Sunday, 17 September 2017

प्रिय तुम बिन मैं

प्रिय तुम रह न सकोगे मुझ बिन ,
मैं भी तुम बिन रह न सकूंगी |
फिर काहे का झगड़ा रगड़ा ,
अब यह सब मैं सह न सकूंगी |

सपनों की दुनिया में प्रिय
तुमने भी जिया मैनें भी जी
मधुर मधुर बातें अक्सर
तुमने भी की मैने भी की
क्या नाता है तुमसे मेरा 
यह अधरों से कह न सकूंगी

प्रिय तुम रह न सकोगे मुझ बिन ,
मैं भी तुम बिन रह न सकूंगी |

तुमसे मिलकर ही जाना
कितना सुन्दर संसार है
इसीलिए प्रिय मुझे तुम्हारा 
हर तोहफा स्वीकार है
भाव मेरे प्रिय तुम तक सीमित
तुम न कहो तो बह न सकूंगी

प्रिय तुम रह न सकोगे मुझ बिन ,
मैं भी तुम बिन रह न सकूंगी |

एक पल भी देखूँ न तुझे तो
बढ़ जाती बेचैनियाँ
प्यार मुझे करते हो प्रिय तो
मत करना मनमर्जियाँ
यही प्यार है सच्चा समझो
इससे ज्यादा कह न सकूंगी

प्रिय तुम रह न सकोगे मुझ बिन ,
मैं भी तुम बिन रह न सकूंगी |

©किरण सिंह

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