Friday, 22 September 2017

व्रत उपवास

हिन्दू धर्म में व्रत तीज त्योहार और अनुष्ठान का विशेष महत्व है। हर वर्ष चलने वाले इन उत्सवों और धार्मिक अनुष्ठानों को हिन्दू धर्म का प्राण माना जाता है  इसीलिये अधिकांश लोग इन व्रत और त्योहारों को बेहद श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाते हैं।
व्रत उपवास का धार्मिक रूप से क्या फल मिलता है यह तो अलग बात है लेकिन इतना तो प्रमाणित है कि व्रत उपवास हमें संतुलित और संयमित जीवन जीने के लिए मन को सशक्त तो करते ही हैं साथ ही सही मायने में मानवता का पाठ भी पढ़ाते हैं!
वैसे तो सभी व्रत और त्योहारों के अलग अलग महत्व हैं किन्तु इस समय नवरात्रि चल रहा है तो नवरात्रि की विशिष्टता पर ही कुछ प्रकाश डालना चाहूंगी!
नवरात्रि विशेष रूप से शक्ति अर्जन का पर्व है जहाँ माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है!
शैलपुत्री - इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है।
ब्रह्मचारिणी - इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी।
चंद्रघंटा - इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली।
कूष्माण्डा - इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है।
स्कंदमाता - इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता।
कात्यायनी - इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि।
कालरात्रि - इसका अर्थ- काल का नाश करने वली।
महागौरी - इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां।
सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली।
माँ दुर्गा के नौ रूपों से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि एक स्त्री समय समय पर अपना अलग अलग रूप धारण कर सकती है ! वह सहज है तो कठोर भी है, सुन्दर है तो कुरूप भी है, कमजोर है तो सशक्त भी है......तभी तो महिसासुर जैसे राक्षस जिससे कि सभी देवता भी त्रस्त थे उसका वध एक देवी  के द्वारा ही हो सका.! .  इसीलिए कन्या पूजन का विधान बनाया गया है ताकि स्त्रियों के प्रति सम्मान का भाव उत्पन्न हो सके !
शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र का अनुष्ठान सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने  समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय भी प्राप्त की। तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा विजय पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।
जिस भारत वर्ष की संस्कृति और सभ्यता इतनी समृद्ध हो वहाँ पर स्त्रियों की यह दुर्दशा देखकर बहुत दुख होता है जिसके लिए स्त्री स्वयं भी दोषी हैं !

महादेवी वर्मा ने भी लिखा है कि हमारी संस्कृति में तो नारी की बहुत ही महत्ता रही है। हमारी संस्कृति मातृ सत्ता की रही है। हमारी ज्ञान और विवेक की अधिष्ठात्री सरस्वती, शक्ति की दुर्गा, ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री लक्ष्मी मानी जाती हैं। स्त्री को इन तीनो रूपों में रखकर भारतीय मनीषियों ने पूरी संस्कृति को बांध दिया है। पुरुष तो कहीं बीच में आता ही नहीं। शिव जीवन का मंगल है मगर जब नारी को आसुरी शक्तियों पर आरुढ़ होना पड़ता है तो मंगल को नीचे आना पड़ता है।


जहाँ नारी कल्याण करती है तो वहीं विपरीत परिस्थितियों में ध्वंस भी उसी के हाथों होता है


। जिस संस्कृति में नारी का स्थान श्रेष्ठ रहा हो उसी संस्कृति में उसका पतन यह स्वयं नारी की दुर्बलता का द्योतक है।
स्त्री को चाहिए कि वह अपने कर्तव्यों को पहचाने और अपनी स्थिति सुधारे नहीं तो वह विनाश के गर्त में गिर जायेगी और फिर कोई लहर उबार नहीं सकती।


मानते हैं कि त्याग, ममता, शील, सौन्दर्य उनका बहुमूल्य निधि तथा खूबसूरत आभूषण है किन्तु अत्याचार होने पर सहने के बजाय काली का रूप धारण करना न भूलें !
आज की सबसे बड़ी समस्या है कन्या भ्रुण हत्या जिसे रोका जाना अति आवश्यक है! आज हरेक क्षेत्र में बेटियाँ बेटों से भी आगे निकल रही हैं तो क्यों न इस महापर्व में हम बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का मन से दृढ़ संकल्प लें!

©किरण सिंह

Sunday, 17 September 2017

सखी पनघट पर

सखी पनघट पर मैं नहीं जाऊँगी ,
कन्हैया बड़ा छलिया है

बंशी बजाई के मोहे लुभावे
मधुर सुरीला राग सुनावे
खो जाऊँगी बंशी की धुन सुन
अपनी आँखों में सपने बुन
भूली अगर मैं पनिया भरन
तो मैं क्या - क्या बहाना बनाऊँगी
कन्हैया बड़ा................

