Thursday, 31 August 2017

अतिथि देव

आजकल अधिकांश लोगों के द्वारा यह कहते सुना जाता है कि आजकल लोग एकाकी होते जा रहे हैं , सामाजिकता की कमी होती जा रही है, एक पहले का जमाना था जब अतिथि को देव समझा जाता था लेकिन आजकल तो बोझ लगने लगे हैं अतिथि आदि आदि..!
कुछ हद तक इन बातों में सच्चाई भी है किन्तु जब हम इस तरह के बदलाव के मूल में झांक कर देखते हैं तो पाते हैं कि इसमें दोष किसी व्यक्ति विशेष का न होकर आज की जीवन शैली, शिक्षा  - दीक्षा , एकल तथा छोटे परिवारों का होना, घरों के नक्शे तथा पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण तो है ही ऊपर से बचा खुचा समय सोशल मीडिया में खर्च हो जाते हैं लोगों के !
एकल परिवारों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा मनोनुकूल जीवनशैली तो रहती है जहाँ किसी अन्य का रोक - टोक नहीं होता इसीलिये इसका चलन बढ़ भी रहा है ! किन्तु एकल परिवारों तथा आज की जीवनशैली में मेहमानवाजी के लिए समय निकालना जरा कठिन है!
संयुक्त परिवार में हर घर में बूढ़े बुजुर्ग रहते थे जिनके पास काम नहीं होता था या कर नहीं सकते थे तो जो भी आगन्तुक आते थे बूढ़े बुजुर्ग बहुत खुश हो जाया करते थे क्योंकि कुछ समय या दिन उनके साथ बातें करने में अच्छा गुजर जाता था तथा मेहमान भी मेहमानवाजी और अपनापन से प्रसन्न हो जाते थे!
इसके अलावा बच्चे भी मेहमानों को देखकर उछल पड़ते थे क्योंकि एक तो मेहमान कुछ न कुछ मिठाइयाँ आदि लेकर आते थे इसके अलावा घर में भी तरह-तरह का व्यंजन बनता था जिसका बच्चे लुत्फ उठाते थे!
तब घर की बहुओं को चूल्हा चौका से ही मतलब रहता था बहुत हुआ तो थोड़ा बहुत आकर मेहमानों को प्रणाम पाती करके हालचाल ले लिया करतीं थीं और बड़ों के आदेश पर खाने पीने आदि की व्यवस्था करतीं थीं! मतलब संयुक्त परिवार में हर आयु वर्ग के सदस्यों में काम बटे हुए होते थे जिससे मेहमान कभी बोझ नहीं लगते थे बल्कि उनके आने से घर में और खुशियों का माहौल रहता था !
किन्तु एकल परिवारों में बात से लेकर खाने - पीने रहने - सोने तक सब कुछ का इन्तजाम घर की अकेली स्त्री को ही करना पड़ता है क्योंकि पुरुष को तो आॅफिस टूर आदि से फुर्सत ही नहीं मिलती और घर में जब स्मार्ट और सूघड़ बीवी हो तो पति तोऊनिश्चिंत हो ही जाते हैं !  बच्चों पर भी पढ़ाई का बोझ इतना रहता है कि उनके पास मेहमानवाजी करने का फुर्सत नहीं रहता! यदि वे मेहमानों के साथ बैठना चाहें भी तो मम्मी पापा का आदेश होता है कि जाओ तुम फालतू बातों में मत पड़ो अपनी पढ़ाई करो!  ऐसे में मेहमानों के आगमन पर काम के साथ-साथ बात चीत आदि का कार्य भी स्त्रियों पर ही आ जाता है जिसके कारण उनके पास अपने लिये ज़रा भी समय नहीं बच पाता है ऐसे में  खीजना स्वाभाविक भी है!
मिसेज ओझा बहुत कुशल गृहिणी हैं उनके यहाँ जो भी आता है खूब खुश होकर जाता है लेकिन वो मेहमानों के जाने पर चैन की सांस लेती हैं और फिर मेहमानों के आगमन को सुनकर पहले ही घबरा जाती हैं भले ही अपने व्यवहार और बातों से जाहिर नहीं होने देती हैं!
इसमें यदि इमानदारी से देखा जाये तो उनका कोई दोष भी नहीं है क्योंकि दो रूम के फ्लैट में अपने चार - चार बच्चे पढ़ने वाले उसमें हमेशा चार छः मेहमानों का आना - जाना... बेचारी का दिन रात किचेन में ही गुजरता था वो तो फिर भी बर्दाश्त कर लेती थीं लेकिन दिन रात मेहमानों के शोर से बच्चों का पढ़ाई प्रभावित होता तो वे परेशान हो जातीं थीं लेकिन कुछ कर नहीं पाती थीं!
जहाँ घरेलू स्त्री है वहाँ तो फिर भी ठीक है किन्तु जहाँ पर पति पत्नी दोनों ही कार्यरत हैं वहाँ की समस्या तो और भी जटिल है! उन  दम्पत्तियों के पास तो मेहमानों के लिए बिल्कुल भी समय नहीं होता क्योंकि उनका रुटीन भी कुछ अलग होता है ! कभी नाइट शिफ्ट तो कभी डे शिफ्ट... ऐसे में उनके पास सिर्फ वीकएंड का बचता है जिसमें उन्हें आराम भी करना होता है और घूमना - फिरना भी होता है था कि निर्धारित ही रहता है ऐसे में उनके पास अचानक कोई मेहमान टपक पड़े तो फिर दिक्कत तो होगी ही!
तान्या और मनोज दोनों मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत थे! हफ्ते भर काम करने के पश्चात वीकेंड का इंतजार करते थे ताकि नींद पूरी हो सके! वीकेंड पर उनका दोस्तों के साथ आउटिंग का प्रोग्राम था जाने की पूरी तैयारी हो गयी थी तभी कोई दूर के रिश्तेदार के आगमन की सूचना मिली तो प्रोग्राम रद्द करना पड़ा.... इसमें तान्या मनोज का प्रोग्राम तो रद्द हुआ ही साथ हो उनके दोस्तों का भी रद्द हो गया जिससे तान्या और मनोज का मन  खिन्न थे!
बात मित्रों की हो या रिश्तेदारों की जाना वहीं चाहिए जहाँ पर आत्मीयता हो और आपके जाने से आपके मित्र या रिश्तेदार को खुशी मिले!
इस विषय में महाकवि तुलसी दास जी ने भी अपने दोहे के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है...

