Thursday, 16 November 2017

समय और प्रतीक्षा

समय और प्रतीक्षा
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गज़ब प्रेम है न
समय और
प्रतीक्षा की भी
समय निष्ठुर
मगरूर
या फिर
आदत से मजबूर
चलने को रहता है
विवश
और
भावुक जिद्दी प्रतीक्षा
अपनी ही आदत से मजबूर
दिन रैन
अनवरत
ठहरी हुई सी
पलक बिछाए
रहती है
समय की
प्रतीक्षा  में
फिर
आखिरका
मजबूर होकर
आना ही पड़ता है
समय को
घूमकर

©किरण सिंह

Saturday, 4 November 2017

ददरी मेला

कहीं भी रहूँ , कितना भी घूम लूँ , लाख अच्छी चीजें माॅल में मिलतीं हों लेकिन कार्तिक पूर्णिमा के दिन बलिया का ददरी मेला बहुत याद आता है !
भोर से ही गंगा नहान का भीड़ और धक्का मुक्की देखकर तो लगता था वाकई कार्तिक पूर्णिमा में गंगा स्नान स्वर्ग द्वार तक ले जाता है!
और वो तेलही जलेबी का स्वाद... सोच कर ही मुंह में पानी आ जाता है!
याद आती है जब दादी गंगा नहाकर आती थीं और हम सभी भाई बहन उन्हें घेर लेते थे  और वे हमें मेला घूमने के लिए पैसे देतीं थीं फिर हम और अधिक पैसे के लिए जिद्द करते थे और फिर दादी छुपकर अपना बटुआ खोलती थीं और हमें फिर से पैसे देतीं थीं!
पहले बाजारीकरण इतना विस्तृत नहीं था इसलिए हम अपना मनपसंद खिलौना ददरी मेला में ही खरीद पाते थे!
ददरी सर्कस, जादूघर, नौटंकी देखकर  तो लगता था कि सारा संसार समा गया है ददरी के मेले में और भाई बहनों के साथ तरह-तरह के झूलों और चरखी पर झूलते हुए तो लगता था कि दुनिया की हर खुशी मिल गयी है हमें!

बोलो भृगु बाबा की जय