Thursday, 11 June 2015

फुर्सत के क्षण

!!!!!!!!!!!अतीत!!!!!!!!!!

फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

जाता है स्मॄतियों के वन
घूमता ग्रामीण उपवन
सहज ,सरल ,सुन्दर
गावों का ,  चित्रण करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

चौखंडी मिट्टी का घर
लीपता गायों का गोबर
आँगन में तुलसी का पौधा
स्मॄति में भ्रमण करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

आँखों में वो स्नेह अब कहां
अपनापन वो स्पर्श में. कहां
निश्छल  स्नेह पवन सा
आज भी मन शीतल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

रात में परियों की कहानी
सुबह रामायण सुनाती
वो मीठे स्वर आज भी
कर्णों में गुंजन करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

गुड्डे गुड़ियों संग खेलना
दियों की तराजू में तोलना
मिट्टी के खिलौने बचपन के
आज भी मन चंचल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है
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© copyright @ Kiran singh

Sunday, 7 June 2015

जाने कैसे

जाने कैसे
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आज के ही दिन
हल्दी के रंगों के साथ
चढ़ गई थी
बेरंग जीवन में मेरे
कई रंग
एकसाथ
जाने कैसे

जाने कैसे
मन की हथेलियों पर
कूट पीसकर
मेहंदी से
उकेर दिए गए थे
फूल पत्तियों के साथ
सिर्फ एक ही
अमिट
नाम
जाने कैसे

जाने कैसे
महसूस
होने लगी थी
पहली बार
सजी धजी सी खास
नई नवेली सी
सिंदूरी शाम
सुनहरी
जाने कैसे

जाने कैसे
वो स्याह रातें
चांदनी की चादर ओढ़कर
चुपके से कहीं से
अनेकों रंग चुरा
लाईं थीं
अपने संग
जाने कैसे
जाने कैसे
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©Copyright Kiran singh

Wednesday, 3 June 2015

मन मौजी कलम

मनमौजी कलम
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जब
क्रोध से
काँप उठता है मन
तब
बढ़ जाती है अचानक
हृदय की
धड़कन
और
मस्तिष्क करने लगता है
बेतुके से प्रश्न
तब
अनायास ही
चल पड़ती है ये मेरी
मनमौजी
कलम
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©Copyright Kiran singh

Friday, 22 May 2015

आया सावन.......

आया सावन बहका बहका
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बीत गए दिन रैन तपन .के
आया सावन बहका बहका

झेली बिरहन दिन रैन दोपहरी
अग्नि समीर का झटका
खत्म हो गई कठिन परीक्षा
भीगत तन मन महका

आया सावन.................

आसमान का हृदय पसीजा
अश्रु नयन से छलका
प्रिय के लिए सज गई प्रिया
हरी चूनरी घूंघट लटका

आया सावन...................

देख प्रणय धरती अम्बर का
बदरी का मन चहका
बीच बदरी के झांकते रवि का
मुख मंडल  भी दमका

आया सावन........................

रिमझिम बारिश की बूंदो में
भीगी लता संग लतिका
झुक कर धरणी को कर नमन
खुशी से खुशी मिले हैं मन का

आया सावन...................

चली इठलाती पवन पुरवैया
तरु नाचे कमरिया लचका
रुनक झुनुक पायलिया गाए
संग संग कंगन खनका

आया सावन.................

इन्द्रधनुष का छटा सुहाना
सतरंगी रंग ....छलका
हरियाली धरती पर बिखरी
अम्बर का फूटा मटका

आया सावन.......................
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© copyright @ Kiran singh

नारी सिर्फ माधुर्य नहीं है

नारी सिर्फ माधुर्य नहीं है
नव दुर्गा अवतारिणी है
तुम यदि हो महिषासुर
वह चणडी रूप धारिणी है

शील है सौन्दर्य है 
वैदिक ऋचा है वो 
देवता वन्दन करते
स्वयं वन्दना है वो 

शक्ति है संघर्ष है 
लक्ष्मी की प्रतिमा है वो 
बुद्धि प्रबल करती
स्वयं शारदा है वो

सॄष्टि है श्रॄंगार है
धीर धरा है वो
चेतन जगत की
स्वयं चेतना है वो

तुम क्या छलोगे उसे
स्वयं छलना है वो
तुम क्या दोगे उसे
स्वयं दाता है वो

मत रोको प्रवाह को
बहने दो सरिता है वो
तारिणी जगत की
स्वयं गंगा है वो

सूर्य की किरण है
धूप की छटा है वो
चाँदनी निशा की और
शीतल हवा है वो
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©copyright @Kiran singh

Sunday, 17 May 2015

कहाँ गये वे दिवस सखी री

कहाँ गये वे दिवस सखी री , कहाँ गईं अब वे रातें।

झगड़ा – रगड़ा, हँसी ठिठोली, वह मीठी – मीठी बातें।

दादी की उस कथा – कहानी में रहते राजा – रानी ।

रातों में सुनते थे पर दिन में करते थे मनमानी।

भीग रहे थे हम मस्ती में, जब होती थी बरसातें।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

पूछा करते थे कागा से, अतिथि कौन आयेगा कह।

पवन देवता से करते थे , मिन्नत की जल्दी से बह।

रात चाँदनी बाँट रही थी, छत पर सबको सौगातें।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

