Tuesday, 1 August 2017

सिर्फ खूबसूरती ही नहीं भाग्य भी बढ़ाता है सोलह श्रृंगार

औरत और श्रृंगार एकदूसरे के पूरक हैं अब तक तो यही माना जाता आ रहा है और सत्य भी है क्यों कि सामान्यतः औरतों को श्रृंगार के प्रति कुछ ज्यादा ही झुकाव होता है ! हम महिलाएँ चाहे जितना भी पढ़ लिख जाये, कलम से कितनी भी प्रसिद्धि पा लें लेकिन सौन्दर्य प्रसाधन तथा वस्त्राभूषण अपनी तरफ़ ध्यान आकृष्ट कर ही लेते हैं !भारतीय संस्कृति में सुहागनों के लिए 16 श्रृंगार बहुत अहम माने जाते थे
बिंदी
सिंदूर
चूड़ियाँ
बिछुए
पाजेब
नेलपेंट
बाजूबंद
लिपस्टिक
आँखों में अंजन
कमर में तगड़ी
नाक में नथनी
कानों में झुमके
बालों में चूड़ा मणि
गले में नौलखा हार
हाथों की अंगुलियों में अंगुठियाँ
मस्तक की शोभा बढ़ाता माँग टीका
बालों के गुच्छों में चंपा के फूलों की माला

सिर्फ खूबसूरती ही नहीं, भाग्य भी बढ़ाता है सोलह श्रृंगार एसी मान्यता है!
ऋग्वेद में सौभाग्य के लिए किए जा रहे सोलह श्रृंगारों के बारे में विस्तार से बताया गया है।
जहाँ बिंदी भगवान शिव के तीसरे नेत्र की प्रतीक मानी जाती है तो सिंदूर सुहाग का प्रतीक !
काजल बुरी नज़र से बचाता है तो मेंहदी का रंग पति के प्रेम का मापदंड माना जाता है!
मांग के बीचों-बीच पहना जाने वाला यह स्वर्ण आभूषण सिंदूर के साथ मिलकर वधू की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। ऐसी मान्यता है कि नववधू को मांग टीका सिर के ठीक बीचों-बीच इसलिए पहनाया जाता है कि वह शादी के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले और वह बिना किसी पक्षपात के सही निर्णय ले सके।

कर्ण फूल ( इयर रिंग्स) के पीछे ऐसी मान्यता है कि विवाह के बाद बहू को दूसरों की, खासतौर से पति और ससुराल वालों की बुराई करने और सुनने से दूर रहना चाहिए।

गले में पहना जाने वाला सोने या मोतियों का हार पति के प्रति सुहागन स्त्री के वचनवद्धता का प्रतीक माना जाता है!
पहले सुहागिन स्त्रियों को हमेशा बाजूबंद पहने रहना अनिवार्य माना जाता था और यह सांप की आकृति में होता था। ऐसी मान्यता है कि स्त्रियों को बाजूबंद पहनने से परिवार के धन की रक्षा होती और बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।
नवविवाहिता के हाथों में सजी लाल रंग की चूड़ियां इस बात का प्रतीक होती हैं कि विवाह के बाद वह पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। हरा रंग शादी के बाद उसके परिवार के समृद्धि का प्रतीक है।
सोने या चाँदी से बने कमर बंद में बारीक घुंघरुओं वाली आकर्षक की रिंग लगी होती है, जिसमें नववधू चाबियों का गुच्छा अपनी कमर में लटकाकर रखती हैं! कमरबंद इस बात का प्रतीक है कि सुहागन अब अपने घर की स्वामिनी है।
और पायल की सुमधुर ध्वनि से घर आँगन तो गूंजता ही था साथ ही बहुओं पर कड़ी नज़र की रखी जाती थी कि वह कहाँ आ जा रही है !
इस प्रकार पुरानी परिस्थितियों, वातावरण तथा स्त्रियों के सौन्दर्य को ध्यान में रखते हुए सोलह श्रृंगार चिन्हित हुआ था!
किन्तु आजकल सोलह श्रृंगार के मायने बदल से गये हैं क्योंकि आज के परिवेश में कामकाजी महिलाओं के लिए सोलह श्रृंगार करना सम्भव भी नहीं है फिर भी तीज त्योहार तथा विवाह आदि में पारम्परिक परिधानों के साथ महिलाएँ सोलह श्रृंगार करने से नहीं चूकतीं !
सोलह श्रृंगार भी हमारी संस्कृति और सभ्यता को बचाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है !

