Saturday, 4 November 2017

ददरी मेला

कहीं भी रहूँ , कितना भी घूम लूँ , लाख अच्छी चीजें माॅल में मिलतीं हों लेकिन कार्तिक पूर्णिमा के दिन बलिया का ददरी मेला बहुत याद आता है !
भोर से ही गंगा नहान का भीड़ और धक्का मुक्की देखकर तो लगता था वाकई कार्तिक पूर्णिमा में गंगा स्नान स्वर्ग द्वार तक ले जाता है!
और वो तेलही जलेबी का स्वाद... सोच कर ही मुंह में पानी आ जाता है!
याद आती है जब दादी गंगा नहाकर आती थीं और हम सभी भाई बहन उन्हें घेर लेते थे  और वे हमें मेला घूमने के लिए पैसे देतीं थीं फिर हम और अधिक पैसे के लिए जिद्द करते थे और फिर दादी छुपकर अपना बटुआ खोलती थीं और हमें फिर से पैसे देतीं थीं!
पहले बाजारीकरण इतना विस्तृत नहीं था इसलिए हम अपना मनपसंद खिलौना ददरी मेला में ही खरीद पाते थे!
ददरी सर्कस, जादूघर, नौटंकी देखकर  तो लगता था कि सारा संसार समा गया है ददरी के मेले में और भाई बहनों के साथ तरह-तरह के झूलों और चरखी पर झूलते हुए तो लगता था कि दुनिया की हर खुशी मिल गयी है हमें!

बोलो भृगु बाबा की जय

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