रिश्तों में तब था अपनापन, सब अपने से लगते थे ।

बिना दिखावा के मिलजुलकर, हम आपस मे रहते थे।

मन था हम सबका ही निश्छल, कोमल थी हर जज्बातें।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

छत पर हम तारे गिन – गिनकर, सपनो में रंग भरते थे।

संग हमारे अपने थे तो , नहीं किसी से डरते थे।

विकट घड़ी में भी रहते थे, तब हम सब हँसते गाते।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

चौखंडी आँगन में तुलसी, लहरा कर अपना आँचल।

बुरी बला को दूर भगाकर, भर देती थी हममे बल।

शायद इसी वजह से हम तब, नहीं बेवजह घबराते।

कहाँ गये वे दिवस सखी री………………………

दिवाली के बाद दियों को, तुला बनाकर हम खेले । 

पता नहीं क्यों याद आ रहे, बचपन वाले वे मेले। 

मिट्टी के वे खेल – खिलौने तोल – मोल कर  ले आते। 

कहाँ गये वे दिवस सखी री……………………… 

आइस – बाइस कित – कित गोटी, खेल हमारे होते थे। 

बातें करते – करते छत पर, निश्चिंत हो सोते थे। 

मीठे – मीठे सपने आकर, मन हम सबका बहलाते। 

कहाँ गये वे दिवस सखी री……………

Saturday, 16 May 2015

बुजुर्ग

तेज भागती हुई जिन्दगी में समय नहीं है किसी के पास..! आज सभी भाग रहे हैं रेस के घोड़े की तरह
जिनका मकसद सिर्फ रेस जीतना है चाहे उसके लिए कितनी ही कुर्बानी देना पड़े..! पाने की धुन में क्या खोया किसी को खबर नहीं.... हो भी कैसे... कौन समझाए...! टुकड़े टुकड़ों में बिखर गया है परिवार... चलन हो गया है एकल परिवार का... उसमे भी पति पत्नी दोनों कमाऊ... कहां से समय निकाल पाएंगे वे बुजुर्गों के लिए  दुष्परिणाम भुगत रहे हैं हमारे बुजुर्ग..!चूंकि हमारे बुजुर्गों ने अपने बच्चों के खुशियों के लिए अपना सर्वस्व  ( तन , मन , और धन ) न्यौछावर कर दिया...! बच्चों की परवरिश में कभी नहीं सोचा कि कभी उन्हें अपने ही घर में अकेलेपन और उपेक्षा का सामना करना पड़ेगा...! परन्तु वे दोषी ठहरायएं भी तो किसे उन्होंने स्वयं ही तो स्वयं को लुटा दिया था..अपनो में ! अपने भाग्य को कोसते हुए काट रहे हैं वे एक एक पल..! गुजारिश करते हैं ईश्वर से कि वे ही अपने घर बुला लें पर ईश्वर भी तो मनमौजी ही है.. कहाँ सुनता है वो भी उनकी... भज रहे हैं घर के किसी कोने में राम नाम...!
सोंचती हूँ उनके अकेलेपन से कहीं बेहतर होता ओल्डएज होम.. देखकर डरती हूँ अपने भविष्य से..
सोंचती हूँ बुक करा ही लूँ ओल्डएज होम . अभी तो हाथ पैर चल रहा है..! बच्चे तो सपूत हैं पर बस जाएंगे बिदेश में या देश के किसी कोने में   फिर कहाँ फुर्सत मिलेगा..! बोया बबूल तो आम कहाँ से मिलेगा....!
या फिर सोंचती हूँ किसी बेघर को ठौर देकर रख लूँ अपने  घर में.. कम से कम सेवा तो करेंगे..! फिर डरती हूँ कि...............
अरे मैं भी कहाँ अपने भविष्य में उलझ गई..! बहुत मुश्किल भी नहीं है बुजुर्गों की समस्याओं का समाधान..हम जरा भी ध्यान रखें तो..!
घर लेते समय यह ध्यानमें जरूर रखना चाहिए कि हमारे पड़ोसी भी समान उम्र के हों ताकि हमारे बुजुर्गों को उनके माता पिता से भी मिलना जुलना होता रहे और हमारे बुजुर्ग भी आपस में मैत्रीपूर्ण संबंध रखते हुए दुख सुख का आदान प्रदान कर सके..! मंदिरों में भजन कीर्तन होता रहता है उन्हें अवश्य भेजें.. प्रार्थना और भजन कीर्तन से मन में नई उर्जा का प्रवेश होता है जिससे हमारे बुजुर्ग प्रसन्न रहेंगे..! मानते हैं कि समयाभाव है फिर भी कुछ समय चुराकर बुजुर्गों के साथ बिताएं जिससे आपको तो आत्मसंतोष मिलेगा ही.. बुजुर्गों को भी कितनी प्रसन्नता मिलेगी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है ..! समय समय पर उपहार स्वरूप उन्हें किताबें भेट करें जिसे पढ़कर उनके अन्दर सकारात्मक विचार पनपे..! यकीन मानिए बुजुर्गों की सेवा से मेवा जरूर मिलता है जरा करके तो देखिए..!
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©Copyright Kiran singh