बिन आहट के चूड़ी , खनकती नहीं
जब देखूं तो पलकें , झपकती नहीं
भाव आतुर हुए. , गीतों में सज गए
मेरी बहकी कलम अब ठहरती नहीं
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©Copyright Kiran singh
Monday, 27 April 2015
मुक्तक
मुक्तक
फूल भावों के जब भी महक जाते हैं
वर्ण शब्दों में, ढलकर बहक जाते हैं
दिल धड़कते उन्ही से मचलते कभी
गीत घूंघरू में बंधकर छनक जाते हैं
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जीवन पथ
जीवन पथ एक अनुभव है
हर पड़ाव परिवर्तन है
लगातार चलते जाना
यही तो कहता जीवन है
लेखक तो लिख देता है
कहां कोई पढ़ लेता है
कब कहानी पूरी होगी
कौतूहल विजेता है
जीवन एक नदी सी है
चलती सांसे कस्तीसी है
कोई डुबा कोई पार किया
कोई तैराकी गुरु ज्ञान दिया
मन मतवाला मचला ना कर
कठपुतली तू नर्तन आ कर
खींचेगा वो डोर तुम्हारा
करो भरोसा खुद खुदा पर
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Wednesday, 22 April 2015
काश
काश
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चलती थी पहले भी
मेरी कलम
कर रही हूं
स्मरण
जिन्हें मैंने
डायरी के पन्नों पर
लिखे थे
कुछ स्मृतियाँ
घुटन महसूस कर रही हैं
आज भी
बंद आलमारी में
कुछ को
बेच दिए गए
कचरे के साथ
जिनमें अंकित थे
मेरे अनेकों
भाव
कुछ कस्ती बनकर
बह गए
सपनों के संग
और कुछ फाड़कर
उड़ा दिए गए
खिल्ली
भावनाओं की
बिवस
हम चुप सह जाते
काश
फेसबुक
तुम पहले आते
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Saturday, 18 April 2015
आओ हम सब मिलकर
आओ हम सब
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आओ हम सब मिलजुल कर
ऐसे घर का निर्माण करें
माँ भारती विराजे ऊपर
झुक दुनिया प्रणाम करे
विश्वास से नीव भरें हम
लौह प्रीति की ईंट बने हम
ज्ञान विज्ञान का दीप जलाएँ
त्याग समर्पण भीत बने हम
पूरब उत्तर के कोने पर
कर कृतिका मिट्टी सोने पर
कर स्थापित पूज्य भारती
करें आरती सांझ होनेपर
मन्दिर मस्जिद चर्च रहे और
सिक्खो का गुरुद्वारा हो
लहराता रहता छतपर
अपना तिरंगा प्यारा हो
हर दिल मे जलता रहता
राष्ट्र प्रेम का ज्वाला हो
एक जाति और एक धर्म का
राष्ट्र प्रेम रस प्याला हो
आओ हमसब मिलजुलकर
तूलिका पदचिन्ह बनाएँ
माँ का पाँव पड़े पहले
हम तिरंगा लिए लहराएँ
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भोर लालिमा लिए किरण
भोर लालिमा लिए किरण
मन में आस जगावत
निशा विदा होकर गई
दिवस अति मन भावत
चूचू कर चिड़िया आंगन में
मधुरम् मंगल गावत
उठो उठो अब भोर भयो कह
कर्म को पाठ पढ़ावत
हुआ स्फुर्त तभी तन मेरा
मन चंचल हो आवत
कर अग्रे वसते लक्ष्मी
मन आत्मसात करवावत
करमूले गोविंद देख कर
झुकी झुकी शीश नवावत
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©किरण सिंह