Friday, 9 March 2018

दायरे

जिस प्रकार महिलाएँ किसी की बेटी बहन पत्नी तथा माँ हैं उसी प्रकार पुरुष भी किसी के बेटे भाई पति तथा पिता हैं इसलिए यह कहना न्यायसंगत नहीं होगा कि महिलायें सही हैं और पुरुष गलत ! पूरी सृष्टि ही पुरुष तथा प्रकृति के समान योग से चलती है इसलिए दोनों की सहभागिता को देखते हुए दोनों ही अपने आप में विशेष हैं तथा सम्मान के हकदार हैं!
महिलाएँ आधुनिक हों या रुढ़िवादी हरेक की कुछ अपनी पसंद नापसंद, रुचि अभिरुचि बंदिशें, दायरे तथा स्वयं से किये गये कुछ वादे होते हैं इसलिए वे अपने खुद के बनाये गये दायरे में ही खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं !
उन्हें हमेशा ही यह भय सताते रहता है कि लक्ष्मण रेखा लांघने पर कोई रावण उन्हें हर न ले जाये ! वैसे तो ये रेखाएँ समाज तथा परिवार के द्वारा ही खींची गईं होती हैं किन्तु अधिकांश महिलाएँ इन रेखाओं के अन्दर रहने की आदी हो जातीं हैं इसलिए आजादी मिलने के बावजूद भी वे अपने लिये स्वयं रेखाएं खींच लेतीं हैं... ऐसे में इन रेखाओं को जो भी उनकी इच्छा के विरुद्ध लांघने की कोशिश करता है तो वह शख्स शक के घेरे में तो आ ही जाता है भले ही कितना भी संस्कारी तथा सुसंस्कृत क्यों न हो इसलिए यदि कोई महिला अपने आप में सिमटकर रहना चाहती है तो उसके इस व्यवहार से पुरुषों को आहत नहीं होना चाहिए बल्कि उन्हें सम्मान देना चाहिए क्योंकि वे भी तो अपने घर की महिलाओं से ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं!
यह मनुष्य का स्वभाव ही है कि वह अपनी प्रशंसा से खुश और आलोचना से दुखी हो जाता है इसलिए जब पुरुष और स्त्री में आपसी मैत्रीपूर्ण व्यवहार हो तो एकदूसरे की प्रशंसा लाजमी है ! यह भी सही है कि प्रशंसा के मामले में स्त्रियों की तुलना में पुरुष कुछ ज्यादा ही उदार होते हैं यह अच्छी बात है किन्तु  प्रशंसा भी मर्यादा में रहकर सम्मानजनक रूप में ही की जानी चाहिए  वर्ना लेने के देने पड़ जायेंगे ! पुरुष हो या स्त्री दूसरे को मान देने से पहले उन्हें अपने स्वाभिमान की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि सम्मानित व्यक्तियों के द्वारा दिया गया मान अधिक सम्मानजनक होता है या यूँ भी कहा जा सकता है कि जो स्वयं को मान नहीं दे पाये वो औरों को क्या सम्मान देगा!
यह बात आभासी जगत में भी लागू होता  है जहाँ महिलाओं को अभिव्यक्ति की आजादी मिली है ! यहाँ किसी का हस्तक्षेप नहीं है फिर भी अधिकांश महिलाओं ने अपना दायरा स्वयं तय कर लिया है.! जहाँ तक अपने बारे में जानकारी देना सही समझती हैं वे अपने प्रोफाइल, पोस्ट तथा तस्वीरों के माध्यम से दे ही देतीं हैं! और दायरों के अन्दर कमेंट के रिप्लाई में कुछ जवाब दे ही देतीं हैं इसीलिये बिना विशेष घनिष्टता या बिना किसी विशेष जरूरी बातों के मैसेज नहीं करना चाहिए और यदि कर भी दिये तो  रिप्लाई नहीं मिलने पर यह  समझ जाना चाहिए कि अमुक व्यक्ति को व्यक्तिगत तौर पर बातें करने में रुचि नहीं है या फिर उसके पास समय नहीं है या कुछ और विवशता है इसलिए दुबारा मैसेज नहीं भेजना चाहिए !
इसके अलावा  कमेंट तथा रिप्लाई भी दायरों में रह कर ही सम्मानजनक रूप में करना चाहिए !  जिससे पुरुषों के भी स्वाभिमान की रक्षा हो सके तथा वे भी अपने हिस्से का सम्मान प्राप्त कर सकें!

