Friday, 11 August 2017

हमारे बुजुर्ग हमारे धरोहर हैं

हमारे बुजुर्ग हमारे  धरोहर हैं..! जिन्होंने अपने सुन्दर घर बगिया को अपने खून पसीने से सींच सींच कर उसे सजाया हो इस आशा से कि कुछ दिनों की मुश्किलों के उपरान्त उस बाग में वह सुकून से रह सकेंगे ! परन्तु जब उन्हें ही अपनी सुन्दर सी बगिया के छांव से वंचित कर दिया जाता है तब वह  बर्दाश्त नहीं कर पाते .और खीझ से इतने चिड़चिड़े हो जाते हैं कि अपनी झल्लाहट घर के लोगों पर बेवजह ही निकालने लगते हैं जिसके परिणाम स्वरूप घर के लोग उनसे कतराने लगते हैं ...! तब बुजुर्ग अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं ! "उनके अन्दर नकारात्मक विचार पनपने लगता है फिर शुरू हो जाती है बुजुर्गों की समस्या  !
परन्तु कुछ बुजुर्ग बहुत ही समझदार होते हैं, वो नई पीढ़ी के जीवन शैली के साथ  समझौता कर लेते हैं, उनके क्रिया कलापो में टांग नहीं अड़ाते  हैं बल्कि घर के छोटे मोटे कार्यो में उनकी मदद कर उनके साथ दोस्तों की भांति विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, और घर के सभी सदस्यों के हृदय में अपना सर्वोच्च स्थान बना लेते हैं ! उनका जीवन खुशहाल रहता है ! 
बुजुर्गों के समस्याओं का मुख्य कारण- एकल तथा छोटे परिवारों का होना है जहाँ  बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है और नौजवानों की संख्या घट रही है  ! उनके बेटे बेटियाँ बाहर कार्यरत रहते हैं,  जिनकी दिनचर्या काफी व्यस्त रहती है  ! उनके यहाँ जाने पर बुजुर्ग कुछ अलग थलग  से पड़ जाते हैं,  क्यों कि बेटा - बहू तथा बेटी दामाद सभी कार्यरत रहते हैं, वहां की दिनचर्या उनके अनुकूल नहीं होती ,  जिनमें  सामंजस्य स्थापित करना उनके लिए कठिन हो जाता है ! इसलिए वो अपने घर और अपने समाज में रहना अधिक पसंद करते हैं !  ऐसी स्थिति में हम किसे दोषी ठहराएं ? कहना मुश्किल है क्योंकि यहां पर परिस्थितियों को ही दोषी ठहराकर हम तसल्ली कर सकते हैं क्यों कि  जो बोया वही काटेंगे!
भौतिक सुखों की चाह में सभी अपने बच्चों को ऐसे रेस का घोड़ा बना रहे हैं जिनका लक्ष्य होता है किसी कीमत पर सिर्फ और सिर्फ अमीर बनना इसलिए उनकी कोमल भावनायें दिल के किसी कोने में दम तोड़ रही होती हैं बल्कि भावुक लोगों को को वे इमोशनल फूल की संज्ञा तक दे डालते हैं!

इन समस्याओं के समाधान के लिए कुछ उपाय किये जा सकते है !
घर लेते समय यह ध्यानमें जरूर रखना चाहिए कि हमारे पड़ोसी भी समान उम्र के हों ताकि हमारे बुजुर्गों को उनके माता पिता से भी मिलना जुलना होता रहे और हमारे बुजुर्ग भी आपस में मैत्रीपूर्ण संबंध रखते हुए दुख सुख का आदान प्रदान कर सके..! मंदिरों में भजन कीर्तन होता रहता है उन्हें अवश्य मंदिर में भेजने का प्रबंध करें ..! प्रार्थना और भजन कीर्तन से मन में नई उर्जा का प्रवेश होता है जिससे हमारे बुजुर्ग प्रसन्न रहेंगे, और साथ में हमें भी प्रसन्नता मिलेगी ..!
इसके अलावा बिल्डर्स को भी अपार्टमेंट निर्माण के दौरान युवा और बच्चों के सुविधाओं का ध्यान रखने के साथ  साथ बुजुर्गों के सुविधाओं तथा मनोरंजन का भी खयाल रखना चाहिए जहां बुजुर्गो के लिए अपनी कम्युनिटी हॉल हो जहां वो बैठकर बात चित ,  भजन कीर्तन, पठन पाठन आदि कर सके ! साथ ही सरकारी तथा समाजसेवी संस्थानों को भी ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जहां बुजुर्गों के सुरक्षा,  सुविधा, एवं मनोरंजन की पूर्ण व्यवस्था हो ! बुजुर्गों के पास अनुभव बहुत रहता है सरकार को ऐसी व्यवस्था बनाना चाहिए जहां उनके अनुभवों का सदुपयोग हो सके जिससे उनकी व्यस्तता बनी रहे !
बुजुर्गों को अपने लिए कुछ पैसे बचाकर रखना चाहिए सबकुछ अपनी जिंदगी में ही औलाद के नाम नहीं कर देना चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर अपनी सेवा  - सुश्रुसा दवाइयों आदि में खर्च कर सकें !

