Friday, 17 October 2014

भाषा

!!!!!!!!!भाषा !!!!!!!!!
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बिना मूल्य के हैं मृदु भाषा
जो है शान्ति की परिभाषा
दुख के पल में औसधि सा
सभी करते जिसकी अभिलाषा

विपरीत है कर्कषता
मिल जाती जब कपटता
अपनेपन के अधिकार से वंचित
कर अपने अपनों को खोता

सदा रखे विनम्रता
क्यों करें.कृपणता
भाषा भावों की अभिव्यक्ति है
इस लिए बनाए रखे सरलता 
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© copyright Kiran singh

प्रार्थना

!!!!!!!!!!!! प्रार्थना !!!!!!!!!!!!
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तूम्ही मेरी पूजा , तुम्ही प्रार्थना हो 
तुम्ही अर्चना हो , तुम्ही वन्दना हो 

तुम्ही प्रीत मेरे , तुम्ही वेदना  हो 
तुम्ही इस हॄदय के , संवेदना हो

हम तो कठपुतली हैं विश्व मंच के
खीचते डोर तुम ही नाच नचैया हो

जड़ चेतन तुम्ही , तुम्ही चेतना हो
चेतन  जगत के , तुम्ही प्रेरणा  हो  
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स्तुति

!!!!!!!! स्तुति !!!!!!!!
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हृदय धरा पर प्रेम कलश 
कर क्लेशों का तर्पण
श्रद्धा के पुष्प कमल 
विश्वास चरण मे अर्पण 

मन को कर उज्ज्वल
ज्ञान दीप जलाकर
विश्व में हो मंगल
सुख समॄद्धि हो घर घर

हे शक्ति हमें दो वर
धीर धरे चंचल मन
दुखों के अग्नि में भी जलकर
चमके वह जैसे कुन्दन
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Thursday, 16 October 2014

पत्र

!!!!!! पत्र !!!!!
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भावनाओं को दे आकार 
जो थे हृदय के उद्गार 
लिखा पत्र पिया को मैंने
नयनो से काजल ले उधार 

  उनकी स्मृतियाँ आधार
  करती खुशियों का संचार
  मधुर संगीत गूँज उठी उर
  छलके पलकों से अश्रुधार
 
   हृदय की ध्वनि देती ताल 
   सुर थी पायल की झनकार
    निशा मध्य कंगन खनकार
    गढता जो  नित सुन्दर राग
   
   अक्षरों को शब्दों में ढाल
    शब्दों में भर रस अलंकार
    कह न सकी जो सम्मुख उनके
    भेज दिया चिट्ठी संग प्यार
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जीवन में रफ्तार आ गया

जीवन में रफ्तार आ गया
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जीवन में रफ्तार आ गया
मुट्ठी में .संसार आ गया
वर्ण अक्षर छन्दों में सजगए
भावों का सैलाब आ गया

पतझड़ में मधुमास आ गया
रचना में अनुप्रास आ गया
ठहरी हुई .......लेखनी के
छन्द में रस श्रॄंगार आ गया

गर्मी मे वर्षात .....आ गया 
गीतों मे सुर ताल .आ गया 
बज उठी वीणा के .सरगम
जैसे उसमें प्राण ..आ गया 

दोपहरी मे ..छाँव आ गया 
बूँद लिए ..फुहार आ गया 
विन सावन के वर्षोंतो ..मे 
भीगना भी ..रास आ गया 
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क्यों न तुझे मैं......

क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ
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नित्य उठ भोर राम भैरवी
तेरे वाद्य संग मैं गा लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

बड़ी तपन है जेठ दोपहरी
मैं तुम छांव तले बतिया लूँ
क्यों न तुझे मैं विषय बना लूँ

शाम सिंदूरी साज सजी है
तेरे गीतों को मैं गा लूँ
क्यों न तुझे मैं विषय बना लूँ

पलक मूद निशा मध्य
नयनों में तेरा स्वप्न सजा लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ

चाँद प्रहरी प्रेम साक्षी
मैं तुम मिल एक रीति बना लूँ
क्यों नतुझे ही विषय बना लूँ
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Wednesday, 15 October 2014

श्वेत मन

श्वेत मन बेरंग सा चित्रण
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श्वेत मन, बेरंग सा.. चित्रण 
उसमें तुम अपना रंग भरकर 
सुन्दर चित्रण कर जाते हो 
मन भावों से भर जाते हो 

खग सा चंचल हो जाता मन 
बिखरे लट आ गिरते मुख पर 
तब तुम दर्पण बन जाते ..हो 
मुझमें मुझको ही दिखलाते हो 

पथ में मेरे संग संग चलकर
बाधाओं को.. तोड़ निरन्तर
कालचक्र से लड़ . जाते हो
मुझे लक्ष्य तक .पहुँचाते हो

अन्तर्तम में दीप ....जलाकर 
क्लेश रहित नित प्रेम सजाकर 
मन उज्ज्वल. तुम कर जाते हो
जीवन साकार तुम कर जाते हो
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