जीत की हार
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प्रेम बारीक धागा है
एहसासों का
जो
उलझ कर हृदय में
फँस जाता है
कभी-कभी
तब
करता है मस्तिष्क
बार बार
सुलझाने की कोशिश
प्रेम के धागों को
और खुद भी उलझ जाता है
सुलझाने के क्रम में
मस्तिष्क
कोशिश भी करता है
तोड़ने की
और
पा लेता है कामयाबी भी
हो जाता है विजयी
किन्तु
अपराध बोध से ग्रसित होने लगता है
व्याघात करती हैं
बार बार
कुंडली मारे सर्प की तरह
स्मृतियाँ
प्रेम की
फिर मस्तिष्क
हो जाता है परेशान
महसूस करता है
खुद को
हारा हुआ
जीतकर भी
छोटे से कोमल
दिल से
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©किरण सिंह
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