जिन्हें अपनी संतान न हो उन्हें किसी भी बच्चे को गोद अवश्य ले लेना चाहिए ! क्यों कि जिनके औलाद नहीं होते उनके सम्पत्ति में हिस्सेदारी लेने तो बहुत से लोग आ जाते हैं परन्तु उनके सेवा सुश्रुसा का कर्तव्य निभाने के लिए बहुत कम लोग ही तैयार होते हैं !
एक ऐसी ही निः संतान अभागी बुढ़िया का शव मेरे आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूम रहा है जिसका शव पड़ा हुआ था और रिश्तेदारों में धन के लिये आपस में झगड़ा हो रहा था! कोई बैंक अकाउंट चेक कर रहा था तो कोई गहने ढूढ रहा था मगर जीते जी किसी ने उसकी देखभाल ठीक से नहीं की! सभी  एकदूसरे पर दोषारोपण करते रहे तथा कहते रहे कि जो सम्पत्ति लेगा वह सेवा करेगा लेकिन वो बूढ़ी चाहती थी कि मेरी सम्पति सभी को मिले क्यों कि जब अपना बच्चा नहीं है तो सभी रिश्तों के बच्चे बराबर हैं!
आज की परिस्थितियों में बुजुर्गों को थोड़ा उदार तथा मोह माया से मुक्त होकर संत हृदय का होना पड़ेगा अर्थात नौकर चाकर पर खर्च करना होगा जिससे उनकी ठीक तरीके से देखभाल हो सके! क्यों कि अक्सर देखा जाता है कि गरीब अपने  बुजुर्गों की सेवा तथा देखभाल तो स्वयं कर लेते किन्तु अमीरों को सेवा करने की आदत नहीं होती ऐसे में उन्हें सेवक पर ही निर्भर होना होता है और सेवक तो तभी मिलेंगे न जब कि खर्च की जाये! यदि बुजुर्ग स्वयं नहीं खर्च करते हैं अपना पैसा खुद पर तो उनकी संतानों को चाहिए कि अपने माता-पिता के लिए सेवक नियुक्त कर दें क्यों कि माता-पिता के सेवा सुश्रुसा का दायित्व तो उन्हीं का है यदि नहीं कर सकते तो किन्हीं से करवायें वैसे भी अपने पेरेंट्स के सम्पत्ति के उत्तराधिकारी तो वे ही हैं!
यह सर्वथा ध्यान रखना चाहिए कि कल को सभी को इसी अवस्था से गुजरना है, हम आज जो अपने बुजुर्गों को देंगे हमारी औलादें हमें वही लौटाएंगी !
माना कि समयाभाव है फिर भी कुछ समय में से समय चुराकर बुजुर्गों पर खर्च करना चाहिए जिससे हमें तो आत्मसंतोष मिलेगा ही.. बुजुर्गों को भी कितनी प्रसन्नता मिलेगी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है ..!
©किरण सिंह

Wednesday, 9 August 2017

अस्थाई प्रेम की परिभाषा

आज की पीढ़ी का दिल
****************
आज की पीढ़ी का दिल
कितना बड़ा है न
बिल्कुल कम्प्यूटर की तरह
जब जिसे चाहा
मेमरी कार्ड में
भर लिया
और जब जिसे चाहा
उसे उड़ा दिया
शायद
नहीं है इनका प्रेम
इमोशनल फूल
और
एक हमारा दिल
कितना छोटा था न
कि एक से अधिक
के लिए
जगह ही नहीं होता था

