Tuesday, 20 June 2017

दोहे

गदोहा
काजल की है कोठरी , राजनीति परिवेश |
सम्हल कर रखना कदम , धीरे करो प्रवेश ||

©किरण सिंह

मानवता जीवित रहे, बढ़े आपसी प्यार |
चलो मनुज हम तोड़ दें , मजहब की दीवार |

©किरण सिंह

चलते चलते हो गई , जीवन की अब शाम |
दीप जला लूँ  ज्ञान का , मैं लूँ प्रभु का नाम  ||

©किरण सिंह

बीच भँवर नैया फँसी , घिरी घटा घनघोर |
धड़क रहा मेरा जिया, झरे नयन से लोर ||

©किरण सिंह

रखो स्वयं को संतुलित , करो मगर सत्कार |
तारीफ़ करना लाजमी , बनना न चाटुकार ||

©किरण सिंह

रहो हमेशा संतुलित , मिले जीत या हार |
हर हालत में ईश का , व्यक्त करो आभार ||

©किरण सिंह 

अपने जीवन को मनुज , मत जाने दो व्यर्थ |
कर्म करो संसार में , दो जीवन को अर्थ ||

©किरण सिंह

औरों से पहले मनुज , करो आत्मसम्मान |
कभी वहाँ जाना नहीं, जहाँ मिले अपमान ||

©किरण सिंह

यदि चाहो सम्मान तो , बस इतना लो सीख |
दया प्रेम धन मान का , कभी न माँगो भीख ||

©किरण सिंह

भाँति भाँति के लोग हैं , भाँति भाँति के साज |
सुनिये सबकी कीजिये , अपने मन की काज ||

©किरण

अलग अलग सब लोग हैं , सबकी अलग पसंद |
जो तुमको अच्छा लगे ,वही लिखो तुम छन्द ||

©किरण सिंह 

घूम रहे बेखौफ हो  , करके कातिल खून |
कैसे होगा न्याय जब , अंधा है कानून ||

©किरण सिंह

बिकता है ईमान अब , बिकते हैं इन्सान |
सोच रहा हर आदमी , आफत में है जान ||

©किरण सिंह

यूँ तो इस संसार में, मिलते लोग अनेक |
पर दिल में रहते वही , जिनका दिल हो नेक ||

©किरण सिंह

स्वारथ से जो भी जुड़े, गये अन्ततः टूट |
जुड़ते हैं जो प्रेम से , बन्धन वही अटूट ||

। ©किरण सिंह

स्वारथ से रिश्ते जुड़े , स्वारथ में ही प्यार |
स्वारथ है संसार में , करो सत्य स्वीकार ||

©किरण सिंह

समझौता सीखो प्रथम , फिर करना अनुबंध |
सिर्फ प्रेम से ही नहीं , टिकते हैं सम्बन्ध ||

©किरण सिंह

माना स्वारथ से टिका ,कोई भी सम्बन्ध  |
फिर भी होना लाजमी , उनसे कुछ अनुबंध ||

©किरण सिंह

हर रिश्तों के आपसी , होते हैं अनुबंध |
सीमा को लांघो नहीं , तोड़ो मत तटबंध ||

©किरण सिंह

कैसे सम्भव हो भला , करना सबको तुष्ट |
लोगों को जब ईश भी , कर न सके संतुष्ट ||

©किरण सिंह

मूरख मानुष ही करे , अपनी स्वयं बखान |
खुशबू है किस फूल की , हो जाती पहचान ||

©किरण सिंह

कठपुतली है आदमी , डोर ईश के हाथ |
रंगमंच है जिंदगी,नाचो गाओ साथ ||

©किरण सिंह

भटक रहा मन बावरा , सूझे नहीं उपाय |
कृपा करो माँ शारदे , कुमति सुमति हो जाय ||

©किरण सिंह

मन चंचल उर बावरा,बस तू ही मति धीर |
मन को समझाओ किरण ,रहता बहुत अधीर ||

©किरण सिंह

खत्म आतंकवाद को , कर दो वीर जवान |
गायेंगे हम गर्व से , जय जय हिन्दुस्तान ||

©किरण सिंह

मिट्टी लेकर सत्य की , धर्म मार्ग दो लीप |
बाती लो विश्वास की , करो प्रज्वलित दीप ||

दोहा

वृक्ष लगे जो झूठ के , आज हो रहे ठूठ |
कभी सत्य के सामने , नहीं टिका है झूठ ||

©किरण सिंह

आँखों में सपने नये , मस्तक पर है श्वेद |
तुमपर ही दुनिया टिकी , तुमसे ही क्यों भेद ||

©किरण सिंह

मीठी माया जाल में , फंसो नहीं इन्सान |
असली नकली कौन है, अन्तः से पहचान ||

©किरण सिंह

मायावी संसार है , मानुष आँखें खोल |
ओ मन विचलित बावरे , इधर उधर मत डोल ||

©किरण सिंह

उग आया सूरज नभ में, चिड़ियाँ छेड़ीं राग |
खिलकर किरणें कह रहीं , भोर भयो अब जाग ||

