Tuesday, 5 May 2015

चिट्ठी

चिट्ठी
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तू कवि है कविता मैं तेरी
लिखो मुझे पर चोरी - चोरी 
चमक चमक कर कहे बिंदिया 
तू है मेरा मैं हूँ तेरी

छनके पायल खनके चूड़ी
कहे जिया की.बात अधूरी
पलक बिछाए करे प्रतीक्षा
कजरारे से नयना मोरी

मैं ही लिखती हूँ करजोरी
समझो प्रिय मेरी मजबूरी
चिट्ठी पढ़ते ही आना तुम
वर्ना करूंगी मैं बलजोरी

नहीं चलेगा नया बहाना
मत कहना अब है मजबूरी
छोड़ो भी अब बात बनाना 
अब मिलना है बहुत जरूरी
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©किरण सिंह

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