©किरण सिंह

Wednesday, 26 July 2017

अरे रामा अंगना में

अरे रामा अंगना में
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अरे रामा अंगना में बरसे बदरिया
भीजेके करे मनवा ए हरी

आइल बरखा नाचत गावत
छनन छनन जइसे घूंघरू बजावत
अरे रामा पूरब से बहे पूरवइया
भीजेके करे...........................

धानी चूनरिया सइयाँ ले अइले
चूड़ी कंगन सेट मिलइले
अरे रामा पहनूँ त चूवे पसीनवा
भीजेके करे........................

लुका छुपी खेले चंदा तारा
कबो अन्हार कबो उजियारा
अरे रामा धीरे से चमके बिजुरिया
भीजेके करे..........................

घरवा में जीयरा घबराये
कड़क कड़क बिजुरी डेरवाये
चल सइयाँ अंगना बिछाव खटोलवा
भीजेके करे...............................

©किरण सिंह

Monday, 17 July 2017

जीत की हार

जीत की हार
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प्रेम बारीक धागा है
एहसासों का
जो
उलझ कर हृदय में
फँस जाता है
कभी-कभी
तब
करता है मस्तिष्क
बार बार
सुलझाने की कोशिश
प्रेम के धागों को
और खुद भी उलझ जाता है
सुलझाने के क्रम में
मस्तिष्क
कोशिश भी करता है
तोड़ने की
और
पा लेता है कामयाबी भी
हो जाता है विजयी
किन्तु
अपराध बोध से ग्रसित होने लगता है
व्याघात करती हैं
बार बार
कुंडली मारे सर्प की तरह
स्मृतियाँ
प्रेम की
फिर मस्तिष्क
हो जाता है परेशान
महसूस करता है
खुद को
हारा हुआ
जीतकर भी
छोटे से कोमल
दिल से
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©किरण सिंह

Tuesday, 20 June 2017

दोहे

गदोहा
काजल की है कोठरी , राजनीति परिवेश |
सम्हल कर रखना कदम , धीरे करो प्रवेश ||

©किरण सिंह

मानवता जीवित रहे, बढ़े आपसी प्यार |
चलो मनुज हम तोड़ दें , मजहब की दीवार |

©किरण सिंह

चलते चलते हो गई , जीवन की अब शाम |
दीप जला लूँ  ज्ञान का , मैं लूँ प्रभु का नाम  ||

©किरण सिंह

बीच भँवर नैया फँसी , घिरी घटा घनघोर |
धड़क रहा मेरा जिया, झरे नयन से लोर ||

©किरण सिंह

रखो स्वयं को संतुलित , करो मगर सत्कार |
तारीफ़ करना लाजमी , बनना न चाटुकार ||

©किरण सिंह

रहो हमेशा संतुलित , मिले जीत या हार |
हर हालत में ईश का , व्यक्त करो आभार ||

©किरण सिंह 

अपने जीवन को मनुज , मत जाने दो व्यर्थ |
कर्म करो संसार में , दो जीवन को अर्थ ||

©किरण सिंह

औरों से पहले मनुज , करो आत्मसम्मान |
कभी वहाँ जाना नहीं, जहाँ मिले अपमान ||

©किरण सिंह

यदि चाहो सम्मान तो , बस इतना लो सीख |
दया प्रेम धन मान का , कभी न माँगो भीख ||

©किरण सिंह

भाँति भाँति के लोग हैं , भाँति भाँति के साज |
सुनिये सबकी कीजिये , अपने मन की काज ||

©किरण

अलग अलग सब लोग हैं , सबकी अलग पसंद |
जो तुमको अच्छा लगे ,वही लिखो तुम छन्द ||

©किरण सिंह 

घूम रहे बेखौफ हो  , करके कातिल खून |
कैसे होगा न्याय जब , अंधा है कानून ||

©किरण सिंह

बिकता है ईमान अब , बिकते हैं इन्सान |
सोच रहा हर आदमी , आफत में है जान ||

©किरण सिंह

यूँ तो इस संसार में, मिलते लोग अनेक |
पर दिल में रहते वही , जिनका दिल हो नेक ||

©किरण सिंह

स्वारथ से जो भी जुड़े, गये अन्ततः टूट |
जुड़ते हैं जो प्रेम से , बन्धन वही अटूट ||

