Wednesday, 22 April 2015

काश

काश
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चलती थी पहले भी
मेरी कलम
कर रही हूं
स्मरण
जिन्हें मैंने
डायरी के पन्नों पर
लिखे थे
कुछ स्मृतियाँ
घुटन महसूस कर रही हैं
आज भी
बंद आलमारी में
कुछ को
बेच दिए गए
कचरे के साथ
जिनमें अंकित थे
मेरे अनेकों
भाव
कुछ कस्ती बनकर
बह गए
सपनों के संग
और कुछ फाड़कर
उड़ा दिए गए
खिल्ली
भावनाओं की
बिवस
हम चुप सह जाते
काश
फेसबुक
तुम पहले आते
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©copyright Kiran singh

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