देखो सखि ऋतु राज आ गया
बासंती बयार आ गया
पीताम्बरी पुष्पित चुन्दरी
धरणी के मन को भा गया
कूके कोयलिया तान आ गया
गीतों मे सुर ताल .आ गया
बज उठी वीणा के .सरगम
जैसे उसमें प्राण ..आ गया
हवाओं में खुमार आ गया
प्रकृति को मुस्कान आ गया
बरसे मन प्रीत सावन
भीगना अब रास आ गया
मन में नव उल्लास आ गया
रचना मे अनुप्रास आ गया
ठहरी हुई लेखनी के
छन्द में रस श्रॄंगार आ गया
जीवन में रफ्तार आ गया
मुट्ठी में .संसार आ गया
वर्ण अक्षर छन्दों में सजगए
भावों का सैलाब आ गया
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© copyright @ Kiran singh
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