Friday, 31 October 2014

जिन्दगी का हुनर

!!!!जिन्दगी का हुनर !!!!!
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जिन्दगी का हुनर सीखकर
तय करती रही मैं सफ़र

खुशियों को लुटाती रही मैं
रह गए कुछ गम बचकर

गिला भी करूँ क्यूं किसी से 
खुश हूँ आदत से मजबूर होकर 

घर दियों से सजाती रही हूँ 
चाहे बह जाए मोम पिघलकर 

गूथती रही प्रेम धागों से माला 
कहीं मुरझा न जाएँ वो खिलकर
 
खुशियों को समेटा है मैंने
निभाया है रिश्ते सम्हलकर

पलकों ने अश्रुओं को सम्हाला
गिर न पाएं कहीं वो छलककर
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© copyright Kiran singh

Wednesday, 29 October 2014

प्रश्न चिन्ह

!!!!!!!!!!!!!!!!प्रश्नचिन्ह!!!!!!!!!!!!!!!!!
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राष्ट्र की अखंडता पर फिर से प्रश्नचिन्ह है
बंट रहे हैं जाति धर्म सबके मत भिन्न है

भाग रहे लोग  सब , .मुकाम की तलाश में
छोड़कर जमीन को वो , उड़ रहे आकाश में

जनतंत्र के देश में , जनता बेचारी है खड़ी
डालरों की दौड़ में , रुपया लाचार है पड़ी

कृषि प्रधान देश में क्यों कृषकों..की दुर्दशा
रोटी के लाले पड़े हैं ,किन्तु बढ़ रहा नशा

झूठ के बाजार में ,.. सच का भाव मन्द है
दिमाग सब चला रहे , दिल का द्वार बन्द है

बढ़ रहा अधर्म , आस्था का हुआ खण्ड है
धर्म के नाम पर  , हो रहा.......पाखण्ड है

कानून व्यवस्थाओं को , . तोड़ रहा तंत्र है
न्याय के विरुद्ध  ,  अन्याय का षड्यंत्र है

अधिकार मांग रहे सभी , कर्तव्य याद नहीं
कैसे रूके भ्रष्टाचार, सुने कोई फरियाद नहीं
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Copyright © Kiran singh

Tuesday, 28 October 2014

दीप जलाना है

!!! दीप जलाना तुझे !!!
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भेद तम कर उज्ज्वल मन
लक्ष्य को पाना है
हर अंधेरे रास्तों में
दीप जलाना है

सुना है पत्थर भी पिघलकर
मोम बनते हैं
दुश्मन भी कभी मिलकर
दोस्त बनते हैं

इस नदी सी जिन्दगी के
लहरों संग बहना ही है
डूबकर या तैर कर
पार करना ही है
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© copyright Kiran singh

दहेज

एक परीचित अपने बेटे के विवाह का आमन्त्रण कार्ड लेकर मेरे घर आए थे और आत्मप्रशंसा किए जा रहे थे ! मैं उनकी आतमकथा ध्यान पूर्वक सुन रही थी !
मैंने उन लोगों को चाय का कप पकडाते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में पूछ ही लिया -  तिलक त ढेरे मीलत होई  ? ( दहेज़ तो काफ़ी मिल रहा होगा  )
तब वो सज्जन बड़े ही मासूमियत से बोले जा रहे थे-ना ना कूछू ना हम त लइकी वाला लोग के साफे कह दीहनी हं कि देखी हामरा कुछ चाही उही ना खाली आपना लड़की केपचास भर सोना के गहना ,   बारात के खर्चा बर्चा खातिर दस बारह लाख ले रूपया , अउरी जब हम आतना कह दीहनी तब हामार पत्नी खाली अतने कहली कि हामारा हीत नाता , आ बेटी दामाद लोग के बिदाई खातिर हामरा हांथ में तीन चार लाख दे देब  ( नहीं कुछ नहीं हमने तो लड़की वालों से कह दिया है कि हमें कुछ नहीं चाहिए , सिर्फ लड़की के जेवर के लिये पचास भर सोना , बारात का पूरा खर्चा- बर्चा , बारातियों का अच्छी तरह से स्वागत - सत्कार और अच्छी तरह बारातियों की बिदाई कर दीजिएगा , और जब हमनें यह सब कह दिया तो अन्त में मेरी पत्नी बस इतना ही  कहीं कि हमारे रिश्तेदारों का बिदाई जो हम करेंगे उसके लिए सिर्फ तीन चार लाख दे दीजिएगा )और फिर उनकी पत्नी मेरी तरफ मुखातिब होकर बोलने लगी - बताईं जी अब बेटो के बियाह में घरे से खार्चा करीं ?  (  बताइए जी अब बेटे की शादी में भी घर से खर्च करें  ?
हम उनकी बातों को अपनी हंसी रोकते हुए सुन रहे थे और हमें हां में हां मिलाना पड़ रहा था क्यों कि कौन उन्हें बेकार का उपदेश देकर उनकी खुशी में खलल डालता , लेकिन मन ही मन सोंच रहे थे कि लोग बेटे की छट्ठी , जन्मदिन , और पढाई लिखाई आदि का खर्च तो खुद उठाते हैं तो फिर विवाह का खर्च खुद क्यों नहीं उठा सकते ?
किरण सिंह

