गदोहा
काजल की है कोठरी , राजनीति परिवेश |
सम्हल कर रखना कदम , धीरे करो प्रवेश ||
©किरण सिंह
मानवता जीवित रहे, बढ़े आपसी प्यार |
चलो मनुज हम तोड़ दें , मजहब की दीवार |
©किरण सिंह
चलते चलते हो गई , जीवन की अब शाम |
दीप जला लूँ ज्ञान का , मैं लूँ प्रभु का नाम ||
©किरण सिंह
बीच भँवर नैया फँसी , घिरी घटा घनघोर |
धड़क रहा मेरा जिया, झरे नयन से लोर ||
©किरण सिंह
रखो स्वयं को संतुलित , करो मगर सत्कार |
तारीफ़ करना लाजमी , बनना न चाटुकार ||
©किरण सिंह
रहो हमेशा संतुलित , मिले जीत या हार |
हर हालत में ईश का , व्यक्त करो आभार ||
©किरण सिंह
अपने जीवन को मनुज , मत जाने दो व्यर्थ |
कर्म करो संसार में , दो जीवन को अर्थ ||
©किरण सिंह
औरों से पहले मनुज , करो आत्मसम्मान |
कभी वहाँ जाना नहीं, जहाँ मिले अपमान ||
©किरण सिंह
यदि चाहो सम्मान तो , बस इतना लो सीख |
दया प्रेम धन मान का , कभी न माँगो भीख ||
©किरण सिंह
भाँति भाँति के लोग हैं , भाँति भाँति के साज |
सुनिये सबकी कीजिये , अपने मन की काज ||
©किरण
अलग अलग सब लोग हैं , सबकी अलग पसंद |
जो तुमको अच्छा लगे ,वही लिखो तुम छन्द ||
©किरण सिंह
घूम रहे बेखौफ हो , करके कातिल खून |
कैसे होगा न्याय जब , अंधा है कानून ||
©किरण सिंह
बिकता है ईमान अब , बिकते हैं इन्सान |
सोच रहा हर आदमी , आफत में है जान ||
©किरण सिंह
यूँ तो इस संसार में, मिलते लोग अनेक |
पर दिल में रहते वही , जिनका दिल हो नेक ||
©किरण सिंह
स्वारथ से जो भी जुड़े, गये अन्ततः टूट |
जुड़ते हैं जो प्रेम से , बन्धन वही अटूट ||
। ©किरण सिंह
स्वारथ से रिश्ते जुड़े , स्वारथ में ही प्यार |
स्वारथ है संसार में , करो सत्य स्वीकार ||
©किरण सिंह
समझौता सीखो प्रथम , फिर करना अनुबंध |
सिर्फ प्रेम से ही नहीं , टिकते हैं सम्बन्ध ||
©किरण सिंह
माना स्वारथ से टिका ,कोई भी सम्बन्ध |
फिर भी होना लाजमी , उनसे कुछ अनुबंध ||
©किरण सिंह
हर रिश्तों के आपसी , होते हैं अनुबंध |
सीमा को लांघो नहीं , तोड़ो मत तटबंध ||
©किरण सिंह
कैसे सम्भव हो भला , करना सबको तुष्ट |
लोगों को जब ईश भी , कर न सके संतुष्ट ||
©किरण सिंह
मूरख मानुष ही करे , अपनी स्वयं बखान |
खुशबू है किस फूल की , हो जाती पहचान ||
©किरण सिंह
कठपुतली है आदमी , डोर ईश के हाथ |
रंगमंच है जिंदगी,नाचो गाओ साथ ||
©किरण सिंह
भटक रहा मन बावरा , सूझे नहीं उपाय |
कृपा करो माँ शारदे , कुमति सुमति हो जाय ||
©किरण सिंह
मन चंचल उर बावरा,बस तू ही मति धीर |
मन को समझाओ किरण ,रहता बहुत अधीर ||
©किरण सिंह
खत्म आतंकवाद को , कर दो वीर जवान |
गायेंगे हम गर्व से , जय जय हिन्दुस्तान ||
©किरण सिंह
मिट्टी लेकर सत्य की , धर्म मार्ग दो लीप |
बाती लो विश्वास की , करो प्रज्वलित दीप ||
दोहा
वृक्ष लगे जो झूठ के , आज हो रहे ठूठ |
कभी सत्य के सामने , नहीं टिका है झूठ ||
©किरण सिंह
आँखों में सपने नये , मस्तक पर है श्वेद |
तुमपर ही दुनिया टिकी , तुमसे ही क्यों भेद ||
©किरण सिंह
मीठी माया जाल में , फंसो नहीं इन्सान |
असली नकली कौन है, अन्तः से पहचान ||
©किरण सिंह
मायावी संसार है , मानुष आँखें खोल |
ओ मन विचलित बावरे , इधर उधर मत डोल ||
©किरण सिंह
