अक्षर
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ये अक्षर भी न
आपस में मिलकर
कर जाते हैं कुछ नव सृजन
गीत कविता के रूप में ढलकर
कुछ हमारे
प्रणय की ही तरह
और कभी-कभी
उनका भी
हो जाता है
विच्छेद
फिर वे भी
तलाकशुदा
दम्पत्तियों
की तरह
कुछ बिखर जाते हैं
कुछ सम्हल जाते हैं
कुछ सिमट जाते हैं
जीवन चक्र में
उदास बच्चों की तरह
कभी
अक्षर
कभी शब्द
और कभी वाक्य
और कभी
वे भी अपना
तलाश लेते हैं अस्तित्व
कहीं न कहीं
कुछ
नवीन
शब्दावली में
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©कॉपीराइट किरण सिंह
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