Monday, 27 October 2014

जीवन पथ


!!!!! !!जीवन पथ !!!!!!!
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मन कौतूहल प्रश्न निरुत्तर
जीवन एक पहेली है
कौन पढ़ेगा उसका लिखा
जो लिखा लेख हथेली है

डोर उसके हांथों में है
उडाता जैसे तितली है
हम तो दुनियां रंगमंच पर
करते नर्तन कठपुतली हैं

जीवन पथ रहस्यमय है
क्षण क्षण इसपर शंशय है
लक्ष्य सबका एक मगर
अलग अलग समन्वय है

जीवन एक नदी सी है
पार करना कुशल नीति है
खेता माझी जीवन कस्ती
कर्मयोग ही विश्व रीति है

कैसा विधि विधाता का है
सब करता अपने मन का है
विन पूछे आते सब जग में
और बिन आज्ञा के जाता है
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© copyright @ Kiran singh

सो गई हँसते हँसते

चली गई हँसते हँसते
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पहनी लाल नई चूनरिया
मांग सिंदूरी भरी सुहागन
लाल सजी माथे पर बिंदिया
चूड़ी हाथों में मनभावन

सजी पालकी द्वार खड़ी है
लेने द्वार आ गये साजन
रो रही हैं सखियाँ सहेली
गोरी छोड़ चली घर आँगन

अन्त हो गया उसके जीवन का
थक गई थी चलते चलते
हर खुशियाँ लाती थी लेकर
चली गई हंसते हंसते

खुश किस्मत वो सदासुहागन
रो रोकर सब कहते हैं
कितने छोडे स्वप्न अधूरे
सभी कहानी कहते हैं
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© copyright Kiran singh

Sunday, 26 October 2014

अन्तिम वार्तालाप

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! अन्तिम वार्तालाप !!!!!!!!!!!!!!!!!!!
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शाम को करीब सात बज रहा था , मैं अपनी सहेली के गृह प्रवेश में जाने के लिए तैयार हो रही थी .....तभी मेरी बहन रागिनी का मेरे मोवाइल पर काल आता है ..पापा से बात कर लो वो तुमसेबात करना चाहते हैं ! मैंने पापा का नम्बर डायल किया...... उधर से पापा का भावुक स्वर सुनाई देता है जिसे मैं उनके मुख से पहली बार सुन रही थी क्यों कि इतना भावुक होकर कभी बात ही नहीं किए थे !
पापा कह रहे थे- का जाने काहे आज तोहरा से बतियावे के बड़ा मन करत रहे ( पता नहीं क्यों तुमसे बात करने का बड़ा मन हो रहा था ! ) 
मैंने कहा - प्रणाम
पापा - बंटी ( मेरा भाई , पापा का इकलौता पुत्र ) के त ज्ञान हो गईल बा , जेकरा ज्ञान हो जाला ओकरा मोहमाया ना रहेला आ जेकरा परमानन्द के प्राप्ति हो जाला ओकरा दुनिया से मोह माया ना रहेला ..एसे हम सोचतानी कि बंटी के सबकुछ देके कतहूँ चल जाईं ! ( बंटी को तो ज्ञान हो गया है जिसको ज्ञान हो जाता है उसे मोह माया नहीं रहता है और जिसको परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है उसे दुनिया से मोहमाया नहीं रहता है...इसलिए मैं भी सोच रहा हूँ कि सबकुछ बंटी को देकर कहीं चला जाऊँ )

