लिव इन रिलेशनशिप
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लिव इन रिलेशनशिप भी
एक कविता ही तो है
छन्द मुक्त
न रीति रिवाजों की चिन्ता
न मंगलसूत्र का बन्धन
न चूड़ियों की हथकड़ी
न पहनी पायल बेड़ी
न माँग में सिंदूर
न सौभाग्य की निशानी
किन्तु वह खुश हैं स्वयं में
बिन ब्याही ही
क्यों कि
वह हैं उन्मुक्त
जैसे कविता
छन्द मुक्त
न अर्ध विराम न पूर्ण विराम
न मात्राओं की गिनती
न यति न ही गति ही
न रदीफ़ न काफिया
लिखी जातीं हैं बेबहर
फिर भी कभी कभी
ढा ही देतीं हैं कहर
क्यों कि इनमें भावों का
होता है पूर्ण समावेश
कुछ तो है इनमें विशेष
रस युक्त
कविता
छन्द मुक्त
भले न गाई जायें
मन्दिरों में
भजन और कीर्तनों में
भले न गाई जायें
मांगलिक रस्म रिवाजों में
फिक्र नहीं इन्हें
क्यों कि बटोर ही लेती हैं वाहवाही
कर देतीं हैं मन मुग्ध
क्यों कि
विषय होते हैं पुष्ट
लीव इन रिलेशनशिप
भले ही न हो सकें सम्मानित
विवाहिताओं की तरह
पीघर में नहीं मिले प्रवेश
भले न दें कोई संदेश
किन्तु
ये
हैं स्वयं में तुष्ट
जैसे कविता
छन्द मुक्त
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©किरण सिंह
अक्षर अक्षर जोड़ कर , सुनो प्रिये मन मीत |
तुमको ही तो लिख दिया , छन्द बद्ध कर गीत ||
©किरण सिंह
नयनो में सपने नये , उर में भर ली प्रीत |
प्रिय तुमसे ऐसे मिली , जैसे सुर संगीत ||
©किरण सिंह
चुटकी भर सिंदूर से, गयी स्वयं को हार |
इतराई सौभाग्य पर, कर सोलह श्रृंगार ||
चूड़ी कंगन हथकड़ी , पायल बेड़ी पाँव |
बंधन मंगल सूत्र का , नाक नथनिया ठाँव ||
©किरण सिंह
प्रिय मैं तो पाती लिखी , शब्दों में भर प्रीत |
बहकी मेरी लेखनी, लिखा गया नव गीत ||
©किरण सिंह
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