देखत मन पुलकित नहीं, नयनन नहीं सनेह |
तुलसी  वहाँ  न  जाइये ,  कंचन  बरसे  मेह ||

यदि मित्रों या रिश्तेदारों के पास जाना हो तो जाने से पहले सूचित अवश्य कर दें ताकि आपका मित्र या रिश्तेदार आपके लिए समय निकाल सके!
जाने के बाद मेजबान के कार्य में यथासम्भव मदद अवश्य करें!
अपना सामान यथास्थान ही रखें ! बच्चे साथ हों तो उनपर ध्यान दें! घर का सामान यदि बिखर गया हो तो धीरे से ठीक कर दें!
मिसेज मल्लिक अपना घर महंगे - महंगे शो पिसेज से खूब सजाधजाकर रखतीं हैं लेकिन उनके एक रिश्तेदार हैं जिनके  बच्चे आकर घर में भूकंप मचा देते हैं लेकिन वो रिश्तेदार दम्पति न तो अपने को देखते हैं न टोकते हैं बल्कि और हँसते हैं! उनके जाने के बाद कितने ही शो पिस टूट गये होते हैं... मिसेज मल्लिक कुढ़ कर रह जाती हैं और उनके जाने के बाद राहत की साँस लेती हैं!
सबसे जरूरी कि जो भी व्यंजन खाने पीने के लिए परोसे जायें उसका तारीफ अवश्य कर दें तो बनाने वालों को खुशी मिलती है साथ ही यथासंभव मेजबान का हाथ बटायें ताकि मेजबान आपका पुनः प्रतीक्षा करे!
मिस्टर सिंह सपरिवार अपने दोस्त के यहाँ हफ्ते भर के लिए आये उनके दोस्त और दोस्त की पत्नी बहुत खुश हुईं! उनके लिए तरह-तरह के डिसेज बनाती और खिलाती मिस्टर सिंह और उनकी पत्नी खूब तारीफ़ करते और डिमांड कर कर के डिसेज बनवाते! मिसेज सिंह काम के वक्त मैग्जीन आदि में उलझी रहतीं थी और जब काम खत्म हो जाता तो बातें करने लगतीं थी ऐसे में उनके दोस्त की पत्नी को आराम ही नहीं मिलता था और चार पाँच दिन में बीमार पड़ गईं! कितना अच्छा होता कि मिसेज सिंह मेजबान के काम में थोड़ा हाथ बटातीं तो ये खुशियाँ दूनी हो जाती!

