मछलियों की तरह पकड़िये प्रेम को
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मछलियों की तरह पकड़िये प्रेम को
आहिस्ता-आहिस्ता
कि कहीं जोर से पकड़ने पर
छिटक न जाये
जरूरी है प्रेम की जिंदगी के लिए
विश्वास की सांसें
मीठी मीठी बातें
स्नेहिल स्पर्श
त्याग सहर्ष
प्रीत की रीत है कुछ
जीवन संगीत है कुछ
अक्षरों के मेल
अभिव्यक्ति भावनाओं की
कभी-कभी
कर जाती है , कह जाती हैं , समझाती हैं ,
आँखों में लिखीं हैं जो
गीत गज़ल गीतिका
हृदय सिंचित प्रीतिका
आहिस्ता-आहिस्ता
शीतल हवा की तरह है प्रेम शायद
तभी तो
स्पर्श की अनुभूति मात्र ही
जीवंत कर देती है
मृत पड़ी लताभिलाषाओं को
जिद्दी है प्रेम
शातिर भी है
बेवकूफ़ बनाता है दिलों को
राज करने के लिए दिलों पर
अपना कब्जा जमा लेता है प्रेम
प्रेम से
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©किरण सिंह
Monday, 26 September 2016
मछलियों की तरह पकड़िये प्रेम को
Wednesday, 21 September 2016
विषय है स्त्री विमर्श
विषय है स्त्री विमर्श
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विषय है स्त्री विमर्श
ढूढ रही हूँ शब्द इमानदारी से
कि लिखूं स्त्रियों की असहनीय पीड़ा
दमन , कुण्ठा
कि जी भर कोसूं पुरुषों को
कि जिन पुरूषों को जानती हूँ उन्हें ही
कुछ कहूँ भला बुरा
पर
सर्व प्रथम पुरूष तो पिता निकला
उन्हें क्या कहूँ
वह तो मेरे आदर्श हैं
फिर सोचा
चलो आगे दूसरे को देखती हूँ
अरे वह तो भाई निकला
जिसकी कलाई पर राखी बांधती आई हूँ
प्रति वर्ष
अब आती हूँ पति पर इन्हें तो छोड़ूगी नहीं
लड़ने की सोचती हूँ
कि कितना झेलना पड़ता है मुझे घर में
लेकिन लड़ूँ तो कैसे
बेचारे के पास समय और हिम्मत ही कहाँ बची है लड़ने के लिए
सारी उर्जा तो दफ्तर में ही खत्म हो जाती है
फिर थके हारे हुए इंसान से
लड़ूँ तो कैसे लड़ूँ...?
लिखना तो है ही
आखिर स्त्री विमर्श है
चलो बेटों को ही कोसती हूँ
पर क्या करूँ
मेरी तो आँखों पर तो पट्टी चढ़ गई है
पुत्र में तो कोई दोष दिखाई ही नहीं देता
फिर किस पुरूष को कोसूं ?
अरे, अरे क्यों चिंतित हो किरण
बहुत आसान है अजनवी पुरुषों को
कोसना
आखिर बात स्त्री विमर्श की है
कोसो जी भर कर
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©किरण सिंह
अक्षर
अक्षर
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ये अक्षर भी न
आपस में मिलकर
कर जाते हैं कुछ नव सृजन
गीत कविता के रूप में ढलकर
कुछ हमारे
प्रणय की ही तरह
और कभी-कभी
उनका भी
हो जाता है
विच्छेद
फिर वे भी
तलाकशुदा
दम्पत्तियों
की तरह
कुछ बिखर जाते हैं
कुछ सम्हल जाते हैं
कुछ सिमट जाते हैं
जीवन चक्र में
उदास बच्चों की तरह
कभी
अक्षर
कभी शब्द
और कभी वाक्य
और कभी
वे भी अपना
तलाश लेते हैं अस्तित्व
कहीं न कहीं
कुछ
नवीन
शब्दावली में
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©कॉपीराइट किरण सिंह
Monday, 12 September 2016
शायद पानी की तरह होती हैं स्त्रियाँ
विषय है स्त्री विमर्श
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विषय है स्त्री विमर्श
ढूढ रही हूँ शब्द इमानदारी से
कि लिखूं स्त्रियों की असहनीय पीड़ा
दमन , कुण्ठा
कि जी भर कोसूं पुरुषों को
कि जिन पुरूषों को जानती हूँ उन्हें ही
कुछ कहूँ भला बुरा
कि सर्व प्रथम पुरूष तो पिता निकला
उन्हें क्या कहूँ
वह तो मेरे आदर्श हैं
चलो आगे दूसरे को देखती हूँ
अरे वह तो भाई निकला
जिसकी कलाई पर राखी बांधती आई हूँ
प्रति वर्ष
अब आती हूँ पति पर इन्हें तो छोड़ूगी नहीं
सोचती हूँ कि महीने भर की पगार लाकर
मालकिन बना दिया
फिर सब खर्च का हिसाब रखना भी तो
मुश्किल है यही लिख दूँ क्या..?
या फिर किटी पार्टियों में गहने कपड़े का हिसाब ही लिख दूँ
कि कितना मुश्किल होता है नौकरों से काम लेना
कि वे तो आफिस में मस्ती करते हैं
और मैं इधर उधर समय काटती हूँ
हैन
लिखना तो है ही
आखिर स्त्री विमर्श है
चलो बेटों को ही कोसती हूँ
पर ये क्या
मेरी तो आँखों पर पट्टी चढ़ गई
पुत्र में तो कोई दोष दिखाई ही नहीं देता
फिर किस पुरूष को कोसूं ?
उन्हें जिन्हें मैं ठीक तरह से जानती भी नहीं हूँ ?
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©किरण सिंह