मैं बावरी जोगन बन गई
पिया तुम्हारी प्रीत में
सुध-बुध अपना खो गई मैं
मन से तेरी हो गई मैं
हार कर भी दिल अपना मैं
खुश हूँ तेरी जीत में
मैं बावरी जोगन.................
पल भर भी तुझे भूल न पाऊँ
बोलो प्रीतम क्या मैं गाऊँ
जब भी लिखती छन्द में ढलकर
आ जाते हो गीत में
मैं बावरी जोगन...................
कहीं भी तुझ बिन जी नहीं लागे
कैसे हैं ये प्रेम के धागे
बांध लिये हमें जाने कैसे
छल गई मैं इस रीत में
मैं बावरी जोगन......................
हर तरफ़ दिखता तू ही है
कहीं ईश तू ही तो नहीं है
हर धड़कन में तू ही झंकृत
मेरे हर संगीत में
मैं वैरागन जोगन....................
©किरण सिंह
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