्ण अक्षर छन्दों में सजगए
भावों का सैलाब आ गया
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© copyright @ Kiran singh

Thursday, 18 December 2014

जहां जन्म रणवीर लिए


जहां जन्म रणवीर लिए , किए प्राण देश के नाम
भारत माँ के उस मिट्टी के ,कण कण को प्रणाम

त्याग दिए सुख चैन स्वयं , चल पड़े वीर जवान
छीन लिए आजादी लड़कर , दिए प्राण बलिदान

चलो चलें हम सब मिलकर, पदचिन्हों पर उनके
देश रत्न को करें समर्पित, कुछ श्रद्धा सुमन चुनके

अहो भाग्य हमारा , हम सब हैं भारत के वासी
रक्षण करना मातृ भूमि का , हो जाए चाहे फांसी

करो प्रण अब नहीं लड़ेंगे , आपस में ही भिड़कर
अमन चैन की करो स्थापना , रहो सभी मिलजुलकर

आजाद हिन्द आजादी , हम सब का अभिमान है
सबसे ऊंचा रहे तिरंगा , जो भारत माँ की शान है
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© Copyright Kiran singh

Friday, 12 December 2014

तेरी मधुर स्मृतियों में खोकर , तुम संग प्रिय दिन रैन जिए हैं
उर भाव लहर बेचैन स्पन्दन  ,  कलम किनारा थाम लिए हैं
तेरे नाम की पाती प्रियतम ,  कुछ गीत लिखे  कुछ छंद गढ़े
अनुभूतियों में रस श्रॄंगार भर ,  प्रेम कविता का नाम दिए हैं 
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© Copyright Kiran singh