Saturday, 28 February 2015

होरी गाएं

क्यों न रंगाएं
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मधुरिम मधुकर मधुबन गुंजन
हर्षित हो मन करता नर्तन
देखत स्वप्न नयन अति सुन्दर
ऋतु फागुन  रंग लागे बरसन

होरी खेलत हैं ब्रज बाला
कृष्णा रंग में भीग गयीं हैं
कोरा मन रंगन अकुलाई
देख श्याम को रीझ गयीं है

प्रीत रंग बरसन लागे
भीगन को मन भया विवश
गारी गा कुण्ठा झुलसे
मिटती कटुता हरसे अंतस

जुगलबंदी पी संग मन भाए
चलो सखी हम होरी गाएं
तन मन कोरा रह नहीं जाये
सभी रंगों में चलो रंगाएं

©किरण सिंह

Friday, 13 February 2015

जीवन के गीतों में

जीवन के गीतों के

जीवन के गीतो के
आरोह और अवरोहों में
मेरा समर्पण
पकड़
चल रही सांसों की
सरगम निरन्तर
सुन्दर

तुम्हारे मन्द्र सप्तक के
स्वर
मेरे तार सप्तक के स्वरों से
मिलकर
मध्य सप्तक को पकड़
गढ़ जाते हैं राग एक
सुन्दर

खनक कंगन
छनक पायल
तोड़ तुम्हारे नींद निशा में
भर श्रॄंगार रस
लिखा काव्य
मन से गढ़
सुन्दर

कुछ तुम कहकर
कुछ हम सहकार
प्रेम का समन्वय यह
जीवन
चल रहा है
बहती सरिता सी
छल छल
निर्मल
सुन्दर
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© copyright @ Kiran singh

Wednesday, 11 February 2015

उलझन

!!!!!!!!!!!!!!! उलझन !!!!!!!!!!!!!!!!!
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एक शहर में सावन बरसे दूसरे में है तपन
किस शहर में मैं रहूँ उलझन में है मन

एक शहर में कामना तो दूसरे में है समर्पण
एक शहर में ज्योति है तो दूसरे में जीवन

विवश हो बढ़ चले कदम एक शहर की ओर
दूसरा शहर है खींचे मेरे मन की डोर

एक शहर में है मुझे ज्योति अभी जलाना
दूसरे शहर में है जिंदगी सजाना

प्रश्न कर रहा मेरा मन , मैं बढू किस ओर
कैसे दे उत्तर हृदय किस पथ को दे छोड़
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   © copyright  @ Kiran singh

Sunday, 8 February 2015

सर्जरी से पहले

वेदना पिघल कर आँखों से छलकने को आतुर थीं.. पलकें अश्रुओं को सम्हालने में खुद को असहाय महसूस कर रही थीं...जी चाहता था कि कोई अकेला कुछ देर के लिए छोड़ देता कि जी भर के रो लेती..........फिर भी अभिनय कला में निपुण अधर मुस्कुराने में सफल हो रहीं थीं ..बहादुरी का खिताब जो मिला था उन्हें....! कैसे कोई समझ सकता था कि होठों को मुस्कुराने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ रहा था...! किसी को क्या पता था कि सर्जरी से पहले सबसे हँस हँस कर मिलना और बच्चों के साथ घूमने निकलना , रेस्तरां में मनपसंद खाना खाते समय मेरे हृदय के पन्नों पर मस्तिष्क लेखनी बार बार एक पत्र लिख लिख कर फाड़ रही थी... कि मेरे जाने के बाद.................!
ग्यारह फरवरी २००६ रात करीब आठ बजे बहन का फोन आया... पति ने बात करने के लिए कहा तब आखिरकार छलक ही पड़े थे नयनों से नीर.... और रूला ही दिए थे मेरे पूरे परिवार को... नहीं सो पाई थी  उस रात को मैं .. कि सुबह ओपेन हार्ट सर्जरी होना था.... सुबह स्ट्रेचर आता है... उसपर मुझे लेटा दिया जाता है.... कुछ दूर चलकर स्ट्रेचर वापस आता है कि सर्जरी आज नहीं होगा......! कुछ लोगों ने तो अफवाह फैला दिया था कि डॉक्टर नरेश त्रेहान इंडिया पाकिस्तान का क्रिकेट मैच देखने पाकिस्तान जा रहे हैं..!
तब तो मुझे एक बहाना मिल गया था हॉस्पिटल से भागने का........ गुस्से से चिल्ला पड़ी थी मैं .. डॉक्टरों की टीम आ पहुंची थी मुझे समझाने के लिए....... तभी डॉक्टर नरेश त्रेहान भी आ पहुंचे थे......और समझाने लगे थे कि मुझे इमर्जेंसी में बाहर जाना पड़ रहा है... मैं चाहता हूँ कि मेरे प्रेजेन्स में ही आपकी सर्जरी हो............... .....!