मैं सोंच में पड़ गई कि आखिर पापा ऐसा क्यों कह रहे हैं मुझे लगा शायद बंटी उसबार रक्षाबंधन में लखनऊ से बलिया नहीं आ रहा था और पापा को उससे मिलने का मन कर रहा होगा इसी लिए ऐसा कह रहे हैं !
फिर मैंने कहा कि आपको बंटी से मिलने का मन है तो उसे बुला लीजिए ....नहीं तो कहिए मैं ही कह देती हूँ और मुझसे बात करने का मन है तो आ जाइए पटना ही !........तब पापा ने कहा एक शर्त पर मैं पटना आऊँगा.......कि तुम बंटी को भी पटना बुलाओगी......तब मैने कहा बलिया क्यों नहीं बंटी को बुला लेते.......तब उन्होंने झुंझलाकर कहा तुम नहीं समझोगी..... तुम बंटी को पटना बुलाओ.......तभी मेरी अम्मा पापा से फोन लेकर मुझसे कहती हैं अब फोन रखो तब से बंटी को चाटे और अब तुम्हें............ फिर फोन रख देती हैं  !  और मैं तैयार होने लगी पार्टी में जाने के लिए !
सुबह मैं बलिया माँ से पापा के बारे में बात करने की कोशिश भी की पर अम्मा जल्दी में थी और थोड़ा बात करके फोन रख  दीं
शाम को करीब पांच बज रहा होगा.. मैं बालकनी में गई तो मेरे पति की आवाज़ सुनाई पडती है ...मेरे ससुर जी गिर गए हैं किस नर्सिंग होम में ले जाना ठीक रहेगा ........फिर मैं बलिया काल करती हूँ और उधर से मेरे भतीजे की रोते हुए आवाज़ आती है नाना जी गिर गए हैं !
मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई और मै आवाक .......जैसे ही मेरे पति घर में प्रवेश करते हैं मैंने कहा
मुझसे कुछ छुपाने की जरूरत नहीं है और मैंने पापा से बातचीत के प्रसंग को सुनाया........और समझ आने लगा कि पापा बंटी को पटना बुलाने की बात क्यों कर रहे थे ........मैंने बंटी एवं सभी बहनों को  भी सारी बातें बताई और सभी जैसे तैसे पटना आने के लिए चल दिए  !
पापा अचेतन अवस्था में पटना आए लेकिन किसी से बात नहीं कर पाए ....डाक्टर बताया कि ब्लडप्रेशर हाई हो गया था जिससे ब्रेन का नस फट गया है बचने का उम्मीद नहीं है फिर भी वेन्टीलेटर पर करीब चौबीस घंटा रखा  जबतक उनकी सांसें चल रही थीं और फिर ईश्वर की मर्जी के सामने चलती किसकी है.............. ?

सचमुच बंटी के लिए सबकुछ छोड़ कहीं चले गए ....शान्ति का भाव स्पष्ट दिख रहा था..... परमानन्द की प्राप्ति हो गई थी उन्हें ....नहीं था उन्हें दुनियाँ से मोह माया   ! उनके कहे एक एक शब्दों का अर्थ समझने लगी थी मैं............ तब और भी स्पष्ट हो गया जब मैं बलिया गई और मकान के बाहर के नेमप्लेट पर मेरे भाई का नाम लिखा था जिसपर पापा ने अपना नाम मिटाकर बंटी का नाम छपवाया था  !
आज भी मेरे मन में यह प्रश्न बार बार उठता है कि क्या दुनियां से जाने वालों को पहले ही ज्ञान हो जाता है
उनसे हुई मेरी अन्तिम वार्तालाप शायद अन्तिम दीक्षा थी !
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किरण सिंह