विषय है स्त्री विमर्श
****************
विषय है स्त्री विमर्श
ढूढ रही हूँ शब्द इमानदारी से
कि लिखूं स्त्रियों की असहनीय पीड़ा
दमन , कुण्ठा
कि जी भर कोसूं पुरुषों को
कि जिन पुरूषों को जानती हूँ उन्हें ही
कुछ कहूँ भला बुरा
पर
सर्व प्रथम पुरूष तो पिता निकला
उन्हें क्या कहूँ
वह तो मेरे आदर्श हैं
फिर सोचा
चलो आगे दूसरे को देखती हूँ
अरे वह तो भाई निकला
जिसकी कलाई पर राखी बांधती आई हूँ
प्रति वर्ष
अब आती हूँ पति पर इन्हें तो छोड़ूगी नहीं
लड़ने की सोचती हूँ
कि कितना झेलना पड़ता है मुझे घर में
लेकिन लड़ूँ तो कैसे
बेचारे के पास समय और हिम्मत ही कहाँ बची है लड़ने के लिए
सारी उर्जा तो दफ्तर में ही खत्म हो जाती है
फिर थके हारे हुए इंसान से
लड़ूँ तो कैसे लड़ूँ...?
लिखना तो है ही
आखिर स्त्री विमर्श है
चलो बेटों को ही कोसती हूँ
पर क्या करूँ
मेरी तो आँखों पर तो पट्टी चढ़ गई है
पुत्र में तो कोई दोष दिखाई ही नहीं देता
फिर किस पुरूष को कोसूं ?
अरे, अरे क्यों चिंतित हो किरण
बहुत आसान है अजनवी पुरुषों को
कोसना
आखिर बात स्त्री विमर्श की है
कोसो जी भर कर
***************************
©किरण सिंह
Wednesday, 21 September 2016
विषय है स्त्री विमर्श
अक्षर
अक्षर
********
ये अक्षर भी न
आपस में मिलकर
कर जाते हैं कुछ नव सृजन
गीत कविता के रूप में ढलकर
कुछ हमारे
प्रणय की ही तरह
और कभी-कभी
उनका भी
हो जाता है
विच्छेद
फिर वे भी
तलाकशुदा
दम्पत्तियों
की तरह
कुछ बिखर जाते हैं
कुछ सम्हल जाते हैं
कुछ सिमट जाते हैं
जीवन चक्र में
उदास बच्चों की तरह
कभी
अक्षर
कभी शब्द
और कभी वाक्य
और कभी
वे भी अपना
तलाश लेते हैं अस्तित्व
कहीं न कहीं
कुछ
नवीन
शब्दावली में
*******************
©कॉपीराइट किरण सिंह
Monday, 12 September 2016
शायद पानी की तरह होती हैं स्त्रियाँ
विषय है स्त्री विमर्श
****************
विषय है स्त्री विमर्श
ढूढ रही हूँ शब्द इमानदारी से
कि लिखूं स्त्रियों की असहनीय पीड़ा
दमन , कुण्ठा
कि जी भर कोसूं पुरुषों को
कि जिन पुरूषों को जानती हूँ उन्हें ही
कुछ कहूँ भला बुरा
कि सर्व प्रथम पुरूष तो पिता निकला
उन्हें क्या कहूँ
वह तो मेरे आदर्श हैं
चलो आगे दूसरे को देखती हूँ
अरे वह तो भाई निकला
जिसकी कलाई पर राखी बांधती आई हूँ
प्रति वर्ष
अब आती हूँ पति पर इन्हें तो छोड़ूगी नहीं
सोचती हूँ कि महीने भर की पगार लाकर
मालकिन बना दिया
फिर सब खर्च का हिसाब रखना भी तो
मुश्किल है यही लिख दूँ क्या..?
या फिर किटी पार्टियों में गहने कपड़े का हिसाब ही लिख दूँ
कि कितना मुश्किल होता है नौकरों से काम लेना
कि वे तो आफिस में मस्ती करते हैं
और मैं इधर उधर समय काटती हूँ
हैन
लिखना तो है ही
आखिर स्त्री विमर्श है
चलो बेटों को ही कोसती हूँ
पर ये क्या
मेरी तो आँखों पर पट्टी चढ़ गई
पुत्र में तो कोई दोष दिखाई ही नहीं देता
फिर किस पुरूष को कोसूं ?