©किरण सिंह

Tuesday, 1 August 2017

यह भारत की बेटी है

यह भारत की बेटी है
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तोड़ देगी अब वर्जना
सुनो सिंहनी की गर्जना
बहुत कर ली माया मनमानी
लो समर में कूद पड़ी क्षत्राणी

लोलुप आँखें फोड़ देगी
बढ़ती बांहें को तोड़ देगी
स्वाभिमानिनी नेतृ है
यह भारत की बेटी है

अब बात आ गई आन पर
हर नारी के सम्मान पर
गंदी जुबां को काट देगी
मर्यादा को पाट देगी

बह चली बलिया की बयार
अबतक रोक नहीं कोई पाया है
लार्ड माउंटेन से इंदिरा गांधी तक को
हैसियत बतलाया है

छूट चुका है तीर कमान से
रोक सको तो रोक लो
चमक चमक समशीर कह रही
भारत वासी सीना ठोक लो

अब न रुकेंगे अब न झुकेंगे
हद हो गई अपमान की
चलो लगा दें मान की खातिर
बाजी अपने जान की
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©किरण सिंह With Rajendra Pratap Singh

सिर्फ खूबसूरती ही नहीं भाग्य भी बढ़ाता है सोलह श्रृंगार

औरत और श्रृंगार एकदूसरे के पूरक हैं अब तक तो यही माना जाता आ रहा है और सत्य भी है क्यों कि सामान्यतः औरतों को श्रृंगार के प्रति कुछ ज्यादा ही झुकाव होता है ! हम महिलाएँ चाहे जितना भी पढ़ लिख जाये, कलम से कितनी भी प्रसिद्धि पा लें लेकिन सौन्दर्य प्रसाधन तथा वस्त्राभूषण अपनी तरफ़ ध्यान आकृष्ट कर ही लेते हैं !भारतीय संस्कृति में सुहागनों के लिए 16 श्रृंगार बहुत अहम माने जाते थे
बिंदी
सिंदूर
चूड़ियाँ
बिछुए
पाजेब
नेलपेंट
बाजूबंद
लिपस्टिक
आँखों में अंजन
कमर में तगड़ी
नाक में नथनी
कानों में झुमके
बालों में चूड़ा मणि
गले में नौलखा हार
हाथों की अंगुलियों में अंगुठियाँ
मस्तक की शोभा बढ़ाता माँग टीका
बालों के गुच्छों में चंपा के फूलों की माला

सिर्फ खूबसूरती ही नहीं, भाग्य भी बढ़ाता है सोलह श्रृंगार एसी मान्यता है!
ऋग्वेद में सौभाग्य के लिए किए जा रहे सोलह श्रृंगारों के बारे में विस्तार से बताया गया है।
जहाँ बिंदी भगवान शिव के तीसरे नेत्र की प्रतीक मानी जाती है तो सिंदूर सुहाग का प्रतीक !
काजल बुरी नज़र से बचाता है तो मेंहदी का रंग पति के प्रेम का मापदंड माना जाता है!
मांग के बीचों-बीच पहना जाने वाला यह स्वर्ण आभूषण सिंदूर के साथ मिलकर वधू की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। ऐसी मान्यता है कि नववधू को मांग टीका सिर के ठीक बीचों-बीच इसलिए पहनाया जाता है कि वह शादी के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले और वह बिना किसी पक्षपात के सही निर्णय ले सके।

कर्ण फूल ( इयर रिंग्स) के पीछे ऐसी मान्यता है कि विवाह के बाद बहू को दूसरों की, खासतौर से पति और ससुराल वालों की बुराई करने और सुनने से दूर रहना चाहिए।

