Thursday, 24 August 2017

यकीन

यकीन
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अभी मीना को दुनिया छोड़े कुछ दो ही महीने हुए होंगे कि उसके  पति महेश जी का अपने बेटे के रिंग सेरेमनी में शामिल होने के लिए हमें निमंत्रण आया! जिस समारोह का मुझे बेसब्री से इंतजार था पर उस दिन मेरा मन बहुत खिन्न सा हो गया था तथा मन ही मन में महेश जी के प्रति कुछ नाराजगी भी हुई थी मुझे ! मैं सोचने लगी थी कि वही महेश हैं न जो अपनी माँ के मृत्यु के छः महीने बाद भी घर में होली का त्योहार नहीं मनाने दिये! घर के बच्चों ने भी तब चाहकर भी होली नहीं खेली थी और ना ही नये वस्त्र पहने थे ! याद आने लगा कि जब होली के दिन किसी ने सिर्फ टीका लगाना चाहा था तो ऐसे दूर हट गये थे जैसे कि किसी ने उन्हें बिजली की करेंट लगा दी हो, पर मीना के दुनिया से जाने के दो महीने बाद ही यह आयोजन........ मन तो हो रहा था कि उन्हें खूब जली कटी सुनाऊँ पर...! जाना तो था ही आखिर मीना मेरी पक्की सहेली जो थी .. इसके अलावा महेश जी और  मीना ने जो मेरे लिए किया उसे कैसे कभी भूल सकती थी कि जब मेरी ओपेन हार्ट सर्जरी दिल्ली में हुई थी तब ये लोग ही उस घड़ी में हर समय हमारे साथ खड़े रहे!
यह बात तो कभी भूलता ही नहीं जब मैं हास्पिटल में ऐडमिट थी और महेश जी हर सुबह और शाम एक ही बात कहते थे -  कि आप बहादुर महिला हैं ऐसे ही बहादुरी से रहियेगा और मोवाइल कट जाती थी! मुझे महेश जी के इन बातों से ढाढस तो बहुत मिलता था लेकिन मन ही मन अपने आप पर हँसी भी आती थी कि मैं वाकई अभिनय कला में निपुण हूँ कि किसी को मेरी घबराहट का एहसास तक नहीं होता था और फिर कुछ ही क्षणों बाद आँखों में आँसू छलछला जाता था जिसे मैं बड़ी मुश्किल से छुपा पाती थी!
अभिनय कला में तो पारंगत थी ही इस लिए चली गई सगाई में अपने होठों पर झूठी मुस्कुराहट के साथ ! सगाई समारोह बहुत ही भव्य तरीके से हुआ ! लेकिन समारोह में महेश जी को खुश देखकर मेरा मन अन्दर ही अन्दर दुखी हो रहा था! मन ही मन मैं सोचने लगी कि कितना अन्तर होता है न पुरुषों और स्त्रियों में!
ऐसी स्थिति में क्या मीना होती तो ऐसा कर पाती क्या... स्त्रियों के साथ तो ऐसी परिस्थितियों में  नियति के क्रूर चक्र के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों का भी दंश झेलना पड़ता है और अंतर्मन की पीड़ा तो मरण शैया तक या फिर मरणोपरांत भी नहीं छोड़ती है! छिः सभी पुरुष ऐसे ही होते हैं.. कुछ समय के लिए तो पूरी पुरुष जाति से नफरत सी होने लगी थी मुझे किन्तु मैं अपनी भावनाओं को छुपाने का भरसक प्रयास करती रही थी! मैं रिंग सेरेमनी समारोह में उपस्थित थी किन्तु मेरा मन तो मीना  के ख्यालों में ही खोया हुआ था... काश वो होती!
लेकिन मैं मन को सम्हालने में कामयाब हो गई थी कि चलो बहू तो काफी अच्छी है जिसे मीना ने खुद पसंद किया था!
समारोह सम्पन्न हुआ और हम सभी रिश्तेदार अपने - अपने घर वापस लौट आये!
फिर एक महीने के बाद मीना की बेटी का विवाह का निमन्त्रण भी आया ! तब भी मन दुखी हुआ था कि इतनी जल्दी क्या थी कम से कम साल तो लग जाने देते.....!
विवाह में भी हम पहुंचे ! विवाह की व्यवस्था देखकर तो मैं दंग रह गई सोंचने लगी कि ऐसी व्यवस्था तो शायद मीना होती तो भी नहीं हो पाती! महेश जी तथा उनके परिवार वाले स्वागत सत्कार में कहीं से भी किसी चीज की कमी नहीं होने दिये थे फिर भी खून के रिश्तों की भरपाई कहाँ किसी से हो पाती है इसीलिए मीना के सभी खून के रिश्तेदार रोने के लिए एकांत ढूढ लेते थे! और फिर हल्के होकर होठों पर कृत्रिम मुस्कान बिखेरते हुए मांगलिक कार्यक्रमों में शरीक हो जाते थे !