माना कि समय कीमती है लेकिन अपने समय में से थोड़ा समय चुराकर यदि मेहमानों के लिए निकाली जाये तो रिश्तों की गर्माहट बनी रहेगी, जिंदगी में कभी अकेलापन महसूस नहीं होगा तथा खुशियों में गुणोत्तर बढ़ोत्तरी होगी!

©किरण सिंह

Thursday, 24 August 2017

यकीन

यकीन
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अभी मीना को दुनिया छोड़े कुछ दो ही महीने हुए होंगे कि उसके  पति महेश जी का अपने बेटे के रिंग सेरेमनी में शामिल होने के लिए हमें निमंत्रण आया! जिस समारोह का मुझे बेसब्री से इंतजार था पर उस दिन मेरा मन बहुत खिन्न सा हो गया था तथा मन ही मन में महेश जी के प्रति कुछ नाराजगी भी हुई थी मुझे ! मैं सोचने लगी थी कि वही महेश हैं न जो अपनी माँ के मृत्यु के छः महीने बाद भी घर में होली का त्योहार नहीं मनाने दिये! घर के बच्चों ने भी तब चाहकर भी होली नहीं खेली थी और ना ही नये वस्त्र पहने थे ! याद आने लगा कि जब होली के दिन किसी ने सिर्फ टीका लगाना चाहा था तो ऐसे दूर हट गये थे जैसे कि किसी ने उन्हें बिजली की करेंट लगा दी हो, पर मीना के दुनिया से जाने के दो महीने बाद ही यह आयोजन........ मन तो हो रहा था कि उन्हें खूब जली कटी सुनाऊँ पर...! जाना तो था ही आखिर मीना मेरी पक्की सहेली जो थी .. इसके अलावा महेश जी और  मीना ने जो मेरे लिए किया उसे कैसे कभी भूल सकती थी कि जब मेरी ओपेन हार्ट सर्जरी दिल्ली में हुई थी तब ये लोग ही उस घड़ी में हर समय हमारे साथ खड़े रहे!
यह बात तो कभी भूलता ही नहीं जब मैं हास्पिटल में ऐडमिट थी और महेश जी हर सुबह और शाम एक ही बात कहते थे -  कि आप बहादुर महिला हैं ऐसे ही बहादुरी से रहियेगा और मोवाइल कट जाती थी! मुझे महेश जी के इन बातों से ढाढस तो बहुत मिलता था लेकिन मन ही मन अपने आप पर हँसी भी आती थी कि मैं वाकई अभिनय कला में निपुण हूँ कि किसी को मेरी घबराहट का एहसास तक नहीं होता था और फिर कुछ ही क्षणों बाद आँखों में आँसू छलछला जाता था जिसे मैं बड़ी मुश्किल से छुपा पाती थी!
अभिनय कला में तो पारंगत थी ही इस लिए चली गई सगाई में अपने होठों पर झूठी मुस्कुराहट के साथ ! सगाई समारोह बहुत ही भव्य तरीके से हुआ ! लेकिन समारोह में महेश जी को खुश देखकर मेरा मन अन्दर ही अन्दर दुखी हो रहा था! मन ही मन मैं सोचने लगी कि कितना अन्तर होता है न पुरुषों और स्त्रियों में!
ऐसी स्थिति में क्या मीना होती तो ऐसा कर पाती क्या... स्त्रियों के साथ तो ऐसी परिस्थितियों में  नियति के क्रूर चक्र के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों का भी दंश झेलना पड़ता है और अंतर्मन की पीड़ा तो मरण शैया तक या फिर मरणोपरांत भी नहीं छोड़ती है! छिः सभी पुरुष ऐसे ही होते हैं.. कुछ समय के लिए तो पूरी पुरुष जाति से नफरत सी होने लगी थी मुझे किन्तु मैं अपनी भावनाओं को छुपाने का भरसक प्रयास करती रही थी! मैं रिंग सेरेमनी समारोह में उपस्थित थी किन्तु मेरा मन तो मीना  के ख्यालों में ही खोया हुआ था... काश वो होती!
लेकिन मैं मन को सम्हालने में कामयाब हो गई थी कि चलो बहू तो काफी अच्छी है जिसे मीना ने खुद पसंद किया था!
समारोह सम्पन्न हुआ और हम सभी रिश्तेदार अपने - अपने घर वापस लौट आये!
फिर एक महीने के बाद मीना की बेटी का विवाह का निमन्त्रण भी आया ! तब भी मन दुखी हुआ था कि इतनी जल्दी क्या थी कम से कम साल तो लग जाने देते.....!
विवाह में भी हम पहुंचे ! विवाह की व्यवस्था देखकर तो मैं दंग रह गई सोंचने लगी कि ऐसी व्यवस्था तो शायद मीना होती तो भी नहीं हो पाती! महेश जी तथा उनके परिवार वाले स्वागत सत्कार में कहीं से भी किसी चीज की कमी नहीं होने दिये थे फिर भी खून के रिश्तों की भरपाई कहाँ किसी से हो पाती है इसीलिए मीना के सभी खून के रिश्तेदार रोने के लिए एकांत ढूढ लेते थे! और फिर हल्के होकर होठों पर कृत्रिम मुस्कान बिखेरते हुए मांगलिक कार्यक्रमों में शरीक हो जाते थे !