यूँ भी भूल गई घर अँगना
सुन री सखी अब तू कर तंग ना
करो नहीं मुझसे बलजोरी
अभी मेरी गगरी है कोरी
जो कान्हा ने फोड़ दिया तो
मैं किस - किस को क्या क्या बताऊंगी
कन्हैया बड़ा.................

मन मेरा वे चुराय लिये हैं
अपना जादू चलाय दिये हैं 
जित देखूँ उत दिखते साँवरिया
नहीं सूझे मुझे मेरी डगरिया
सुध बुध अपना भूल गई मैं
ऐसे कैसे मैं संग चल पाऊँगी
कन्हैया बड़ा..................

©किरण सिंह

प्रिय तुम बिन मैं

प्रिय तुम रह न सकोगे मुझ बिन ,
मैं भी तुम बिन रह न सकूंगी |
फिर काहे का झगड़ा रगड़ा ,
अब यह सब मैं सह न सकूंगी |

सपनों की दुनिया में प्रिय
तुमने भी जिया मैनें भी जी
मधुर मधुर बातें अक्सर
तुमने भी की मैने भी की
क्या नाता है तुमसे मेरा 
यह अधरों से कह न सकूंगी

प्रिय तुम रह न सकोगे मुझ बिन ,
मैं भी तुम बिन रह न सकूंगी |

तुमसे मिलकर ही जाना
कितना सुन्दर संसार है
इसीलिए प्रिय मुझे तुम्हारा 
हर तोहफा स्वीकार है
भाव मेरे प्रिय तुम तक सीमित
तुम न कहो तो बह न सकूंगी

प्रिय तुम रह न सकोगे मुझ बिन ,
मैं भी तुम बिन रह न सकूंगी |

एक पल भी देखूँ न तुझे तो
बढ़ जाती बेचैनियाँ
प्यार मुझे करते हो प्रिय तो
मत करना मनमर्जियाँ
यही प्यार है सच्चा समझो
इससे ज्यादा कह न सकूंगी