गले में पहना जाने वाला सोने या मोतियों का हार पति के प्रति सुहागन स्त्री के वचनवद्धता का प्रतीक माना जाता है!
पहले सुहागिन स्त्रियों को हमेशा बाजूबंद पहने रहना अनिवार्य माना जाता था और यह सांप की आकृति में होता था। ऐसी मान्यता है कि स्त्रियों को बाजूबंद पहनने से परिवार के धन की रक्षा होती और बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।
नवविवाहिता के हाथों में सजी लाल रंग की चूड़ियां इस बात का प्रतीक होती हैं कि विवाह के बाद वह पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। हरा रंग शादी के बाद उसके परिवार के समृद्धि का प्रतीक है।
सोने या चाँदी से बने कमर बंद में बारीक घुंघरुओं वाली आकर्षक की रिंग लगी होती है, जिसमें नववधू चाबियों का गुच्छा अपनी कमर में लटकाकर रखती हैं! कमरबंद इस बात का प्रतीक है कि सुहागन अब अपने घर की स्वामिनी है।
और पायल की सुमधुर ध्वनि से घर आँगन तो गूंजता ही था साथ ही बहुओं पर कड़ी नज़र की रखी जाती थी कि वह कहाँ आ जा रही है !
इस प्रकार पुरानी परिस्थितियों, वातावरण तथा स्त्रियों के सौन्दर्य को ध्यान में रखते हुए सोलह श्रृंगार चिन्हित हुआ था!
किन्तु आजकल सोलह श्रृंगार के मायने बदल से गये हैं क्योंकि आज के परिवेश में कामकाजी महिलाओं के लिए सोलह श्रृंगार करना सम्भव भी नहीं है फिर भी तीज त्योहार तथा विवाह आदि में पारम्परिक परिधानों के साथ महिलाएँ सोलह श्रृंगार करने से नहीं चूकतीं !
सोलह श्रृंगार भी हमारी संस्कृति और सभ्यता को बचाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है !

©किरण सिंह

Wednesday, 26 July 2017

अरे रामा अंगना में

अरे रामा अंगना में
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अरे रामा अंगना में बरसे बदरिया
भीजेके करे मनवा ए हरी

आइल बरखा नाचत गावत
छनन छनन जइसे घूंघरू बजावत
अरे रामा पूरब से बहे पूरवइया
भीजेके करे...........................

धानी चूनरिया सइयाँ ले अइले
चूड़ी कंगन सेट मिलइले
अरे रामा पहनूँ त चूवे पसीनवा
भीजेके करे........................

लुका छुपी खेले चंदा तारा
कबो अन्हार कबो उजियारा
अरे रामा धीरे से चमके बिजुरिया
भीजेके करे..........................

घरवा में जीयरा घबराये
कड़क कड़क बिजुरी डेरवाये
चल सइयाँ अंगना बिछाव खटोलवा
भीजेके करे...............................

©किरण सिंह

Monday, 17 July 2017

जीत की हार

जीत की हार
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प्रेम बारीक धागा है
एहसासों का
जो
उलझ कर हृदय में
फँस जाता है
कभी-कभी
तब
करता है मस्तिष्क
बार बार
सुलझाने की कोशिश
प्रेम के धागों को
और खुद भी उलझ जाता है
सुलझाने के क्रम में
मस्तिष्क
कोशिश भी करता है
तोड़ने की
और
पा लेता है कामयाबी भी
हो जाता है विजयी
किन्तु
अपराध बोध से ग्रसित होने लगता है
व्याघात करती हैं
बार बार
कुंडली मारे सर्प की तरह
स्मृतियाँ
प्रेम की
फिर मस्तिष्क
हो जाता है परेशान
महसूस करता है
खुद को
हारा हुआ
जीतकर भी
छोटे से कोमल
दिल से
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©किरण सिंह

Tuesday, 20 June 2017

दोहे

गदोहा
काजल की है कोठरी , राजनीति परिवेश |
सम्हल कर रखना कदम , धीरे करो प्रवेश ||

©किरण सिंह

मानवता जीवित रहे, बढ़े आपसी प्यार |
चलो मनुज हम तोड़ दें , मजहब की दीवार |

©किरण सिंह

चलते चलते हो गई , जीवन की अब शाम |
दीप जला लूँ  ज्ञान का , मैं लूँ प्रभु का नाम  ||

©किरण सिंह

बीच भँवर नैया फँसी , घिरी घटा घनघोर |
धड़क रहा मेरा जिया, झरे नयन से लोर ||

©किरण सिंह

रखो स्वयं को संतुलित , करो मगर सत्कार |
तारीफ़ करना लाजमी , बनना न चाटुकार ||

©किरण सिंह

रहो हमेशा संतुलित , मिले जीत या हार |
हर हालत में ईश का , व्यक्त करो आभार ||

©किरण सिंह 

अपने जीवन को मनुज , मत जाने दो व्यर्थ |
कर्म करो संसार में , दो जीवन को अर्थ ||

©किरण सिंह

औरों से पहले मनुज , करो आत्मसम्मान |
कभी वहाँ जाना नहीं, जहाँ मिले अपमान ||

©किरण सिंह

यदि चाहो सम्मान तो , बस इतना लो सीख |
दया प्रेम धन मान का , कभी न माँगो भीख ||

©किरण सिंह

भाँति भाँति के लोग हैं , भाँति भाँति के साज |
सुनिये सबकी कीजिये , अपने मन की काज ||