दिल्ली में रहते - रहते महेश जी भी पक्का दिल्ली वाले हो गये हैं इसीलिए तो अपने रस्मों को निभाने के साथ साथ कुछ दिल्ली के पंजाबियों के रस्म रिवाजों को भी अपना लिये
थे! विवाह के एक दिन पहले मेंहदी के रस्म के बाद शाम सात बजे से काकटेल पार्टी की व्यवस्था की गयी थी जो हम सभी के लिए कुछ नई थी! हर टेबल पर एक - एक बैरा तैनात थे, स्टार्टर के साथ - साथ कोल्डड्रिंक्स और दारू भी चल रहा था जहाँ मैं कुछ असहज सी महसूस कर रही थी! उसके बाद कुछ हम जैसों को छोड़कर सभी डांस फ्लोर पर खूब नाच रहे थे साथ में महेश जी भी कई पैग चढ़ाकर सभी के साथ नाच रहे थे और एक एक करके सभी को डांस फ्लोर पर ले गये और खूब नाचे..! पर मैं हर जगह अपनी बीमारी की वजह से बच जाती हूँ सो यहाँ भी मुझसे किसी ने भी जोर जबरजस्ती नहीं की.. लेकिन जब मीना का बेटा आया और बोला प्लीज मौसी जी आप भी फ्लोर तक चलिये.. उसके आग्रह को मैं नकार नहीं सकी और थोड़ा बहुत मैं भी ठुमका लगा ही ली !
सबसे ज्यादा खला फोटो खिंचवाते समय जब सभी पति पत्नी साथ होते थे और महेश जी अकेले ही हम सभी के साथ फोटो खिंचवा रहे थे !
अगले दिन विवाह का रस्म था जिसे महेश जी के भैया भाभी निभा रहे थे !
विवाह के दिन महेश जी को मैंने ज़रा उदास देखा तो दुख तो हुआ लेकिन उनकी उदासियों में मुझे हल्का सा सुकून भी मिल रहा था कि चलो मीना को याद तो कर रहे हैं न वे! विवाह बहुत ही अच्छे ढंग से सम्पन्न हो गया ! एक एक करके सभी रिश्तेदार जाने लगे जिनकी विदाई भी जीजा जी ने बहुत अच्छे सै किया!
मीना दी की माँ की जब जाने की बारी आई तो महेश जी उनका हाथ पकड़कर फफक फफक कर रो पड़े और सभी को रुला दिये! शायद सभी  मुस्कुराने का अभिनय करते  - करते थक चुके थे या फिर सभी के पलकों के तटबंध टूट चुके थे इसीलिए तो आँसुओं की बाढ़ सी आ गई थी तब ! महेश जी के आँसुओं ने हम सभी के दिलों के मैल को धो डाला था, एक-एक बात स्पष्ट होने लगी थी कि महेश जी तो मीना  के सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रहे थे! कि शायद मीना के द्वारा निर्धारित तिथि पर ही सभी मांगलिक कार्य सम्पन्न किये!
फिर याद आने लगीं मीना  की एक एक बातें
कि कितना शौक था अपनी बेटे के विवाह का!
ये खरीदूंगी, वो खरीदूंगी, ये पहनूंगी, ऐसे नाचूंगी, ऐसी व्यवस्था करूंगी आदि आदि ...............
और जैसे ही बात करने के बीच में  महेश जी आये तो अचानक चुप हो गयीं थी वे ... फिर महेश जी ने चुटकी लेते हुए कहा था.मेरी शिकायत हो रही थी क्या कि आते ही बन्द हो गयीं बातें .... तो फिर मीना ने बड़े प्यार से कहा था कि आपकी शिकायत कैसे कर सकती हूँ मैं भला... आप तो मेरे यकीन हैं! और शायद मीना अपने यकीन पर यकीन करके ही चली गयीं  |
और महेश जी भी उसके यकीन पर खरे उतरने में पूरी तरह से कामयाब हो गये !

