Thursday, 3 September 2015

देख चाँद

!!!!!" देख चाँद !!!!!
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देखो चाँद दशा मेरी
कुछ तुम भी दो दीक्षा
कितना लोगे तुम मेरे
धैर्य की परीक्षा  

मैं तो ठूंठ पेड़ हूँ  
कोई आता नहीं यहाँ
खग नीड़ ले उड़े  
जाने कहाँ कहाँ

ना कोयलिया गाती
ना पथिक ही कोई आता
अपनी ही जिंदगानी
अब और नहीं सुहाता

कभी पुरवाई की आहट
कभी किरण की चाहत
आस लगाए बैठे
कभी तो मिलेगी राहत

तुम ही रहे हो साक्षी
मैं था महत्वाकांक्षी
पथिक को देता आया छाया
अब नहीं किसी को माया

फिर मैं दूंगा अर्घ तुम्हें
बस सावन को आने दो  
छट जायेंगे दुख के बादल
मन में इक आस जगाने दो

नहीं रहता है समय एक सा
यह तो ध्रुव सत्य है
मैं बदलता हूँ तुम भी बदलो
यही समय का कथ्य है

जीवन में सत्कर्म करो
मत करो फल की इच्छा
नित्य पाठ करो गीता का
फिर करो समीक्षा
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© copyright Kiran singhd

फिर आओ नन्दलाल धरा पर

फिर आओ नन्दलाल धरा पर
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फिर आओ नन्दलाल धरा पर 
लेकर नव अवतार
फैल गया है इस धरती पर
फिर से अत्याचार

राह निहारे यशुमति मैया 
सूना है घर आंगन
मटकी दधि से भरी हुई है 
आओ खाने माखन

प्रतीक्षारत राधा रानी 

बैठीं पलक बिछाये 

छेड़ो मुरली तुम मधुवन में 

हम सब नाचे गायें 



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किरण सिंह

Sunday, 30 August 2015

मैं बावरी

मैं बावरी जोगन बन गई
पिया तुम्हारी प्रीत में

सुध-बुध अपना खो गई मैं
मन से तेरी हो गई मैं
हार कर भी दिल अपना मैं
खुश हूँ तेरी जीत में
मैं बावरी जोगन.................

पल भर भी तुझे भूल न पाऊँ
बोलो प्रीतम क्या मैं गाऊँ
जब भी लिखती छन्द में ढलकर
आ जाते हो गीत में
मैं बावरी जोगन...................

कहीं भी तुझ बिन जी नहीं लागे
कैसे हैं ये प्रेम के धागे
बांध लिये हमें जाने कैसे
छल गई मैं इस रीत में
मैं बावरी जोगन......................

हर तरफ़ दिखता तू ही है
कहीं ईश तू ही तो नहीं है
हर धड़कन में तू ही झंकृत
मेरे हर संगीत में
मैं वैरागन जोगन....................

©किरण सिंह

Tuesday, 25 August 2015

तुम अपना धीरज मत खोना


तुम अपना धीरज मत खोना
समस्याएँ आएँगी.. ही
लौट पुनः वो जाएँगी भी
घबरा कर जीवन पथ में तुम विचलित मत होना
तुम अपना धीरज मत खोना

कोशिश तो करते रहना है
लक्ष्य दूर भले कितना .है
प्रारंभिक असफलताओं से कभी हताश  मत होना
तुम अपना धीरज मत खोना

पथ में चलते रहो ..निरन्तर
जितना भी हो सके यत्न कर
काँटे छलनी किए पांव तो साहस खो मत रोना
तुम अपना धीरज मत खोना

समय एक सा नहीं रहता है
उसकी नियति में चलना है
लौटेगा जब काल चक्र तुम खुशियों के पुष्प पिरोना
तुम अपना धीरज मत खोना
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© किरण सिंह

Monday, 27 July 2015

अगली पीढ़ी के लिए

अगली पीढ़ी के लिए
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यकीं कर राहों पर
जब स्वयं
बढ़ते हैं कदम
लक्ष्य की तरफ
तब
पीछे छूट जाते हैं
अपने ही कदमों की
निशानियाँ
साथ रह जाती हैं कुछ
खट्टी-मीठी
अनुभूतियाँ
और बिछड़े हुए पथिक की
स्मृतियाँ
फिर हम बिछाना चाहते हैं
उन राहों पर
मखमल
अगली पीढ़ी के लिए
कि कहीं हमारी तरह
उनके पांव भी
न हो जाएँ
छलनी
तभी तो हम
सुनाते हैं
अपनी भूली बिसरी
कहानियां
और सौप देना चाहते हैं उन्हें
अपनी
कुछ
जिम्मेदारियां
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©कॉपीराइट किरण सिंह

Thursday, 11 June 2015

फुर्सत के क्षण

!!!!!!!!!!!अतीत!!!!!!!!!!

फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

जाता है स्मॄतियों के वन
घूमता ग्रामीण उपवन
सहज ,सरल ,सुन्दर
गावों का ,  चित्रण करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

चौखंडी मिट्टी का घर
लीपता गायों का गोबर
आँगन में तुलसी का पौधा
स्मॄति में भ्रमण करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

आँखों में वो स्नेह अब कहां
अपनापन वो स्पर्श में. कहां
निश्छल  स्नेह पवन सा
आज भी मन शीतल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

रात में परियों की कहानी
सुबह रामायण सुनाती
वो मीठे स्वर आज भी
कर्णों में गुंजन करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

गुड्डे गुड़ियों संग खेलना
दियों की तराजू में तोलना
मिट्टी के खिलौने बचपन के
आज भी मन चंचल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है
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© copyright @ Kiran singh

Sunday, 7 June 2015

जाने कैसे

जाने कैसे
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आज के ही दिन
हल्दी के रंगों के साथ
चढ़ गई थी
बेरंग जीवन में मेरे
कई रंग
एकसाथ
जाने कैसे

जाने कैसे
मन की हथेलियों पर
कूट पीसकर
मेहंदी से
उकेर दिए गए थे
फूल पत्तियों के साथ
सिर्फ एक ही
अमिट
नाम
जाने कैसे

जाने कैसे
महसूस
होने लगी थी
पहली बार
सजी धजी सी खास
नई नवेली सी
सिंदूरी शाम
सुनहरी
जाने कैसे

जाने कैसे
वो स्याह रातें
चांदनी की चादर ओढ़कर
चुपके से कहीं से
अनेकों रंग चुरा
लाईं थीं
अपने संग
जाने कैसे
जाने कैसे
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©Copyright Kiran singh