। ©किरण सिंह

स्वारथ से रिश्ते जुड़े , स्वारथ में ही प्यार |
स्वारथ है संसार में , करो सत्य स्वीकार ||

©किरण सिंह

समझौता सीखो प्रथम , फिर करना अनुबंध |
सिर्फ प्रेम से ही नहीं , टिकते हैं सम्बन्ध ||

©किरण सिंह

माना स्वारथ से टिका ,कोई भी सम्बन्ध  |
फिर भी होना लाजमी , उनसे कुछ अनुबंध ||

©किरण सिंह

हर रिश्तों के आपसी , होते हैं अनुबंध |
सीमा को लांघो नहीं , तोड़ो मत तटबंध ||

©किरण सिंह

कैसे सम्भव हो भला , करना सबको तुष्ट |
लोगों को जब ईश भी , कर न सके संतुष्ट ||

©किरण सिंह

मूरख मानुष ही करे , अपनी स्वयं बखान |
खुशबू है किस फूल की , हो जाती पहचान ||

©किरण सिंह

कठपुतली है आदमी , डोर ईश के हाथ |
रंगमंच है जिंदगी,नाचो गाओ साथ ||

©किरण सिंह

भटक रहा मन बावरा , सूझे नहीं उपाय |
कृपा करो माँ शारदे , कुमति सुमति हो जाय ||

©किरण सिंह

मन चंचल उर बावरा,बस तू ही मति धीर |
मन को समझाओ किरण ,रहता बहुत अधीर ||

©किरण सिंह

खत्म आतंकवाद को , कर दो वीर जवान |
गायेंगे हम गर्व से , जय जय हिन्दुस्तान ||

©किरण सिंह

मिट्टी लेकर सत्य की , धर्म मार्ग दो लीप |
बाती लो विश्वास की , करो प्रज्वलित दीप ||

दोहा

वृक्ष लगे जो झूठ के , आज हो रहे ठूठ |
कभी सत्य के सामने , नहीं टिका है झूठ ||

©किरण सिंह

आँखों में सपने नये , मस्तक पर है श्वेद |
तुमपर ही दुनिया टिकी , तुमसे ही क्यों भेद ||

©किरण सिंह

मीठी माया जाल में , फंसो नहीं इन्सान |
असली नकली कौन है, अन्तः से पहचान ||

©किरण सिंह

मायावी संसार है , मानुष आँखें खोल |
ओ मन विचलित बावरे , इधर उधर मत डोल ||

©किरण सिंह

उग आया सूरज नभ में, चिड़ियाँ छेड़ीं राग |
खिलकर किरणें कह रहीं , भोर भयो अब जाग ||

©किरण सिंह

यूँ तो अपने आप में , रचना सभी विशेष |
लेखन सार्थक है वही , जिसमें हो संदेश ||

©किरण सिंह

लक्ष्मी शक्ति सरस्वती , नारी तेरा रूप |
तुमसे ही संसार है, तेरा कृत्य अनूप ||

©किरण सिंह

बरखा
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सूरज ज्यों नभ में उगा , गयी यामिनी भाग |
खिलकर किरणें कह रहीं , भोर भयो अब जाग ||

©किरण सिंह

बदरा नभ में छा गये , शीतल बहे बयार |
मनभावन ऋतु आ गई , लेकर संग बहार ||

©किरण सिंह

बरखा रानी आ गईं , लाईं संग फुहार  |
बरस बरस बूंदें करें , छनन छनन छनकार ||

©किरण सिंह

नभ में सतरंगी छटा, बिखरा बिखरा जाय |
इन्द्र धनूषी चुन्दरी, मनवा बड़ा लुभाय ||

©किरण सिंह

जीत हो गई प्रीत की , देखो आखिरकार |
वसुंधरा हर्षित हुईं , नभ छलकाये प्यार ||

©किरण सिंह 

©किरण सिंह।

नारी

तुमको मुझसे प्यार है , कहते हो हर बार  |
मुझको भी स्वीकार है , प्रेम तुम्हारा प्यार ||