©किरण

अलग अलग सब लोग हैं , सबकी अलग पसंद |
जो तुमको अच्छा लगे ,वही लिखो तुम छन्द ||

©किरण सिंह 

घूम रहे बेखौफ हो  , करके कातिल खून |
कैसे होगा न्याय जब , अंधा है कानून ||

©किरण सिंह

बिकता है ईमान अब , बिकते हैं इन्सान |
सोच रहा हर आदमी , आफत में है जान ||

©किरण सिंह

यूँ तो इस संसार में, मिलते लोग अनेक |
पर दिल में रहते वही , जिनका दिल हो नेक ||

©किरण सिंह

स्वारथ से जो भी जुड़े, गये अन्ततः टूट |
जुड़ते हैं जो प्रेम से , बन्धन वही अटूट ||

। ©किरण सिंह

स्वारथ से रिश्ते जुड़े , स्वारथ में ही प्यार |
स्वारथ है संसार में , करो सत्य स्वीकार ||

©किरण सिंह

समझौता सीखो प्रथम , फिर करना अनुबंध |
सिर्फ प्रेम से ही नहीं , टिकते हैं सम्बन्ध ||

©किरण सिंह

माना स्वारथ से टिका ,कोई भी सम्बन्ध  |
फिर भी होना लाजमी , उनसे कुछ अनुबंध ||

©किरण सिंह

हर रिश्तों के आपसी , होते हैं अनुबंध |
सीमा को लांघो नहीं , तोड़ो मत तटबंध ||

©किरण सिंह

कैसे सम्भव हो भला , करना सबको तुष्ट |
लोगों को जब ईश भी , कर न सके संतुष्ट ||

©किरण सिंह

मूरख मानुष ही करे , अपनी स्वयं बखान |
खुशबू है किस फूल की , हो जाती पहचान ||

©किरण सिंह

कठपुतली है आदमी , डोर ईश के हाथ |
रंगमंच है जिंदगी,नाचो गाओ साथ ||

©किरण सिंह

भटक रहा मन बावरा , सूझे नहीं उपाय |
कृपा करो माँ शारदे , कुमति सुमति हो जाय ||

©किरण सिंह

मन चंचल उर बावरा,बस तू ही मति धीर |
मन को समझाओ किरण ,रहता बहुत अधीर ||

©किरण सिंह

खत्म आतंकवाद को , कर दो वीर जवान |
गायेंगे हम गर्व से , जय जय हिन्दुस्तान ||

©किरण सिंह

मिट्टी लेकर सत्य की , धर्म मार्ग दो लीप |
बाती लो विश्वास की , करो प्रज्वलित दीप ||

दोहा

वृक्ष लगे जो झूठ के , आज हो रहे ठूठ |
कभी सत्य के सामने , नहीं टिका है झूठ ||

©किरण सिंह

आँखों में सपने नये , मस्तक पर है श्वेद |
तुमपर ही दुनिया टिकी , तुमसे ही क्यों भेद ||

©किरण सिंह

मीठी माया जाल में , फंसो नहीं इन्सान |
असली नकली कौन है, अन्तः से पहचान ||

©किरण सिंह

मायावी संसार है , मानुष आँखें खोल |
ओ मन विचलित बावरे , इधर उधर मत डोल ||

©किरण सिंह

उग आया सूरज नभ में, चिड़ियाँ छेड़ीं राग |
खिलकर किरणें कह रहीं , भोर भयो अब जाग ||

©किरण सिंह

यूँ तो अपने आप में , रचना सभी विशेष |
लेखन सार्थक है वही , जिसमें हो संदेश ||

©किरण सिंह

लक्ष्मी शक्ति सरस्वती , नारी तेरा रूप |
तुमसे ही संसार है, तेरा कृत्य अनूप ||

©किरण सिंह

बरखा
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सूरज ज्यों नभ में उगा , गयी यामिनी भाग |
खिलकर किरणें कह रहीं , भोर भयो अब जाग ||