प्रिय तुम रह न सकोगे मुझ बिन ,
मैं भी तुम बिन रह न सकूंगी |

©किरण सिंह

Tuesday, 12 September 2017

बीस पैसा

बीस पैसा
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हमारे लिए गर्मी की छुट्टियों में हिल स्टेशन तथा सर्दियों में समुद्री इलाका हमारा ननिहाल या ददिहाल ही हुआ करता था! जैसे ही छुट्टियाँ खत्म होती थी हम अपने ननिहाल पहुंच जाया करते थे जहाँ हमें दूर से ही देख कर ममेरे भाई बहन उछलते - कूदते हुए तालियों के साथ गीत गाते हुए ( रीना दीदी आ गयीं...... रीना दीदी........) स्वागत करते थे कोई भाई बहन एक हाथ पकड़ता था तो कोई  दूसरा और हम सबसे पहले  बाहर बड़े से खूबसूरत दलान में बैठे हुए नाना बाबा ( मम्मी के बाबा ) को प्रणाम करके उनके द्वारा पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देकर अपनी फौज के साथ घर में प्रवेश करते थे!
घर में घुसते ही हंगामा सुनकर नानी समझ जाया करतीं थीं कि यह फौज हमारी ही होगी इसलिए अपने कमरे से निकल कर बाहर तक आ जाती थीं और हम पैर छूकर प्रणाम करते तो वो अपने हथेलियों में हमारा चेहरा लेकर यह जरूर कहतीं थीं कि कातना दुबारा गईल बाड़ी बाछी हमार  ( कितनी दुबली हो गई है मेरी ) भले ही हम कितने भी मोटे क्यों न हुए हों! तब तक आ जातीं मेरी मामी जो हमें आँगन में चबूतरे पर ले जाकर पैरों को रगड़ रगड़ कर धोती थी जिससे पैरों की मालिश अच्छी तरह से हो जाया करती थी और पूरी थकान छू मंतर !
तब तक नानी कुछ खाने के लिए ले आती थीं जिसे मन से नहीं तो डर से खाना ही पड़ता था क्योंकि हम चाहे जितना भी खा लेते थे लेकिन नानी ये जरूर कहा करती थीं कि इची अने नइखे खात ( ज़रा भी अनाज नहीं खा रही है ) ! खा पीकर अपनी टोली के साथ हम बाहर निकलते तो बहुत से बड़े छोटे भाई बहन मुझे प्रणाम करते हुए चिढ़ाने के क्रम में कहते बर बाबा गोड़ लागेनी... ( बर बाबा प्रणाम) और मैं कुछ चिढ़कर या फिर हँसकर उन्हें भी साथ ले लेती थी और निकल पड़ती थी सभी नाना - नानी, मामा - मामी तथा भाई बहनों से मिलने के लिए !
अब बर बाबा मुझे क्यों कहते थे वे सब यह भी बता ही देती हूँ! हुआ यूँ कि एकबार बचपन में करीब ढाई तीन साल की उम्र में मैं भी ममेरे भाई बहनों के साथ पटरहिया स्कूल  (गाँव के प्राइमरी स्कूल में ) में गई थी! और किसी बात पर किसी से झगड़ा हो गया तो मैं जाकर बर बाबा जो बरगद के पेड़ के नीचे चबूतरे पर पत्थर की पूजा की जाती थी के सर पर बैठ गई थी... तब से मुझे ननिहाल में बर बाबा ही कहकर चिढ़ाया जाता था! पटरहिया स्कूल इसलिए कि काठ की बनी आयताकार काली बोर्ड जिसके ठीक ऊपर छोटा सा हैंडल लगा होता था उसपर चूल्हे की कालिख से जिसे कजरी कहा जाता था पोत दिया जाता था, उसके बाद छोटी शीशी से रगड़कर पटरी को चमकाया जाता था..!  पटरी पर लाइन बनाने के लिए मोटे धागे को चाॅक के घोल में भिगोकर बहुत एहतियात के साथ पटरी के दोनों किनारों पर हाथ में धागा पकड़ कर धीरे से बराबर बराबर रख रख कर छोड़ दिया जाता था उसके बाद पटरी के हैंडल को पकड़कर खूब खूब घुमा घुमाकर गाया जाता था.....
सुख जा सुख जा पटरी
अब ना लगाइब कजरी
उसके बाद उस पर सफेद चाक के घोल से बांस
के पतली लकड़ियों को कलम बनाकर लिखा जाता था |
वैसे तो मेरी मामी बहुत ही शांत स्वभाव की थीं जिनकी हम सबने कभी जोर से आवाज तक नहीं सुनी थी  लेकिन एक दिन अपने करीब  तीन वर्ष के बेटे जो मुझसे आठ वर्ष छोटा है ( मेरे ममेरे भाई) को आँगन में पीटने के लिए दौड़ा रहीं थीं और वह भाग रहा था! यह देखकर मैनें मामी को टोका कि मामी ये क्या कर रही हैं इतने छोटे बच्चे को क्यों दौड़ा रही हैं?
तो मामी थोड़े गुस्से में ही बोलीं रीना जी इसको पढ़ने के लिए बीस पैसा महीने में देना पड़ता है और यह है कि पढ़ता ही नहीं है!
मामी का इतना कहना था कि मेरी तो हँसी रुके नहीं रुक रही थी उनका बीस पैसा सुनकर!
क्यों कि उस गांव के मेरे नाना ही सबसे धनाढ्य व्यक्ति थे चूंकि उन दिनों गाँवों में अच्छे स्कूलों की सुविधा नहीं थी तो तब तक उसे भी पटरहिया स्कूल में प्रेक्टिस के लिए भेजा जाता था!
मेरा ममेरा भाई श्याम बिहारी सिंह ( अनु ) पढ़ने में शुरू से ही अव्वल था इसलिए मेरे पापा बलिया लेते आये.. और छठी कक्षा से वह नैनीताल में हास्टल में रह कर पढ़ाई किया... जो आज आर्मी में कर्नल है!
लेकिन आज भी मामी की बीस पैसे वाली बात याद करके मूझे बहुत हँसी आती है!