Monday, 2 February 2015

हीरा

हीरा
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खादानों में
कोयले के साथ दबे
हीरे को कहाँ पता था
कि कभी कोई
जौहरी
उसे तराश कर
इतना चमका देगा
कि
वह सुशोभित होगा
राजमुकुटों में
जड़ा जाएगा
गहनों में
वह भी तो भयभीत था कि
कि मैं भी
किसी दिन
झोंक दिया जाऊंगा
दहकती भट्ठी में
चमककर
राख हो जाएगा
मेरा भी
अस्तित्व
पर
खुदा के दरबार में देर भले ही है
अंधेर कहां
भेज ही देता है वो
अपने बंदे को
जो तराश कर
चमका ही देता है
कभी न कभी
धैर्य रख
हीरे की तरह
यकीं कर
खुद और
खुदा पर
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© copyright Kiran singh

Monday, 26 January 2015

संस्मरण सर्जरी का

आज १३ फरवरी.. नहीं भूलता यह दिन शायद यह दिन मेरे लिए पुनर्जन्म का दिन ही है...! वह सुबह करीब ९ बजे स्कार्ट हार्ट हॉस्पिटल की नर्स ने जब स्ट्रेचर पर लिटाया और ऑपरेशन थियेटर की तरफ ले जाने लगी थी तो मुझे लग रहा था कि जल्लाद रुपी परिचारिकाएं मुझे फांसी के तख्ते तक ले जा रही हैं......... हृदय की धड़कने और भी तेजी से धड़क रही थी.... मन ही मन मैं सोंच रही थी शायद यह मेरे जीवन का अन्तिम दिन है..फिर भी परिजन परेशान न हो जाएं इसलिए अपने को बिलकुल निर्भीक दिखाने का लगातार प्रयत्न करती रही थी.. ! आँखों से आँसू कहीं छलक न जाए इसलिए मैं अपने परिजनों की तरफ़ देख भी नहीं रही थी..!
परिचारिकाएं ऑपरेशन थियेटर के दरवाजे के सामने स्ट्रेचर रोक देती हैं.. और तभी किसी यमदूत की तरह डाक्टर आते हैं..  स्ट्रेचर के साथ साथ डॉक्टर भी ऑपरेशन थियेटर में मेरे साथ चल रहे थे.... चलते चलते वे अपनी बातों में उलझाने लगे थे ..जैसे किसी चंचल बच्चे को रोचक कहानी सुनाकर बातों बातों में उलझा लिया जाता है.. !
डाक्टर  ने कहा किरण जी लगता है आप बहुत नाराज हैं..! मैने कहा हाँ.. क्यों न होऊं...? और मैं हॉस्पिटल की व्यवस्था को लेकर कुछ कुछ उलाहने.देने लगी थी . तथा इसी प्रकार की कुछ कुछ बातें किये जा रही थी..!
मैने डाक्टर से पूछा बेहोश करके ही ऑपरेशन होगा न..? डाक्टर ने मजाकिया अंदाज में कहा अब मैं आपका होश में ही ऑपरेशन करके आपपर एक नया एक्सपेरिमेंट करता हूँ..! बातों ही बातों में डॉक्टर ने मुझे बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया उसके बाद मुझे क्या हुआ कुछ पता नहीं..!

करीब ३६ घंटे बाद मेरी आँखें रुक रुक कर खुल रही थी ..! आँखें खुलते ही सामने पतिदेव को खड़े देखा तब .मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि मैं सचमुच जीवित हूँ...!कहीं यह स्वप्न तो नहीं है यह सोचकर मैने  अपने पति के तरफ अपना हाँथ बढ़ाया..जब पति ने हांथ पकड़ा तब विश्वास हुआ कि मैं सचमुच जीवित हूँ..! तब मैं भूल गई थी उन सभी शारीरिक और मानसिक तकलीफों को जिन्हे मैंने सर्जरी के पूर्व झेला था ..तब जिन्दगी और भी खूबसूरत लगने लगी थी ..!  अपने भाई , बहनों , सहेलियों तथा सभी परिजनों का स्नेह.., माँ का अखंड दीप जलाना......, ससुराल में शिवमंदिर पर करीब ११ पंडितों द्वारा महामृत्युंजय का जाप कराना..,...... पिता , पति , और पुत्रों के द्वारा किया गया प्रयास... कैसे मुझे जाने देते इस सुन्दर संसार से..! वो सभी स्नेहिल अनुभूतियाँ मेरे नेत्रों को आज भी सजल कर रहे हैं .... मैं उसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर पा रही...हूँ !
आज मुझे डॉक्टर भगवान , नर्स देवी , और स्कार्ट हार्ट हास्पिटल मंदिर लगता है..!

Saturday, 24 January 2015

वीणा वादिनी

वीणा वादिनी
बुद्धि प्रदायिनी
तमस ज्योतिर्मय कर दे
अंतस ज्ञान प्रकाश से भर दे

मैं मुर्खा
चंचल मति मेरी
साधना कैसे हो पूरी
देकर आशीष मेरे मन में
सतत साधना भर दे
अंतस ज्ञान प्रकाश से भर दे

स्वर होता
तुमसे मुखरित माँ
वीणा है झंकृत तुमसे माँ
नीरवता भरे इस जग को
संगीतमय कर दे
अंतस ज्ञान प्रकाश से भर दे

शब्दों का
मुझे ज्ञान नहीं है
अर्थों का पहचान नहीं है
शब्द अर्थ का मेल कराकर
लेखनी प्रवाहित कर दे
अंतस ज्ञान प्रकाश से भर दे
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©Copyright Kiran singh