दिल्ली में रहते - रहते महेश जी भी पक्का दिल्ली वाले हो गये हैं इसीलिए तो अपने रस्मों को निभाने के साथ साथ कुछ दिल्ली के पंजाबियों के रस्म रिवाजों को भी अपना लिये
थे! विवाह के एक दिन पहले मेंहदी के रस्म के बाद शाम सात बजे से काकटेल पार्टी की व्यवस्था की गयी थी जो हम सभी के लिए कुछ नई थी! हर टेबल पर एक - एक बैरा तैनात थे, स्टार्टर के साथ - साथ कोल्डड्रिंक्स और दारू भी चल रहा था जहाँ मैं कुछ असहज सी महसूस कर रही थी! उसके बाद कुछ हम जैसों को छोड़कर सभी डांस फ्लोर पर खूब नाच रहे थे साथ में महेश जी भी कई पैग चढ़ाकर सभी के साथ नाच रहे थे और एक एक करके सभी को डांस फ्लोर पर ले गये और खूब नाचे..! पर मैं हर जगह अपनी बीमारी की वजह से बच जाती हूँ सो यहाँ भी मुझसे किसी ने भी जोर जबरजस्ती नहीं की.. लेकिन जब मीना का बेटा आया और बोला प्लीज मौसी जी आप भी फ्लोर तक चलिये.. उसके आग्रह को मैं नकार नहीं सकी और थोड़ा बहुत मैं भी ठुमका लगा ही ली !
सबसे ज्यादा खला फोटो खिंचवाते समय जब सभी पति पत्नी साथ होते थे और महेश जी अकेले ही हम सभी के साथ फोटो खिंचवा रहे थे !
अगले दिन विवाह का रस्म था जिसे महेश जी के भैया भाभी निभा रहे थे !
विवाह के दिन महेश जी को मैंने ज़रा उदास देखा तो दुख तो हुआ लेकिन उनकी उदासियों में मुझे हल्का सा सुकून भी मिल रहा था कि चलो मीना को याद तो कर रहे हैं न वे! विवाह बहुत ही अच्छे ढंग से सम्पन्न हो गया ! एक एक करके सभी रिश्तेदार जाने लगे जिनकी विदाई भी जीजा जी ने बहुत अच्छे सै किया!
मीना दी की माँ की जब जाने की बारी आई तो महेश जी उनका हाथ पकड़कर फफक फफक कर रो पड़े और सभी को रुला दिये! शायद सभी  मुस्कुराने का अभिनय करते  - करते थक चुके थे या फिर सभी के पलकों के तटबंध टूट चुके थे इसीलिए तो आँसुओं की बाढ़ सी आ गई थी तब ! महेश जी के आँसुओं ने हम सभी के दिलों के मैल को धो डाला था, एक-एक बात स्पष्ट होने लगी थी कि महेश जी तो मीना  के सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रहे थे! कि शायद मीना के द्वारा निर्धारित तिथि पर ही सभी मांगलिक कार्य सम्पन्न किये!
फिर याद आने लगीं मीना  की एक एक बातें
कि कितना शौक था अपनी बेटे के विवाह का!
ये खरीदूंगी, वो खरीदूंगी, ये पहनूंगी, ऐसे नाचूंगी, ऐसी व्यवस्था करूंगी आदि आदि ...............
और जैसे ही बात करने के बीच में  महेश जी आये तो अचानक चुप हो गयीं थी वे ... फिर महेश जी ने चुटकी लेते हुए कहा था.मेरी शिकायत हो रही थी क्या कि आते ही बन्द हो गयीं बातें .... तो फिर मीना ने बड़े प्यार से कहा था कि आपकी शिकायत कैसे कर सकती हूँ मैं भला... आप तो मेरे यकीन हैं! और शायद मीना अपने यकीन पर यकीन करके ही चली गयीं  |
और महेश जी भी उसके यकीन पर खरे उतरने में पूरी तरह से कामयाब हो गये !

©किरण सिंह

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