उग आया सूरज नभ में, चिड़ियाँ छेड़ीं राग |
खिलकर किरणें कह रहीं , भोर भयो अब जाग ||
©किरण सिंह
यूँ तो अपने आप में , रचना सभी विशेष |
लेखन सार्थक है वही , जिसमें हो संदेश ||
©किरण सिंह
लक्ष्मी शक्ति सरस्वती , नारी तेरा रूप |
तुमसे ही संसार है, तेरा कृत्य अनूप ||
©किरण सिंह
बरखा
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सूरज ज्यों नभ में उगा , गयी यामिनी भाग |
खिलकर किरणें कह रहीं , भोर भयो अब जाग ||
©किरण सिंह
बदरा नभ में छा गये , शीतल बहे बयार |
मनभावन ऋतु आ गई , लेकर संग बहार ||
©किरण सिंह
बरखा रानी आ गईं , लाईं संग फुहार |
बरस बरस बूंदें करें , छनन छनन छनकार ||
©किरण सिंह
नभ में सतरंगी छटा, बिखरा बिखरा जाय |
इन्द्र धनूषी चुन्दरी, मनवा बड़ा लुभाय ||
©किरण सिंह
जीत हो गई प्रीत की , देखो आखिरकार |
वसुंधरा हर्षित हुईं , नभ छलकाये प्यार ||
©किरण सिंह
©किरण सिंह।
नारी
तुमको मुझसे प्यार है , कहते हो हर बार |
मुझको भी स्वीकार है , प्रेम तुम्हारा प्यार ||
©किरण सिंह
बैठो मेरे सामने , करो नहीं इज़हार |
आँखों में तेरे सजन , पढ़ लूंगी मैं प्यार ||
©किरण सिंह
पिया मिले थे स्वप्न में , लाये लिखकर गीत |
जिया मेरा धड़क गया , गूँज उठा संगीत ||
©किरण सिंह
नयनो में सपने नये , उर में भर ली प्रीत |
प्रिय तुमसे ऐसे मिली , जैसे सुर संगीत ||
©किरण सिंह
चुटकी भर सिंदूर से, गयी स्वयं को हार |
इतराई सौभाग्य पर, कर सोलह श्रृंगार ||
चूड़ी कंगन हथकड़ी , पायल बेड़ी पाँव |
बंधन मंगल सूत्र का , नाक नथनिया ठाँव ||
©किरण सिंह
सिंदूर बिन्दी चूड़ियाँ , साजन का उपहार |
इनसे ही तो है खुशी , इनसे ही श्रृंगार |
©किरण सिंह
बिंदी है मन मोहिनी , जादूगर सिंदूर |
संग सात फेरे लिये , कैसे होगे दूर ||
©किरण सिंह
प्रिय मैं ठहरी बावरी , मैं क्या जानूँ प्रीत |
तुम ही मेरे छन्द हो , तुम ही मेरे गीत ||
©किरण सिंह
प्रिय मैं तो पाती लिखी , शब्दों में भर प्रीत |
बहकी मेरी लेखनी, लिखा गया नव गीत ||
©किरण सिंह
पिया तुम्हारे प्रेम में , गई स्वयं को भूल |
अब पथ में चिन्ता नहीं , मिले फूल या शूल ||
©किरण सिंह
अक्षर अक्षर जोड़ के , सुनो प्रिये मन मीत |
तुमको मैनें लिख दिया , छन्द बद्ध कर गीत ||
©किरण सिंह
घड़ी प्रतीक्षा में कटे , चैन सुबह ना शाम |
कजरा लेकर लिख दिया , पाती पी के नाम ||
©किरण सिंह
बाँई आँख फड़क रही , छत पर बोले काग |
शगुन उचर कर कर रहा , जागे मेरे भाग ||
©किरण सिंह
चलकर मेरी लेखनी , ज्यों ही लिख दी मीत |
हृदय तार झंकृत हुआ , गूँज उठा संगीत ||
©किरण सिंह
जुड़ते हैं ज्यों प्रेम से , दो हृदयों के तार |
उठे तरंगें एक में , दूजे में झनकार ||
©किरण सिंह
यही प्रीत की रीत है , क्यों पछताऊँ मीत |
हार गई खुद को भले , लिया तुम्हें पर जीत ||
©किरण सिंह
प्रिय से मिलकर नेह से , होतीं आँखें चार |
धीरे-धीरे ही सही , हो जाता है प्यार ||
©किरण सिंह
जबसे तुमसे जुड़ गई , मेरे मन की डोर |
मुझपर ही मेरा सजन, चले नहीं अब जोर ||
©किरण सिंह
साँसें लय में चल रही , धड़कन देती ताल |
चूमते पिया अधर मैं, हुई शर्म से लाल ||
कर सोलह श्रृंगार ज्यों , झटके मैनें बाल ||
सजना से नयना मिले , हुई शर्म से लाल |
©किरण सिंह