©किरण सिंह

Friday, 11 August 2017

हमारे बुजुर्ग हमारे धरोहर हैं

हमारे बुजुर्ग हमारे  धरोहर हैं..! जिन्होंने अपने सुन्दर घर बगिया को अपने खून पसीने से सींच सींच कर उसे सजाया हो इस आशा से कि कुछ दिनों की मुश्किलों के उपरान्त उस बाग में वह सुकून से रह सकेंगे ! परन्तु जब उन्हें ही अपनी सुन्दर सी बगिया के छांव से वंचित कर दिया जाता है तब वह  बर्दाश्त नहीं कर पाते .और खीझ से इतने चिड़चिड़े हो जाते हैं कि अपनी झल्लाहट घर के लोगों पर बेवजह ही निकालने लगते हैं जिसके परिणाम स्वरूप घर के लोग उनसे कतराने लगते हैं ...! तब बुजुर्ग अपने आप को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं ! "उनके अन्दर नकारात्मक विचार पनपने लगता है फिर शुरू हो जाती है बुजुर्गों की समस्या  !
परन्तु कुछ बुजुर्ग बहुत ही समझदार होते हैं, वो नई पीढ़ी के जीवन शैली के साथ  समझौता कर लेते हैं, उनके क्रिया कलापो में टांग नहीं अड़ाते  हैं बल्कि घर के छोटे मोटे कार्यो में उनकी मदद कर उनके साथ दोस्तों की भांति विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, और घर के सभी सदस्यों के हृदय में अपना सर्वोच्च स्थान बना लेते हैं ! उनका जीवन खुशहाल रहता है ! 
बुजुर्गों के समस्याओं का मुख्य कारण- एकल तथा छोटे परिवारों का होना है जहाँ  बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है और नौजवानों की संख्या घट रही है  ! उनके बेटे बेटियाँ बाहर कार्यरत रहते हैं,  जिनकी दिनचर्या काफी व्यस्त रहती है  ! उनके यहाँ जाने पर बुजुर्ग कुछ अलग थलग  से पड़ जाते हैं,  क्यों कि बेटा - बहू तथा बेटी दामाद सभी कार्यरत रहते हैं, वहां की दिनचर्या उनके अनुकूल नहीं होती ,  जिनमें  सामंजस्य स्थापित करना उनके लिए कठिन हो जाता है ! इसलिए वो अपने घर और अपने समाज में रहना अधिक पसंद करते हैं !  ऐसी स्थिति में हम किसे दोषी ठहराएं ? कहना मुश्किल है क्योंकि यहां पर परिस्थितियों को ही दोषी ठहराकर हम तसल्ली कर सकते हैं क्यों कि  जो बोया वही काटेंगे!
भौतिक सुखों की चाह में सभी अपने बच्चों को ऐसे रेस का घोड़ा बना रहे हैं जिनका लक्ष्य होता है किसी कीमत पर सिर्फ और सिर्फ अमीर बनना इसलिए उनकी कोमल भावनायें दिल के किसी कोने में दम तोड़ रही होती हैं बल्कि भावुक लोगों को को वे इमोशनल फूल की संज्ञा तक दे डालते हैं!

