भोर लालिमा लिए किरण
मन में आस जगावत
निशा विदा होकर गई
दिवस अति मन भावत
चूचू कर चिड़िया आंगन में
मधुरम् मंगल गावत
उठो उठो अब भोर भयो कह
कर्म को पाठ पढ़ावत
हुआ स्फुर्त तभी तन मेरा
मन चंचल हो आवत
कर अग्रे वसते लक्ष्मी
मन आत्मसात करवावत
करमूले गोविंद देख कर
झुकी झुकी शीश नवावत
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©किरण सिंह
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