Saturday, 16 May 2015

काहे अतीत तोरी सुधि आए

काहे अतीत तोरी सुधि आए
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स्मृति वन में मन हिरण
करत रहत विचरण
सब जन बीच रहूँ हम तबहूँ
एकल मन होई जाए

काहे अतीत तोरी सुधि आए

राग गीत संगीत बजत हैं
किछु नाहीं मन भाए
सब जन झूम झूम नाचत हैं
म्हारो मन काहे कुम्हिलाए

काहे अतीत तोरी सुधि आए

करत रहत सब हंसी ठिठोली
म्हारो मन नैहर जाए
माटी चूल्ह माटी को बासन
खेलत ब्यजन पकाए

काहे अतीत तोरी सुधि आए

छाती पीर पाती में  लिखूं तब
नयन नीर झरि जाए
काहे न ईश कृपा करि हम पर
सखि तोसे देत मिलाए

काहे अतीत तोरी सुधि आए

सरल सभी जन मन निर्मल
नयन मा नेह भरि आए
छल प्रपंच से दूर बालपन
काहे न देत पुनि लौटाय

काहे अतीत तोरी सुधि आए
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©Copyright Kiran singh

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