Sunday, 3 May 2015

चाहा था मैंने पलकों में

चाहा था मैंने पलकों में
°°°°°°°°°°°°°°°°°°
चाहा था मैने पलकों में
सपनों का महल बनाना
तुम जो ठहरे छलिया ,
छल कर किया नया बहाना 

पहना कर पायल की बेड़ी
कंगन की हथकड़ियाँ
सिंदूरी सस्कृति से लिखकर
मुझे उम्र कैद कर लिया

मैं भी मूर्खा जो ठहरी
स्वीकृति कर नीयति को
मुस्कुरा कर चल पड़ी और
बदल दिया निज लक्ष्य को

नाक नथनी जंजीर रीति का
चूनर ओढ़ ली संस्कृति का
पारंपरिक करधनी पहन मैं
सम्हाला घर अपने पी का

अब तो न्याय करो न्यायधीश
मैने निभाया सातों वचन
गढ़ दिया काव्य नवल
अब तुम करो आत्ममंथन
*************************
© किरण सिंह

No comments:

Post a Comment