©किरण सिंह

यूँ तो अपने आप में , रचना सभी विशेष |
लेखन सार्थक है वही , जिसमें हो संदेश ||

©किरण सिंह

लक्ष्मी शक्ति सरस्वती , नारी तेरा रूप |
तुमसे ही संसार है, तेरा कृत्य अनूप ||

©किरण सिंह

बरखा
*****

सूरज ज्यों नभ में उगा , गयी यामिनी भाग |
खिलकर किरणें कह रहीं , भोर भयो अब जाग ||

©किरण सिंह

बदरा नभ में छा गये , शीतल बहे बयार |
मनभावन ऋतु आ गई , लेकर संग बहार ||

©किरण सिंह

बरखा रानी आ गईं , लाईं संग फुहार  |
बरस बरस बूंदें करें , छनन छनन छनकार ||

©किरण सिंह

नभ में सतरंगी छटा, बिखरा बिखरा जाय |
इन्द्र धनूषी चुन्दरी, मनवा बड़ा लुभाय ||

©किरण सिंह

जीत हो गई प्रीत की , देखो आखिरकार |
वसुंधरा हर्षित हुईं , नभ छलकाये प्यार ||

©किरण सिंह 

©किरण सिंह।

नारी

तुमको मुझसे प्यार है , कहते हो हर बार  |
मुझको भी स्वीकार है , प्रेम तुम्हारा प्यार ||

©किरण सिंह

बैठो मेरे सामने , करो नहीं इज़हार |
आँखों में तेरे सजन , पढ़ लूंगी मैं प्यार  ||

©किरण सिंह

पिया मिले थे स्वप्न में , लाये लिखकर गीत |
जिया मेरा धड़क गया , गूँज उठा संगीत ||

©किरण सिंह

नयनो में सपने नये , उर में भर ली प्रीत |
प्रिय तुमसे ऐसे मिली , जैसे सुर संगीत ||

©किरण सिंह

चुटकी भर सिंदूर से, गयी स्वयं को हार |
इतराई सौभाग्य पर, कर सोलह श्रृंगार ||

चूड़ी कंगन हथकड़ी , पायल बेड़ी पाँव |
बंधन मंगल सूत्र का , नाक नथनिया ठाँव ||

©किरण सिंह

सिंदूर बिन्दी चूड़ियाँ , साजन का उपहार |
इनसे ही तो है खुशी , इनसे  ही श्रृंगार |

©किरण सिंह

बिंदी है मन मोहिनी , जादूगर सिंदूर |
संग सात फेरे लिये , कैसे होगे दूर ||

©किरण सिंह

प्रिय मैं ठहरी बावरी , मैं क्या जानूँ प्रीत |
तुम ही मेरे छन्द हो , तुम ही मेरे गीत ||

©किरण सिंह
प्रिय मैं तो पाती लिखी , शब्दों में भर प्रीत |
बहकी मेरी लेखनी, लिखा गया नव गीत ||

©किरण सिंह

पिया तुम्हारे प्रेम में , गई स्वयं को भूल |
अब पथ में चिन्ता नहीं , मिले फूल या शूल ||

©किरण सिंह

अक्षर अक्षर जोड़ के , सुनो प्रिये मन मीत |
तुमको मैनें लिख दिया , छन्द बद्ध कर गीत ||

©किरण सिंह

घड़ी प्रतीक्षा में कटे , चैन सुबह ना शाम |
कजरा लेकर लिख दिया , पाती पी के नाम ||

©किरण सिंह

बाँई आँख फड़क रही , छत पर बोले काग |
शगुन उचर कर कर रहा , जागे मेरे भाग ||

©किरण सिंह

चलकर मेरी लेखनी , ज्यों ही लिख दी मीत |
हृदय तार झंकृत हुआ ,  गूँज उठा संगीत ||

©किरण सिंह

जुड़ते हैं ज्यों प्रेम से , दो हृदयों के तार |
उठे तरंगें एक में , दूजे में झनकार ||

©किरण सिंह

यही प्रीत की रीत है , क्यों पछताऊँ मीत |
हार गई खुद को भले , लिया तुम्हें पर  जीत ||

©किरण सिंह

प्रिय से मिलकर नेह से , होतीं आँखें चार |
धीरे-धीरे ही सही , हो जाता है प्यार ||

©किरण सिंह

जबसे तुमसे जुड़ गई , मेरे मन की डोर |
मुझपर ही मेरा सजन, चले नहीं अब जोर ||

©किरण सिंह 

साँसें लय में चल रही , धड़कन देती ताल |
चूमते पिया अधर मैं, हुई शर्म से लाल ||

कर सोलह श्रृंगार ज्यों , झटके मैनें बाल ||
सजना से नयना मिले , हुई शर्म से लाल  |

©किरण सिंह