©किरण सिंह

Monday, 15 January 2018

मित्रता

मित्रता एक ऐसा सम्बन्ध है, जिसे हम स्वयं बनाते हैं। बाकी सारे रिश्ते ताे जन्म के साथ ही बन जाते हैं।
मित्रता वह भावना है जो दो व्यक्तियों के  हृदयों को आपस में जोड़ती है! जिसका सानिध्य हमें सुखद लगता है तथा हम मित्र के साथ  स्वयं को सहज महसूस करते हैं, इसलिए अपने मित्र से अपना दुख सुख बांटने में ज़रा भी झिझक नहीं होती ! बल्कि अपने मित्र से अपना दुख बांटकर हल्का महसूस करते हैं और सुख बांटकर सुख में और भी अधिक सुख की अनुभूति करते हैं!
वैसे तो कहा जता है कि मित्रता में जाति, धर्म, उम्र तथा स्तर नहीं देखा जाता ! किन्तु मेरा व्यक्तिगत अनुभव कि मित्रता यदि समान उम्र , समान स्तर , तथा समान रूचि के लोगों में अधिक गहरी होती है क्योंकि स्थितियाँ करीब करीब समान होती है  ऐसे में एक दूसरे के भावनाओं को समझने में अधिक आसानी होती है इसलिए मित्रता अच्छी तरह से निभती है!

वैदिक काल से ही मित्रता के विशिष्ट मानक दृष्टिगत होते आये है| जहाँ रामायण काल में राम और निषादराज, सुग्रीव और हनुमान की मित्रता प्रसिद्ध है वहीँ महाभारत काल में कृष्ण- अर्जुन, कृष्ण- द्रौपदी और दुर्योधन-कर्ण की मित्रता नवीन प्रतिमान गढती है| कृष्ण और सुदामा की मित्रता की तो मिसाल दी जाती है जहाँ अमीर और गरीब के बीच की दीवारों को तोड़कर मित्रता निभाई गई थी |
वैसे तो जीवन में मित्रता बहुतों से होती है लेकिन कुछ के साथ अच्छी बनती है जिन्हें सच्चे मित्र की संज्ञा दी जा सकती है ! तुलसीदासजी ने भी लिखा है “धीरज,धर्म, मित्र अरु नारी ;आपद काल परखिये चारी| अर्थात जो विपत्ति में सहायता करे वही सच्चा मित्र है|

अब मित्रता की बात हो और आभासी मित्रों की बात न हो यह तो बेमानी हो जायेगी! बल्कि यहीं पर ऐसी मित्रता होती है जहाँ हम सिर्फ और सिर्फ भावनाओं से जुड़े होते हैं! यहाँ किसी भी प्रकार का स्वार्थ नहीं जुड़ा होता! बहुत से लोगों का मत है कि आभासी दुनिया की मित्रता सिर्फ लाइक कमेंट पर टिकी होती है यह सत्य भी है,किन्तु यदि हम सकारात्मक दृष्टि से देखेंगे तो यह लाइक और कमेंट ही हमें आपस में जोड़तें हैं ! क्यों कि पोस्ट तथा लाइक्स और कमेंट्स ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को उजागर करता है जिनमें हम वैचारिक समानता तथा शब्दों में अपनत्व को महसूस करते हैं और मित्रता हो जाती है!
यह भी सही है कि आभासी दुनिया की मित्रता में बहुत से लोग ठगी के शिकार हो रहे हैं! इस लिए मित्रों के चयन में सावधानी बरतना आवश्यक है चाहे वह आभासी मित्रता हो या फिर धरातल की!
मित्रता एक खूबसूरत बंधन है जो हमें एकदूसरे से जोड़ कर हमें मजबूती का एहसास कराता है ! इसलिए इस बंधन को टूटने नहीं देना चाहिए !
मैथिली शरण गुप्त जी ने बहुत ही खूबसूरतती से मित्रता को परिभाषित किया है...

     तप्त हृदय को , सरस स्नेह से ,
     जो सहला दे , मित्र वही है।

     रूखे मन को , सराबोर कर, 
     जो नहला दे , मित्र वही है।

     प्रिय वियोग  ,संतप्त चित्त को ,
     जो बहला दे , मित्र वही है।

     अश्रु बूँद की , एक झलक से ,
     जो दहला दे , मित्र वही है।

        *मैथिलीशरण गुप्त*

  

©किरण सिंह