©किरण सिंह

Sunday, 10 September 2017

इज्जत और प्रेम

कहानी
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प्रेम और इज्जत
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अपने अतीत और वर्तमान के मध्य उलझ कर अजीब सी स्थिति हो गई थी दिव्या की! खोलना चाहती थी वह अतीत की चाबियों से भविष्य का ताला! लड़ना चाहती थी वह प्रेम के पक्ष में खड़े होकर वह समाज और परिवार से यहाँ तक कि अपने पति से भी जिसके द्वारा पहनाये गये मंगलसूत्र को गले में पहनकर हर मंगल तथा अमंगल कार्य में अब तक मूक बन साथ देती आई है ! जो दिव्या अपने प्रेम को चुपचाप संस्कारों की बलि चढ़ते हुए उफ तक नहीं की थी पता नहीं कहाँ से उसके अंदर इतनी शक्ति आ गयी थी दिव्या में !
दिव्या अपनी पुत्री में  स्वयं को देख रही थी ! डर रही थी कि कहीं उसी की तरह उसकी बेटी के प्रेम को भी इज्जत की बलि न चढ़ा दी जाये! सोंचकर ही सिहर जा रही थी कि कैसे सह पायेगी उसकी बेटी संस्कृति अपने प्रेम के टूटने की असहनीय पीड़ा......मैं तो अभिनय कला में निपुण थी इसलिए कृत्रिम मुस्कुराहट में
छुपा लेती थी अपने हृदय की पीड़ा......क्यों कि बचपन से यही तो शिक्षा मिली थी कि बेटियाँ घर की इज्जत होतीं हैं , ... नैहर ससुराल का इज्जत रखना , एक बार यदि इज्जत चली गई तो फिर वापस नहीं आयेगी..! यह सब बातें दिव्या के मन मस्तिष्क में ऐसे भर गईं थीं कि उसने इज्जत के खातिर अपनी किसी भी खुशी को कुर्बान करने में ज़रा भी नहीं हिचकती थी ....यहाँ तक कि अपने प्रेम को भी...! प्रेम क्या... दिव्या ने तो प्रेम से भी कभी नहीं स्वीकारा कि वे उससे प्रेम करती है... क्यों कि उसे प्रेम करने का परिणाम पता था कि सिर्फ इज्जत की छीछालेदरी ही होनी है प्रेम में.........!
नहीं नहीं मैं अपनी बेटी के साथ ऐसा नहीं होने दूंगी मन ही मन निश्चय करती हुई दिव्या  अपने अतीत में चली जाती है !
याद आने लगता है उसे अपना प्रेम जिसे वे कभी अपनी यादों में भी नहीं आने देती थी!
जब कभी भी उसे प्रेम की याद आती उसकी ऊँगुलियाँ स्वतः उसके मंगलसूत्र तक पहुंच जातीं और खेलने लगतीं थीं मंगलसूत्र से और निकाल लेती थी विवाह का अल्बम जिसमें अपनी तस्वीरें देखते देखते याद करने लगती थी अपने सात फेरों संग लिए गये वचन! और दिव्या अपने कर्तव्यों में जुट जाती थी!
वैसे तो प्रेम को भूला देना चाहती थी दिव्या कभी मिलना भी नहीं चाहती थी प्रेम से, फिर भी प्रेम यदा कदा दिव्या के सपनों में आ ही जाया करता था और दिव्या सपनों में ही प्रेम से प्रश्न करना चाहती थी तभी दिव्या की नींद खुल जाती थी और सपना टूट जाता था तथा दिव्या के प्रश्न अनुत्तरित ही जाते थे! झुंझलाकर वह कुछ कामों में खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करती थी ताकि वह प्रेम को भूल सके.. लेकिन इतना आसान थोड़े न होता है पहले प्यार को भूलना..वह भी पहला ! वह जितना ही भूलने की कोशिश करती प्रेम उसे और भी याद आने लगता था!
किसी विवाह समारोह में गई थी दिव्या वहीं प्रेम से मिली थी! उसे याद है कि जब पहली बार आँखें चार हुईं थीं तो प्रेम उसे कैसे देखता रह गया था और दिव्या की नज़रें झुक गई थीं! शायद दिव्या को भी पहले प्यार का एहसास हो गया था तभी वह अपनी नजरें चाह कर भी नहीं उठा पाई थी शायद उसे डर था कि कहीं उसकी आँखें प्रेम से कह न दे कि हाँ मुझे भी तुमसे प्यार हो गया है!
अक्सर प्रेम दिव्या से बातें करने का बहाना ढूढ लेता था! दिव्या तो सबकी लाडली थी इसलिए कभी दिव्या को कोई अपने पास बुला लेता था तो कभी कोई और प्रेम तथा दिव्या की बातें अधूरी ही रह जाती थी!
दिव्या गुलाबी लिबास में बिल्कुल गुलाब की तरह खिल रही थी! जैसे ही कमरे से बाहर निकली उधर से प्रेम आ रहा था और दोनों आपस में टकरा गये! दिव्या जैसे ही गिरने को हुई प्रेम उसे थाम लिया दोनों की नज़रें टकराई और दिव्या शर्म से गुलाबी से लाल हो गई.. फिर झट से प्रेम से हाथ छुड़ाकर बिजली की तरह भागी थी दिव्या!
विवाह के रस्मों के बीच भी दोनों की आँखें कभी-कभी चार हो जाया करतीं थीं फिर दिव्या की नज़रें झुक जाया करतीं थीं.. यह क्रम रात भर चलता रहा!
कभी-कभी रस्मों रिवाजों के बीच दिव्या और प्रेम भी कल्पना में खो जाते और खुद को दुल्हा दुल्हन के रूप में सात फेरे लेते पाते तभी बीच में कोई पुकारता तो तंद्रा भंग हो जाती और धरातल पर वापस लौट आते !
विवाह सम्पन्न हो गया तो दिव्या अपने परिवार के साथ अपने घर लौटने को हुई लेकिन दिव्या का मन जाने का नहीं कर रहा था, वह चाह रही थी कि उसे कोई रोक लेता और उसकी आँखें तो प्रेम को ही ढूढ रहीं थीं पर प्रेम कहीं दिखाई नहीं दे रहा था! उदास दिव्या सभी बड़े परिजनों को प्रणाम तथा छोटों से गले मिलकर गाड़ी में बैठने को हुई तो प्रेम भी अचानक आ पहुंचा तथा धीरे से दिव्या के हाथ में कुछ सामान ( मिठाइयों वगरा के साथ) एक चिट्ठी भी पकड़ा दिया जिसे दिव्या बड़ी मुश्किल से सभी की नजरों से छुपा पाई थी!
दिव्या का मन चिट्ठी पढने के लिए बेचैन हो रहा था! रास्ते भर सोंच रही थी कि प्रेम क्या लिखा होगा इसमें! घर पहुंच कर अपने कमरे में जाकर सबसे पहले चिट्ठी खोली जिसमें लिखा था....
दिव्या मैनें जब तुम्हें पहली ही बार देखा तो लगा कि मैं तुम्हें जन्मों से जानता हूँ! तुम मेरी पहली और आखिरी पसंद हो लेकिन पता नहीं मैं तुम्हें पसंद हूँ या नहीं... यदि तुम भी मुझे पसंद कर लो तो.............
प्रेम