©किरण सिंह

बैठो मेरे सामने , करो नहीं इज़हार |
आँखों में तेरे सजन , पढ़ लूंगी मैं प्यार  ||

©किरण सिंह

पिया मिले थे स्वप्न में , लाये लिखकर गीत |
जिया मेरा धड़क गया , गूँज उठा संगीत ||

©किरण सिंह

नयनो में सपने नये , उर में भर ली प्रीत |
प्रिय तुमसे ऐसे मिली , जैसे सुर संगीत ||

©किरण सिंह

चुटकी भर सिंदूर से, गयी स्वयं को हार |
इतराई सौभाग्य पर, कर सोलह श्रृंगार ||

चूड़ी कंगन हथकड़ी , पायल बेड़ी पाँव |
बंधन मंगल सूत्र का , नाक नथनिया ठाँव ||

©किरण सिंह

सिंदूर बिन्दी चूड़ियाँ , साजन का उपहार |
इनसे ही तो है खुशी , इनसे  ही श्रृंगार |

©किरण सिंह

बिंदी है मन मोहिनी , जादूगर सिंदूर |
संग सात फेरे लिये , कैसे होगे दूर ||

©किरण सिंह

प्रिय मैं ठहरी बावरी , मैं क्या जानूँ प्रीत |
तुम ही मेरे छन्द हो , तुम ही मेरे गीत ||

©किरण सिंह
प्रिय मैं तो पाती लिखी , शब्दों में भर प्रीत |
बहकी मेरी लेखनी, लिखा गया नव गीत ||

©किरण सिंह

पिया तुम्हारे प्रेम में , गई स्वयं को भूल |
अब पथ में चिन्ता नहीं , मिले फूल या शूल ||

©किरण सिंह

अक्षर अक्षर जोड़ के , सुनो प्रिये मन मीत |
तुमको मैनें लिख दिया , छन्द बद्ध कर गीत ||

©किरण सिंह

घड़ी प्रतीक्षा में कटे , चैन सुबह ना शाम |
कजरा लेकर लिख दिया , पाती पी के नाम ||

©किरण सिंह

बाँई आँख फड़क रही , छत पर बोले काग |
शगुन उचर कर कर रहा , जागे मेरे भाग ||

©किरण सिंह

चलकर मेरी लेखनी , ज्यों ही लिख दी मीत |
हृदय तार झंकृत हुआ ,  गूँज उठा संगीत ||

©किरण सिंह

जुड़ते हैं ज्यों प्रेम से , दो हृदयों के तार |
उठे तरंगें एक में , दूजे में झनकार ||

©किरण सिंह

यही प्रीत की रीत है , क्यों पछताऊँ मीत |
हार गई खुद को भले , लिया तुम्हें पर  जीत ||

©किरण सिंह

प्रिय से मिलकर नेह से , होतीं आँखें चार |
धीरे-धीरे ही सही , हो जाता है प्यार ||

©किरण सिंह

जबसे तुमसे जुड़ गई , मेरे मन की डोर |
मुझपर ही मेरा सजन, चले नहीं अब जोर ||

©किरण सिंह 

साँसें लय में चल रही , धड़कन देती ताल |
चूमते पिया अधर मैं, हुई शर्म से लाल ||

कर सोलह श्रृंगार ज्यों , झटके मैनें बाल ||
सजना से नयना मिले , हुई शर्म से लाल  |

