Friday, 13 March 2015

छल कपट भरे

छल कपट भरे
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छल कपट भरे इस जगत में
तुम भी तो प्रिय छली हो गए

सात समंदर पार क्या गए
भूल गए हिन्द और हिन्दी
मैं बावरी बैरागन बन गई
फीकी पड़ी माथे की बिन्दी
सात फेरे संग वचन लिए
उन्हें भूल तुम कहाँ खो गए
छल कपट भरे ............

नहीं गाते अब भोर भैरवी
कैसे करूँ मैं ,  तेरी पैरवी
नहीं गाते अब सांझ आरती
संस्कृति छोड़ दिए भारती
चकाचौंध में फंस गए तुम भी
संस्कार तुम कहां छोड़ गए
छल कपट भरे ...

नहीं सुहाता है अब कत्थक
जाते हो तुम डिस्को
डियर डार्लिंग पसंद आ गई
प्रिया प्रिय भाता है किसको
सरसो साग मक्के की रोटी का
स्वाद पिज्जा बर्गर में खो गए
छल कपट भरे ...

जाना था परदेश पिया तो
मुझे भी संग लिए क्यों नहीं
लौट नहीं जब आना था तो
मुझसे कह तुम दिए क्यों नहीं
प्रतीक्षा में पलक बिछाए
स्वप्न देखकर नयन सो गए
छल कपट भरे .............
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©Copyright Kiran singh

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