इन समस्याओं के समाधान के लिए कुछ उपाय किये जा सकते है !
घर लेते समय यह ध्यानमें जरूर रखना चाहिए कि हमारे पड़ोसी भी समान उम्र के हों ताकि हमारे बुजुर्गों को उनके माता पिता से भी मिलना जुलना होता रहे और हमारे बुजुर्ग भी आपस में मैत्रीपूर्ण संबंध रखते हुए दुख सुख का आदान प्रदान कर सके..! मंदिरों में भजन कीर्तन होता रहता है उन्हें अवश्य मंदिर में भेजने का प्रबंध करें ..! प्रार्थना और भजन कीर्तन से मन में नई उर्जा का प्रवेश होता है जिससे हमारे बुजुर्ग प्रसन्न रहेंगे, और साथ में हमें भी प्रसन्नता मिलेगी ..!
इसके अलावा बिल्डर्स को भी अपार्टमेंट निर्माण के दौरान युवा और बच्चों के सुविधाओं का ध्यान रखने के साथ  साथ बुजुर्गों के सुविधाओं तथा मनोरंजन का भी खयाल रखना चाहिए जहां बुजुर्गो के लिए अपनी कम्युनिटी हॉल हो जहां वो बैठकर बात चित ,  भजन कीर्तन, पठन पाठन आदि कर सके ! साथ ही सरकारी तथा समाजसेवी संस्थानों को भी ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जहां बुजुर्गों के सुरक्षा,  सुविधा, एवं मनोरंजन की पूर्ण व्यवस्था हो ! बुजुर्गों के पास अनुभव बहुत रहता है सरकार को ऐसी व्यवस्था बनाना चाहिए जहां उनके अनुभवों का सदुपयोग हो सके जिससे उनकी व्यस्तता बनी रहे !
बुजुर्गों को अपने लिए कुछ पैसे बचाकर रखना चाहिए सबकुछ अपनी जिंदगी में ही औलाद के नाम नहीं कर देना चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर अपनी सेवा  - सुश्रुसा दवाइयों आदि में खर्च कर सकें !