तब दिव्या को तो मानो पूरी दुनिया भर की खुशियां मिल गयीं थीं ! उसे भी तो प्रेम उतना ही पसंद था बल्कि कहीं अधिक ही पर स्त्री मन प्रेम कितना भी अधिक कर ले पर प्रेम के इज़हार में तो हमेशा ही पिछड़ जाता है और इस मामले में पुरुष हमेशा ही अव्वल रहते हैं!
दिव्या भी प्रतिउत्तर में प्रेम को चिट्ठी लिख दी जिसमें प्रेम की स्विकृति दे दी थी! परन्तु संकोचवश चिट्ठी पोस्ट नहीं कर सकी! इधर प्रेम प्रतिदिन दिव्या के पत्र की प्रतीक्षा करता रहा!
एक सुबह अचानक दिव्या की मम्मी दिव्या से कहतीं हैं बेटी आज शाम तेरे ब्याह के लिए तुझे लड़के वाले देखने के लिए आने वाले हैं अभी नहा वहा कर आराम कर ले शाम को अच्छी तरह से तैयार हो जाना...... लड़का डाॅक्टर है... ऐसा घर वर मिलना बड़ा मुश्किल रहता है... वो तो तेरे मामा हैं कि किसी तरह बात पक्का कर आये हैं.. अब बस वे तुझे पसंद कर लें...अरे लो मैं भी कैसी बातें करने लगी अपने सर को हाथ से धीरे से पीटते हुए बोलीं थी दिव्या की मम्मी.. कि तुमसे सुन्दर उन्हें कौन मिलेगा बेटी.. बस आज ज़रा सा अच्छी तरह से बातें कर लेना... इज्जत का सवाल है !
तब दिव्या के मन में आया था कि वह अपनी माँ से प्रेम के बारे में बता दे पर माँ तो बिजली की तरह चली गई थी कमरे से और दिव्या के सामने उसके पापा पड़ गये....... पापा भी वही बात कि तुमसे सुन्दर उन लोगों को कहाँ कोई मिलेगा बेटा बस ज़रा ढंग से बात करना..!
उस समय दिव्या को कुछ भी नहीं सूझ रहा था!
एक तरफ़ उसका प्रेम तो दूसरी तरफ़ घर और खानदान की इज्जत! दिव्या ने अपने मन की तराजू पर बार - बार प्रेम और इज्जत को तोला लेकिन पता नहीं कैसे हर बार इज्जत का पलड़ा ही भारी हो जाता था! आखिर में दिव्या इज्जत को ही चुन ली!
भूलने की कोशिश करने लगी प्रेम को , किन्तु प्रेम के चिट्ठी को फाड़ नहीं पाई!
लड़के वाले आये और दिव्या को पसंद भी कर लिये! विवाह की तिथि निश्चित हो गयी!
दिव्या के विवाह में प्रेम भी आया था! बार - बार दिव्या से मिलने के लिए एकान्त ढूढता रहा पर दिव्या तो विवाह के रस्मों रिवाजों में हमेशा ही लोगों से घिरी रहती थी! आखिर में  प्रेम दिव्या की सहेली के माध्यम से दिव्या से मिला और उसकी तस्वीर अपने कैमरे में कैद कर लिया! और फिर दिव्या को एक चिट्ठी पकड़ाया.... जिसमें लिखा था.....
दिव्या मैंने तुम्हारे उत्तर की प्रतिदिन प्रतीक्षा की पर नहीं मिला.. शायद मैं तुम्हें पसंद नहीं था.!
खैर तुम खुश रहना तुम्हें तुम्हारे योग्य जीवनसाथी मिले हैं! भगवान तुम दोनों की जोड़ी सलामत रखे!
और फिर मुस्कुराते हुए मुड़ गया अपने रूमाल से मुंह पोछते हुए... पता नहीं पसीना पोछ रहा था या आँसू !
उसके बाद कभी नहीं मिले दिव्या और प्रेम! क्यों कि दिव्या चाहती भी नहीं थी कि कभी प्रेम से उसका सामना हो ! शायद दिव्या नहीं भूल पाई थी प्रेम को... तभी तो यदा कदा गीत, गज़ल, शेर शायरी में लिख ही दिया करती थी प्रेम को!
लेकिन आज दिव्या अपने आपको विवश पा रही थी.. सोंचने लगी अपनी बेटी संस्कृति के बारे में. कि क्या उसका भी प्रेम उसी के जैसा ही पवित्र होगा! क्या बाहर साथ-साथ रहते हुए क्या मानसिक रूप से ही जुड़े होंगे ये भी या फिर........क्यों कि उसे पता है कि आज की जेनरेशन के लिए शारीरिक सम्बन्ध भी कोई पाप नहीं है... इसके अलावा आज की क्लियर हर्टेड जेनरेशन को कहाँ आता है झूठी मुस्कान लबों पर बिखेरना!
छिः कैसी बातें सोंच रही है..... कुछ ही पलों में दिव्या अपने आप से ही नाराज भी हुई लेकिन मन में ठान ली कि वह अपनी बेटी संस्कृति के प्रेम को इज्जत की बलि नहीं चढ़ने देगी !

