मछलियों की तरह पकड़िये प्रेम को
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मछलियों की तरह पकड़िये प्रेम को
आहिस्ता-आहिस्ता
कि कहीं जोर से पकड़ने पर
छिटक न जाये
जरूरी है प्रेम की जिंदगी के लिए
विश्वास की सांसें
मीठी मीठी बातें
स्नेहिल स्पर्श
त्याग सहर्ष
प्रीत की रीत है कुछ
जीवन संगीत है कुछ
अक्षरों के मेल
अभिव्यक्ति भावनाओं की
कभी-कभी
कर जाती है , कह जाती हैं , समझाती हैं ,
आँखों में लिखीं हैं जो
गीत गज़ल गीतिका
हृदय सिंचित प्रीतिका
आहिस्ता-आहिस्ता
शीतल हवा की तरह है प्रेम शायद
तभी तो
स्पर्श की अनुभूति मात्र ही
जीवंत कर देती है
मृत पड़ी लताभिलाषाओं को
जिद्दी है प्रेम
शातिर भी है
बेवकूफ़ बनाता है दिलों को
राज करने के लिए दिलों पर
अपना कब्जा जमा लेता है प्रेम
प्रेम से
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©किरण सिंह
Monday, 26 September 2016
मछलियों की तरह पकड़िये प्रेम को
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