जिन्हें अपनी संतान न हो उन्हें किसी भी बच्चे को गोद अवश्य ले लेना चाहिए ! क्यों कि जिनके औलाद नहीं होते उनके सम्पत्ति में हिस्सेदारी लेने तो बहुत से लोग आ जाते हैं परन्तु उनके सेवा सुश्रुसा का कर्तव्य निभाने के लिए बहुत कम लोग ही तैयार होते हैं !
एक ऐसी ही निः संतान अभागी बुढ़िया का शव मेरे आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूम रहा है जिसका शव पड़ा हुआ था और रिश्तेदारों में धन के लिये आपस में झगड़ा हो रहा था! कोई बैंक अकाउंट चेक कर रहा था तो कोई गहने ढूढ रहा था मगर जीते जी किसी ने उसकी देखभाल ठीक से नहीं की! सभी  एकदूसरे पर दोषारोपण करते रहे तथा कहते रहे कि जो सम्पत्ति लेगा वह सेवा करेगा लेकिन वो बूढ़ी चाहती थी कि मेरी सम्पति सभी को मिले क्यों कि जब अपना बच्चा नहीं है तो सभी रिश्तों के बच्चे बराबर हैं!
आज की परिस्थितियों में बुजुर्गों को थोड़ा उदार तथा मोह माया से मुक्त होकर संत हृदय का होना पड़ेगा अर्थात नौकर चाकर पर खर्च करना होगा जिससे उनकी ठीक तरीके से देखभाल हो सके! क्यों कि अक्सर देखा जाता है कि गरीब अपने  बुजुर्गों की सेवा तथा देखभाल तो स्वयं कर लेते किन्तु अमीरों को सेवा करने की आदत नहीं होती ऐसे में उन्हें सेवक पर ही निर्भर होना होता है और सेवक तो तभी मिलेंगे न जब कि खर्च की जाये! यदि बुजुर्ग स्वयं नहीं खर्च करते हैं अपना पैसा खुद पर तो उनकी संतानों को चाहिए कि अपने माता-पिता के लिए सेवक नियुक्त कर दें क्यों कि माता-पिता के सेवा सुश्रुसा का दायित्व तो उन्हीं का है यदि नहीं कर सकते तो किन्हीं से करवायें वैसे भी अपने पेरेंट्स के सम्पत्ति के उत्तराधिकारी तो वे ही हैं!
यह सर्वथा ध्यान रखना चाहिए कि कल को सभी को इसी अवस्था से गुजरना है, हम आज जो अपने बुजुर्गों को देंगे हमारी औलादें हमें वही लौटाएंगी !
माना कि समयाभाव है फिर भी कुछ समय में से समय चुराकर बुजुर्गों पर खर्च करना चाहिए जिससे हमें तो आत्मसंतोष मिलेगा ही.. बुजुर्गों को भी कितनी प्रसन्नता मिलेगी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है ..!
©किरण सिंह

Wednesday, 9 August 2017

अस्थाई प्रेम की परिभाषा

आज की पीढ़ी का दिल
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आज की पीढ़ी का दिल
कितना बड़ा है न
बिल्कुल कम्प्यूटर की तरह
जब जिसे चाहा
मेमरी कार्ड में
भर लिया
और जब जिसे चाहा
उसे उड़ा दिया
शायद
नहीं है इनका प्रेम
इमोशनल फूल
और
एक हमारा दिल
कितना छोटा था न
कि एक से अधिक
के लिए
जगह ही नहीं होता था

©किरण सिंह

Tuesday, 1 August 2017

यह भारत की बेटी है

यह भारत की बेटी है
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तोड़ देगी अब वर्जना
सुनो सिंहनी की गर्जना
बहुत कर ली माया मनमानी
लो समर में कूद पड़ी क्षत्राणी

लोलुप आँखें फोड़ देगी
बढ़ती बांहें को तोड़ देगी
स्वाभिमानिनी नेतृ है
यह भारत की बेटी है

अब बात आ गई आन पर
हर नारी के सम्मान पर
गंदी जुबां को काट देगी
मर्यादा को पाट देगी

बह चली बलिया की बयार
अबतक रोक नहीं कोई पाया है
लार्ड माउंटेन से इंदिरा गांधी तक को
हैसियत बतलाया है

छूट चुका है तीर कमान से
रोक सको तो रोक लो
चमक चमक समशीर कह रही
भारत वासी सीना ठोक लो

अब न रुकेंगे अब न झुकेंगे
हद हो गई अपमान की
चलो लगा दें मान की खातिर
बाजी अपने जान की
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©किरण सिंह With Rajendra Pratap Singh