©किरण सिंह

Saturday, 2 September 2017

शाश्वत प्रेम

शाश्वत प्रेम
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सुनो कृष्ण
यूँ तो मैं तुममें हूँ
और तुम मुझमें
बिल्कुल सागर और तरंगों की तरह
या फिर
तुम बंशी और मैं तुम्हारे बंशी के स्वर की तरह
शब्द अर्थ की तरह
आदि से अनंत तक का नाता है
मेरा और तुम्हारा
मैं हूँ तेरी राधा
हमारा प्रेम कभी कामनाओं पर आधारित नहीं था
क्यों कि हमारी भावनायें सशक्त थीं
हम दोनों तो दो आत्माएँ हैं
हम दोनों में प्रियतमा और प्रियतम का भेद है ही नहीं।
बस मिलन की तीव्र जिज्ञासा
पैदा करती है अभिलाषा
हम दोनों को एकाकार कर दिया
जो शरीर से अलग होने के बाद भी
अलग नहीं हुए कभी
इसलिए मुझे कभी वियोग नहीं हुआ
तुमसे अलग होने पर भी
लेकिन तुमने अपना बांसुरी त्याग दिया था
मथुरा जाते समय
अपना गीत, संगीत, सुर, साज
क्यों कि तुम कर्म योगी थे
तुम्हें कई लक्ष्य साधने थे
मैनें अपने प्रेम को तुमको लक्ष्य में
कभी बाधक नहीं बनने दिया
प्रेम को अपना शक्ति बनाया
कमजोरी नहीं
अरे हमने ही तो प्रेम को परिभाषित किया है 
तभी तो स्थापित है हम
साथ-साथ मन्दिरों में
भजे जाते हैं
भजन कीर्तनों में
कि प्रेम शक्ति है कमजोरी नहीं
प्रेम त्याग है स्वार्थ नहीं
हम तो
हर दिलों में धड़कते हैं
बनकर
शाश्वत प्रेम