उन्हें जिन्हें मैं ठीक तरह से जानती भी नहीं हूँ ?
***************************
©किरण सिंह
Thursday, 3 September 2015
देख चाँद
!!!!!" देख चाँद !!!!!
**************
देखो चाँद दशा मेरी
कुछ तुम भी दो दीक्षा
कितना लोगे तुम मेरे
धैर्य की परीक्षा
मैं तो ठूंठ पेड़ हूँ
कोई आता नहीं यहाँ
खग नीड़ ले उड़े
जाने कहाँ कहाँ
ना कोयलिया गाती
ना पथिक ही कोई आता
अपनी ही जिंदगानी
अब और नहीं सुहाता
कभी पुरवाई की आहट
कभी किरण की चाहत
आस लगाए बैठे
कभी तो मिलेगी राहत
तुम ही रहे हो साक्षी
मैं था महत्वाकांक्षी
पथिक को देता आया छाया
अब नहीं किसी को माया
फिर मैं दूंगा अर्घ तुम्हें
बस सावन को आने दो
छट जायेंगे दुख के बादल
मन में इक आस जगाने दो
नहीं रहता है समय एक सा
यह तो ध्रुव सत्य है
मैं बदलता हूँ तुम भी बदलो
यही समय का कथ्य है
जीवन में सत्कर्म करो
मत करो फल की इच्छा
नित्य पाठ करो गीता का
फिर करो समीक्षा
***********************
© copyright Kiran singhd
फिर आओ नन्दलाल धरा पर
फिर आओ नन्दलाल धरा पर
**********************
फिर आओ नन्दलाल धरा पर
लेकर नव अवतार
फैल गया है इस धरती पर
फिर से अत्याचार
राह निहारे यशुमति मैया
सूना है घर आंगन
मटकी दधि से भरी हुई है
आओ खाने माखन
प्रतीक्षारत राधा रानी
बैठीं पलक बिछाये
छेड़ो मुरली तुम मधुवन में
हम सब नाचे गायें
*********************
किरण सिंह
Sunday, 30 August 2015
मैं बावरी
मैं बावरी जोगन बन गई
पिया तुम्हारी प्रीत में
सुध-बुध अपना खो गई मैं
मन से तेरी हो गई मैं
हार कर भी दिल अपना मैं
खुश हूँ तेरी जीत में
मैं बावरी जोगन.................
पल भर भी तुझे भूल न पाऊँ
बोलो प्रीतम क्या मैं गाऊँ
जब भी लिखती छन्द में ढलकर
आ जाते हो गीत में
मैं बावरी जोगन...................
कहीं भी तुझ बिन जी नहीं लागे
कैसे हैं ये प्रेम के धागे
बांध लिये हमें जाने कैसे
छल गई मैं इस रीत में
मैं बावरी जोगन......................
हर तरफ़ दिखता तू ही है
कहीं ईश तू ही तो नहीं है
हर धड़कन में तू ही झंकृत
मेरे हर संगीत में
मैं वैरागन जोगन....................
©किरण सिंह
Tuesday, 25 August 2015
तुम अपना धीरज मत खोना
तुम अपना धीरज मत खोना
समस्याएँ आएँगी.. ही
लौट पुनः वो जाएँगी भी
घबरा कर जीवन पथ में तुम विचलित मत होना
तुम अपना धीरज मत खोना
कोशिश तो करते रहना है
लक्ष्य दूर भले कितना .है
प्रारंभिक असफलताओं से कभी हताश मत होना
तुम अपना धीरज मत खोना
पथ में चलते रहो ..निरन्तर
जितना भी हो सके यत्न कर
काँटे छलनी किए पांव तो साहस खो मत रोना
तुम अपना धीरज मत खोना
समय एक सा नहीं रहता है
उसकी नियति में चलना है
लौटेगा जब काल चक्र तुम खुशियों के पुष्प पिरोना
तुम अपना धीरज मत खोना
……………………………
© किरण सिंह