सिर्फ खूबसूरती ही नहीं भाग्य भी बढ़ाता है सोलह श्रृंगार

औरत और श्रृंगार एकदूसरे के पूरक हैं अब तक तो यही माना जाता आ रहा है और सत्य भी है क्यों कि सामान्यतः औरतों को श्रृंगार के प्रति कुछ ज्यादा ही झुकाव होता है ! हम महिलाएँ चाहे जितना भी पढ़ लिख जाये, कलम से कितनी भी प्रसिद्धि पा लें लेकिन सौन्दर्य प्रसाधन तथा वस्त्राभूषण अपनी तरफ़ ध्यान आकृष्ट कर ही लेते हैं !भारतीय संस्कृति में सुहागनों के लिए 16 श्रृंगार बहुत अहम माने जाते थे
बिंदी
सिंदूर
चूड़ियाँ
बिछुए
पाजेब
नेलपेंट
बाजूबंद
लिपस्टिक
आँखों में अंजन
कमर में तगड़ी
नाक में नथनी
कानों में झुमके
बालों में चूड़ा मणि
गले में नौलखा हार
हाथों की अंगुलियों में अंगुठियाँ
मस्तक की शोभा बढ़ाता माँग टीका
बालों के गुच्छों में चंपा के फूलों की माला

सिर्फ खूबसूरती ही नहीं, भाग्य भी बढ़ाता है सोलह श्रृंगार एसी मान्यता है!
ऋग्वेद में सौभाग्य के लिए किए जा रहे सोलह श्रृंगारों के बारे में विस्तार से बताया गया है।
जहाँ बिंदी भगवान शिव के तीसरे नेत्र की प्रतीक मानी जाती है तो सिंदूर सुहाग का प्रतीक !
काजल बुरी नज़र से बचाता है तो मेंहदी का रंग पति के प्रेम का मापदंड माना जाता है!
मांग के बीचों-बीच पहना जाने वाला यह स्वर्ण आभूषण सिंदूर के साथ मिलकर वधू की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। ऐसी मान्यता है कि नववधू को मांग टीका सिर के ठीक बीचों-बीच इसलिए पहनाया जाता है कि वह शादी के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले और वह बिना किसी पक्षपात के सही निर्णय ले सके।

कर्ण फूल ( इयर रिंग्स) के पीछे ऐसी मान्यता है कि विवाह के बाद बहू को दूसरों की, खासतौर से पति और ससुराल वालों की बुराई करने और सुनने से दूर रहना चाहिए।

गले में पहना जाने वाला सोने या मोतियों का हार पति के प्रति सुहागन स्त्री के वचनवद्धता का प्रतीक माना जाता है!
पहले सुहागिन स्त्रियों को हमेशा बाजूबंद पहने रहना अनिवार्य माना जाता था और यह सांप की आकृति में होता था। ऐसी मान्यता है कि स्त्रियों को बाजूबंद पहनने से परिवार के धन की रक्षा होती और बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।
नवविवाहिता के हाथों में सजी लाल रंग की चूड़ियां इस बात का प्रतीक होती हैं कि विवाह के बाद वह पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। हरा रंग शादी के बाद उसके परिवार के समृद्धि का प्रतीक है।
सोने या चाँदी से बने कमर बंद में बारीक घुंघरुओं वाली आकर्षक की रिंग लगी होती है, जिसमें नववधू चाबियों का गुच्छा अपनी कमर में लटकाकर रखती हैं! कमरबंद इस बात का प्रतीक है कि सुहागन अब अपने घर की स्वामिनी है।
और पायल की सुमधुर ध्वनि से घर आँगन तो गूंजता ही था साथ ही बहुओं पर कड़ी नज़र की रखी जाती थी कि वह कहाँ आ जा रही है !
इस प्रकार पुरानी परिस्थितियों, वातावरण तथा स्त्रियों के सौन्दर्य को ध्यान में रखते हुए सोलह श्रृंगार चिन्हित हुआ था!
किन्तु आजकल सोलह श्रृंगार के मायने बदल से गये हैं क्योंकि आज के परिवेश में कामकाजी महिलाओं के लिए सोलह श्रृंगार करना सम्भव भी नहीं है फिर भी तीज त्योहार तथा विवाह आदि में पारम्परिक परिधानों के साथ महिलाएँ सोलह श्रृंगार करने से नहीं चूकतीं !
सोलह श्रृंगार भी हमारी संस्कृति और सभ्यता को बचाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है !

©किरण सिंह