©किरण सिंह

बदरा नभ में छा गये , शीतल बहे बयार |
मनभावन ऋतु आ गई , लेकर संग बहार ||

©किरण सिंह

बरखा रानी आ गईं , लाईं संग फुहार  |
बरस बरस बूंदें करें , छनन छनन छनकार ||

©किरण सिंह

नभ में सतरंगी छटा, बिखरा बिखरा जाय |
इन्द्र धनूषी चुन्दरी, मनवा बड़ा लुभाय ||

©किरण सिंह

जीत हो गई प्रीत की , देखो आखिरकार |
वसुंधरा हर्षित हुईं , नभ छलकाये प्यार ||

©किरण सिंह 

©किरण सिंह।

नारी

तुमको मुझसे प्यार है , कहते हो हर बार  |
मुझको भी स्वीकार है , प्रेम तुम्हारा प्यार ||

©किरण सिंह

बैठो मेरे सामने , करो नहीं इज़हार |
आँखों में तेरे सजन , पढ़ लूंगी मैं प्यार  ||

©किरण सिंह

पिया मिले थे स्वप्न में , लाये लिखकर गीत |
जिया मेरा धड़क गया , गूँज उठा संगीत ||

©किरण सिंह

नयनो में सपने नये , उर में भर ली प्रीत |
प्रिय तुमसे ऐसे मिली , जैसे सुर संगीत ||

©किरण सिंह

चुटकी भर सिंदूर से, गयी स्वयं को हार |
इतराई सौभाग्य पर, कर सोलह श्रृंगार ||

चूड़ी कंगन हथकड़ी , पायल बेड़ी पाँव |
बंधन मंगल सूत्र का , नाक नथनिया ठाँव ||

©किरण सिंह

सिंदूर बिन्दी चूड़ियाँ , साजन का उपहार |
इनसे ही तो है खुशी , इनसे  ही श्रृंगार |

©किरण सिंह

बिंदी है मन मोहिनी , जादूगर सिंदूर |
संग सात फेरे लिये , कैसे होगे दूर ||

©किरण सिंह

प्रिय मैं ठहरी बावरी , मैं क्या जानूँ प्रीत |
तुम ही मेरे छन्द हो , तुम ही मेरे गीत ||

©किरण सिंह
प्रिय मैं तो पाती लिखी , शब्दों में भर प्रीत |
बहकी मेरी लेखनी, लिखा गया नव गीत ||

©किरण सिंह

पिया तुम्हारे प्रेम में , गई स्वयं को भूल |
अब पथ में चिन्ता नहीं , मिले फूल या शूल ||

©किरण सिंह

अक्षर अक्षर जोड़ के , सुनो प्रिये मन मीत |
तुमको मैनें लिख दिया , छन्द बद्ध कर गीत ||

©किरण सिंह

घड़ी प्रतीक्षा में कटे , चैन सुबह ना शाम |
कजरा लेकर लिख दिया , पाती पी के नाम ||

©किरण सिंह

बाँई आँख फड़क रही , छत पर बोले काग |
शगुन उचर कर कर रहा , जागे मेरे भाग ||

©किरण सिंह

चलकर मेरी लेखनी , ज्यों ही लिख दी मीत |
हृदय तार झंकृत हुआ ,  गूँज उठा संगीत ||

©किरण सिंह

जुड़ते हैं ज्यों प्रेम से , दो हृदयों के तार |
उठे तरंगें एक में , दूजे में झनकार ||

©किरण सिंह

यही प्रीत की रीत है , क्यों पछताऊँ मीत |
हार गई खुद को भले , लिया तुम्हें पर  जीत ||

©किरण सिंह

प्रिय से मिलकर नेह से , होतीं आँखें चार |
धीरे-धीरे ही सही , हो जाता है प्यार ||

©किरण सिंह

जबसे तुमसे जुड़ गई , मेरे मन की डोर |
मुझपर ही मेरा सजन, चले नहीं अब जोर ||

©किरण सिंह 

साँसें लय में चल रही , धड़कन देती ताल |
चूमते पिया अधर मैं, हुई शर्म से लाल ||

कर सोलह श्रृंगार ज्यों , झटके मैनें बाल ||
सजना से नयना मिले , हुई शर्म से लाल  |

©किरण सिंह