©किरण सिंह

Tuesday, 30 May 2017

#लीव_इन_रिलेशनशिप

लिव इन रिलेशनशिप
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लिव इन रिलेशनशिप भी
एक कविता ही तो है
छन्द मुक्त
न रीति रिवाजों की चिन्ता
न मंगलसूत्र का बन्धन
न चूड़ियों की हथकड़ी
न पहनी पायल बेड़ी
न माँग में सिंदूर
न सौभाग्य की निशानी
किन्तु वह खुश हैं स्वयं में
बिन ब्याही ही
क्यों कि
वह हैं उन्मुक्त
जैसे कविता
छन्द मुक्त
न अर्ध विराम न पूर्ण विराम
न मात्राओं की गिनती
न यति न ही गति ही
न रदीफ़ न काफिया
लिखी जातीं हैं बेबहर
फिर भी कभी कभी
ढा ही देतीं हैं कहर
क्यों कि इनमें भावों का
होता है पूर्ण समावेश
कुछ तो है इनमें विशेष
रस युक्त
कविता
छन्द मुक्त
भले न गाई जायें
मन्दिरों में
भजन और कीर्तनों में
भले न गाई जायें
मांगलिक रस्म रिवाजों में
फिक्र नहीं इन्हें
क्यों कि बटोर ही लेती हैं वाहवाही
कर देतीं हैं मन मुग्ध
क्यों कि
विषय होते हैं पुष्ट
लीव इन रिलेशनशिप
भले ही न हो सकें सम्मानित
विवाहिताओं की तरह
पीघर में नहीं मिले प्रवेश
भले न दें कोई संदेश
किन्तु
ये
हैं स्वयं में तुष्ट
जैसे कविता
छन्द मुक्त
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©किरण सिंह
अक्षर अक्षर जोड़ कर , सुनो प्रिये मन मीत |
तुमको ही तो लिख दिया , छन्द बद्ध कर गीत ||

©किरण सिंह

नयनो में सपने नये , उर में भर ली प्रीत |
प्रिय तुमसे ऐसे मिली , जैसे सुर संगीत ||

©किरण सिंह

चुटकी भर सिंदूर से, गयी स्वयं को हार |
इतराई सौभाग्य पर, कर सोलह श्रृंगार ||

चूड़ी कंगन हथकड़ी , पायल बेड़ी पाँव |
बंधन मंगल सूत्र का , नाक नथनिया ठाँव ||

©किरण सिंह

प्रिय मैं तो पाती लिखी , शब्दों में भर प्रीत |
बहकी मेरी लेखनी, लिखा गया नव गीत ||

©किरण सिंह

Tuesday, 11 October 2016

सुनो प्रियतम

सुनो ना प्रियतम ..............................
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सुनो ना प्रियतम नेह डोर  अब बंध गई तुमसे
प्रीत हॄदय की धड़कनों में ध्वनि छिड़ गई तुमसे

चांद तारे सजी बिंदिया चमके जैसे बिजुरी
पिया मेरी मांग सिंदूरी लाल सज गई तुमसे

शब्द संधि कर छन्द में सज लिखे नई गीत गज़ल
जिंदगी की सुर सरगम संगीत बन गई तुमसे

कंगन  खनक खनक कर  पुकारती हैं तुम्हें पिया
पायल की रूनझुन घुंघरू भी छनक गईं तुमसे

उर आपका प्रेम सागर  डूब न जाएँ कहीं हम
मैं गंगा मिरे लक्ष्य हो तुम मैं मिल गई तुमसे

तुम सूरज मैं किरण पथ पर तेरे संग चली हूँ
जैसे उगे प्रिय तुम गगन में मैं खिल गई तुमसे
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© copyright @ Kiran singh

Monday, 26 September 2016

मछलियों की तरह पकड़िये प्रेम को

मछलियों की तरह पकड़िये प्रेम को
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मछलियों की तरह पकड़िये प्रेम को
आहिस्ता-आहिस्ता
कि कहीं जोर से पकड़ने पर
छिटक न जाये
जरूरी है प्रेम की जिंदगी के लिए
विश्वास की सांसें
मीठी मीठी बातें
स्नेहिल स्पर्श
त्याग सहर्ष
प्रीत की रीत है  कुछ
जीवन संगीत है कुछ
अक्षरों के मेल
अभिव्यक्ति भावनाओं की
कभी-कभी
कर जाती है , कह जाती हैं , समझाती हैं ,
आँखों में लिखीं हैं जो
गीत गज़ल गीतिका
हृदय सिंचित प्रीतिका
आहिस्ता-आहिस्ता
शीतल हवा की तरह है प्रेम शायद
तभी तो
स्पर्श की अनुभूति मात्र ही
जीवंत कर देती है
मृत पड़ी लताभिलाषाओं को
जिद्दी है प्रेम
शातिर भी है 
बेवकूफ़ बनाता है दिलों को
राज करने के लिए दिलों पर
अपना कब्जा जमा लेता है प्रेम 
प्रेम से
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©किरण सिंह