©किरण सिंह

Thursday, 31 August 2017

अतिथि देव

आजकल अधिकांश लोगों के द्वारा यह कहते सुना जाता है कि आजकल लोग एकाकी होते जा रहे हैं , सामाजिकता की कमी होती जा रही है, एक पहले का जमाना था जब अतिथि को देव समझा जाता था लेकिन आजकल तो बोझ लगने लगे हैं अतिथि आदि आदि..!
कुछ हद तक इन बातों में सच्चाई भी है किन्तु जब हम इस तरह के बदलाव के मूल में झांक कर देखते हैं तो पाते हैं कि इसमें दोष किसी व्यक्ति विशेष का न होकर आज की जीवन शैली, शिक्षा  - दीक्षा , एकल तथा छोटे परिवारों का होना, घरों के नक्शे तथा पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण तो है ही ऊपर से बचा खुचा समय सोशल मीडिया में खर्च हो जाते हैं लोगों के !
एकल परिवारों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा मनोनुकूल जीवनशैली तो रहती है जहाँ किसी अन्य का रोक - टोक नहीं होता इसीलिये इसका चलन बढ़ भी रहा है ! किन्तु एकल परिवारों तथा आज की जीवनशैली में मेहमानवाजी के लिए समय निकालना जरा कठिन है!
संयुक्त परिवार में हर घर में बूढ़े बुजुर्ग रहते थे जिनके पास काम नहीं होता था या कर नहीं सकते थे तो जो भी आगन्तुक आते थे बूढ़े बुजुर्ग बहुत खुश हो जाया करते थे क्योंकि कुछ समय या दिन उनके साथ बातें करने में अच्छा गुजर जाता था तथा मेहमान भी मेहमानवाजी और अपनापन से प्रसन्न हो जाते थे!
इसके अलावा बच्चे भी मेहमानों को देखकर उछल पड़ते थे क्योंकि एक तो मेहमान कुछ न कुछ मिठाइयाँ आदि लेकर आते थे इसके अलावा घर में भी तरह-तरह का व्यंजन बनता था जिसका बच्चे लुत्फ उठाते थे!
तब घर की बहुओं को चूल्हा चौका से ही मतलब रहता था बहुत हुआ तो थोड़ा बहुत आकर मेहमानों को प्रणाम पाती करके हालचाल ले लिया करतीं थीं और बड़ों के आदेश पर खाने पीने आदि की व्यवस्था करतीं थीं! मतलब संयुक्त परिवार में हर आयु वर्ग के सदस्यों में काम बटे हुए होते थे जिससे मेहमान कभी बोझ नहीं लगते थे बल्कि उनके आने से घर में और खुशियों का माहौल रहता था !
किन्तु एकल परिवारों में बात से लेकर खाने - पीने रहने - सोने तक सब कुछ का इन्तजाम घर की अकेली स्त्री को ही करना पड़ता है क्योंकि पुरुष को तो आॅफिस टूर आदि से फुर्सत ही नहीं मिलती और घर में जब स्मार्ट और सूघड़ बीवी हो तो पति तोऊनिश्चिंत हो ही जाते हैं !  बच्चों पर भी पढ़ाई का बोझ इतना रहता है कि उनके पास मेहमानवाजी करने का फुर्सत नहीं रहता! यदि वे मेहमानों के साथ बैठना चाहें भी तो मम्मी पापा का आदेश होता है कि जाओ तुम फालतू बातों में मत पड़ो अपनी पढ़ाई करो!  ऐसे में मेहमानों के आगमन पर काम के साथ-साथ बात चीत आदि का कार्य भी स्त्रियों पर ही आ जाता है जिसके कारण उनके पास अपने लिये ज़रा भी समय नहीं बच पाता है ऐसे में  खीजना स्वाभाविक भी है!
मिसेज ओझा बहुत कुशल गृहिणी हैं उनके यहाँ जो भी आता है खूब खुश होकर जाता है लेकिन वो मेहमानों के जाने पर चैन की सांस लेती हैं और फिर मेहमानों के आगमन को सुनकर पहले ही घबरा जाती हैं भले ही अपने व्यवहार और बातों से जाहिर नहीं होने देती हैं!
इसमें यदि इमानदारी से देखा जाये तो उनका कोई दोष भी नहीं है क्योंकि दो रूम के फ्लैट में अपने चार - चार बच्चे पढ़ने वाले उसमें हमेशा चार छः मेहमानों का आना - जाना... बेचारी का दिन रात किचेन में ही गुजरता था वो तो फिर भी बर्दाश्त कर लेती थीं लेकिन दिन रात मेहमानों के शोर से बच्चों का पढ़ाई प्रभावित होता तो वे परेशान हो जातीं थीं लेकिन कुछ कर नहीं पाती थीं!
जहाँ घरेलू स्त्री है वहाँ तो फिर भी ठीक है किन्तु जहाँ पर पति पत्नी दोनों ही कार्यरत हैं वहाँ की समस्या तो और भी जटिल है! उन  दम्पत्तियों के पास तो मेहमानों के लिए बिल्कुल भी समय नहीं होता क्योंकि उनका रुटीन भी कुछ अलग होता है ! कभी नाइट शिफ्ट तो कभी डे शिफ्ट... ऐसे में उनके पास सिर्फ वीकएंड का बचता है जिसमें उन्हें आराम भी करना होता है और घूमना - फिरना भी होता है था कि निर्धारित ही रहता है ऐसे में उनके पास अचानक कोई मेहमान टपक पड़े तो फिर दिक्कत तो होगी ही!
तान्या और मनोज दोनों मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत थे! हफ्ते भर काम करने के पश्चात वीकेंड का इंतजार करते थे ताकि नींद पूरी हो सके! वीकेंड पर उनका दोस्तों के साथ आउटिंग का प्रोग्राम था जाने की पूरी तैयारी हो गयी थी तभी कोई दूर के रिश्तेदार के आगमन की सूचना मिली तो प्रोग्राम रद्द करना पड़ा.... इसमें तान्या मनोज का प्रोग्राम तो रद्द हुआ ही साथ हो उनके दोस्तों का भी रद्द हो गया जिससे तान्या और मनोज का मन  खिन्न थे!
बात मित्रों की हो या रिश्तेदारों की जाना वहीं चाहिए जहाँ पर आत्मीयता हो और आपके जाने से आपके मित्र या रिश्तेदार को खुशी मिले!
इस विषय में महाकवि तुलसी दास जी ने भी अपने दोहे के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है...

