मित्रता एक ऐसा सम्बन्ध है, जिसे हम स्वयं बनाते हैं। बाकी सारे रिश्ते ताे जन्म के साथ ही बन जाते हैं।
मित्रता वह भावना है जो दो व्यक्तियों के हृदयों को आपस में जोड़ती है! जिसका सानिध्य हमें सुखद लगता है तथा हम मित्र के साथ स्वयं को सहज महसूस करते हैं, इसलिए अपने मित्र से अपना दुख सुख बांटने में ज़रा भी झिझक नहीं होती ! बल्कि अपने मित्र से अपना दुख बांटकर हल्का महसूस करते हैं और सुख बांटकर सुख में और भी अधिक सुख की अनुभूति करते हैं!
वैसे तो कहा जता है कि मित्रता में जाति, धर्म, उम्र तथा स्तर नहीं देखा जाता ! किन्तु मेरा व्यक्तिगत अनुभव कि मित्रता यदि समान उम्र , समान स्तर , तथा समान रूचि के लोगों में अधिक गहरी होती है क्योंकि स्थितियाँ करीब करीब समान होती है ऐसे में एक दूसरे के भावनाओं को समझने में अधिक आसानी होती है इसलिए मित्रता अच्छी तरह से निभती है!
वैदिक काल से ही मित्रता के विशिष्ट मानक दृष्टिगत होते आये है| जहाँ रामायण काल में राम और निषादराज, सुग्रीव और हनुमान की मित्रता प्रसिद्ध है वहीँ महाभारत काल में कृष्ण- अर्जुन, कृष्ण- द्रौपदी और दुर्योधन-कर्ण की मित्रता नवीन प्रतिमान गढती है| कृष्ण और सुदामा की मित्रता की तो मिसाल दी जाती है जहाँ अमीर और गरीब के बीच की दीवारों को तोड़कर मित्रता निभाई गई थी |
वैसे तो जीवन में मित्रता बहुतों से होती है लेकिन कुछ के साथ अच्छी बनती है जिन्हें सच्चे मित्र की संज्ञा दी जा सकती है ! तुलसीदासजी ने भी लिखा है “धीरज,धर्म, मित्र अरु नारी ;आपद काल परखिये चारी| अर्थात जो विपत्ति में सहायता करे वही सच्चा मित्र है|
अब मित्रता की बात हो और आभासी मित्रों की बात न हो यह तो बेमानी हो जायेगी! बल्कि यहीं पर ऐसी मित्रता होती है जहाँ हम सिर्फ और सिर्फ भावनाओं से जुड़े होते हैं! यहाँ किसी भी प्रकार का स्वार्थ नहीं जुड़ा होता! बहुत से लोगों का मत है कि आभासी दुनिया की मित्रता सिर्फ लाइक कमेंट पर टिकी होती है यह सत्य भी है,किन्तु यदि हम सकारात्मक दृष्टि से देखेंगे तो यह लाइक और कमेंट ही हमें आपस में जोड़तें हैं ! क्यों कि पोस्ट तथा लाइक्स और कमेंट्स ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को उजागर करता है जिनमें हम वैचारिक समानता तथा शब्दों में अपनत्व को महसूस करते हैं और मित्रता हो जाती है!
यह भी सही है कि आभासी दुनिया की मित्रता में बहुत से लोग ठगी के शिकार हो रहे हैं! इस लिए मित्रों के चयन में सावधानी बरतना आवश्यक है चाहे वह आभासी मित्रता हो या फिर धरातल की!
मित्रता एक खूबसूरत बंधन है जो हमें एकदूसरे से जोड़ कर हमें मजबूती का एहसास कराता है ! इसलिए इस बंधन को टूटने नहीं देना चाहिए !
मैथिली शरण गुप्त जी ने बहुत ही खूबसूरतती से मित्रता को परिभाषित किया है...
तप्त हृदय को , सरस स्नेह से ,
जो सहला दे , मित्र वही है।
रूखे मन को , सराबोर कर,
जो नहला दे , मित्र वही है।
प्रिय वियोग ,संतप्त चित्त को ,
जो बहला दे , मित्र वही है।
अश्रु बूँद की , एक झलक से ,
जो दहला दे , मित्र वही है।
*मैथिलीशरण गुप्त*
©किरण सिंह
निःसंदेह अत्यंत सुन्दर लाइनें हैं वैसे एक संशय है मन में ! क्या ये वास्तव में मैथालीचरन गुप्त जी की रचना है ? अगर है तो कृपया शीर्षक बताने का श्रम करें ! ये comment सिर्फ Kiran Singh ji को संबोधित नहीं है कृपया जिसे भी जानकारी हो बतायेँ !
ReplyDeletehttps://m.facebook.com/story.php?story_fbid=469356829899303&substory_index=0&id=100004749696118
ReplyDeleteयह मेरी कविता है । कृपया साहित्य प्रेमी संज्ञान लें
संभवतः दिनकर जी की रचना है
ReplyDeleteमधुशाला का नित्य निमंत्रण
ReplyDeleteजो दिलवा दे, *मित्र वही है..*
व्यथित ह्रदय हो पीड़ा में तब
विल्स जला दे, *मित्र वही है..*
सुंदर विपुल चंचला का
नंबर दिलवा दे, *मित्र वही है..*
मधु पात्रों में भर के मदिरा
पैग बना दे, *मित्र वही है..*
*मैथिली शरण गुप्त से लिखना छूट गया था....*
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Wah ji Kya bat hai
Deleteमधुशाला का नित्य निमंत्रण
Deleteजो दिलवा दे, *मित्र वही है..*
व्यथित ह्रदय हो पीड़ा में तब
विल्स जला दे, *मित्र वही है..*
सुंदर विपुल चंचला का
नंबर दिलवा दे, *मित्र वही है..*
मधु पात्रों में भर के मदिरा
पैग बना दे, *मित्र वही है..*
*मैथिली शरण गुप्त से लिखना छूट गया था....*
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