Monday, 12 September 2016

शायद पानी की तरह होती हैं स्त्रियाँ

विषय है स्त्री विमर्श
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विषय है स्त्री विमर्श
ढूढ रही हूँ शब्द इमानदारी से
कि लिखूं स्त्रियों की असहनीय पीड़ा
दमन , कुण्ठा 
कि जी भर कोसूं पुरुषों को
कि जिन पुरूषों को जानती हूँ उन्हें ही
कुछ कहूँ भला बुरा
कि सर्व प्रथम पुरूष तो पिता निकला
उन्हें क्या कहूँ
वह तो मेरे आदर्श हैं
चलो आगे दूसरे को देखती हूँ
अरे वह तो भाई निकला
जिसकी कलाई पर राखी बांधती आई हूँ
प्रति वर्ष
अब आती हूँ पति पर इन्हें तो छोड़ूगी नहीं
सोचती हूँ कि महीने भर की पगार लाकर
मालकिन बना दिया
फिर सब खर्च का हिसाब रखना भी तो
मुश्किल है यही लिख दूँ क्या..?
या फिर किटी पार्टियों में गहने कपड़े का हिसाब ही लिख दूँ
कि कितना मुश्किल होता है नौकरों से काम लेना
कि वे तो आफिस में मस्ती करते हैं
और मैं इधर उधर समय काटती हूँ
हैन
लिखना तो है ही
आखिर स्त्री विमर्श है
चलो बेटों को ही कोसती हूँ
पर ये क्या
मेरी तो आँखों पर पट्टी चढ़ गई
पुत्र में तो कोई दोष दिखाई ही नहीं देता
फिर किस पुरूष को कोसूं ?
उन्हें जिन्हें मैं ठीक तरह से जानती भी नहीं हूँ ?
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©किरण सिंह

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