देखत मन पुलकित नहीं, नयनन नहीं सनेह |
तुलसी  वहाँ  न  जाइये ,  कंचन  बरसे  मेह ||

यदि मित्रों या रिश्तेदारों के पास जाना हो तो जाने से पहले सूचित अवश्य कर दें ताकि आपका मित्र या रिश्तेदार आपके लिए समय निकाल सके!
जाने के बाद मेजबान के कार्य में यथासम्भव मदद अवश्य करें!
अपना सामान यथास्थान ही रखें ! बच्चे साथ हों तो उनपर ध्यान दें! घर का सामान यदि बिखर गया हो तो धीरे से ठीक कर दें!
मिसेज मल्लिक अपना घर महंगे - महंगे शो पिसेज से खूब सजाधजाकर रखतीं हैं लेकिन उनके एक रिश्तेदार हैं जिनके  बच्चे आकर घर में भूकंप मचा देते हैं लेकिन वो रिश्तेदार दम्पति न तो अपने को देखते हैं न टोकते हैं बल्कि और हँसते हैं! उनके जाने के बाद कितने ही शो पिस टूट गये होते हैं... मिसेज मल्लिक कुढ़ कर रह जाती हैं और उनके जाने के बाद राहत की साँस लेती हैं!
सबसे जरूरी कि जो भी व्यंजन खाने पीने के लिए परोसे जायें उसका तारीफ अवश्य कर दें तो बनाने वालों को खुशी मिलती है साथ ही यथासंभव मेजबान का हाथ बटायें ताकि मेजबान आपका पुनः प्रतीक्षा करे!
मिस्टर सिंह सपरिवार अपने दोस्त के यहाँ हफ्ते भर के लिए आये उनके दोस्त और दोस्त की पत्नी बहुत खुश हुईं! उनके लिए तरह-तरह के डिसेज बनाती और खिलाती मिस्टर सिंह और उनकी पत्नी खूब तारीफ़ करते और डिमांड कर कर के डिसेज बनवाते! मिसेज सिंह काम के वक्त मैग्जीन आदि में उलझी रहतीं थी और जब काम खत्म हो जाता तो बातें करने लगतीं थी ऐसे में उनके दोस्त की पत्नी को आराम ही नहीं मिलता था और चार पाँच दिन में बीमार पड़ गईं! कितना अच्छा होता कि मिसेज सिंह मेजबान के काम में थोड़ा हाथ बटातीं तो ये खुशियाँ दूनी हो जाती!

माना कि समय कीमती है लेकिन अपने समय में से थोड़ा समय चुराकर यदि मेहमानों के लिए निकाली जाये तो रिश्तों की गर्माहट बनी रहेगी, जिंदगी में कभी अकेलापन महसूस नहीं होगा तथा खुशियों में गुणोत्तर बढ़ोत्तरी होगी!

©किरण सिंह