Wednesday, 7 January 2015

देखो सखि

देखो सखि ऋतु राज आ गया
बासंती बयार आ गया
पीताम्बरी पुष्पित चुन्दरी
धरणी के मन को भा गया

कूके कोयलिया तान आ गया
गीतों मे सुर ताल .आ गया 
बज उठी वीणा के .सरगम
जैसे उसमें प्राण ..आ गया 

हवाओं में खुमार आ गया
प्रकृति को मुस्कान आ गया
बरसे मन  प्रीत सावन
भीगना अब रास आ गया

मन में नव उल्लास आ गया 
रचना मे अनुप्रास आ गया
ठहरी हुई लेखनी के
छन्द में रस श्रॄंगार आ गया

जीवन में रफ्तार आ गया
मुट्ठी में .संसार आ गया
वर्ण अक्षर छन्दों में सजगए
भावों का सैलाब आ गया
  ***********;;*;****
© copyright @ Kiran singh

No comments:

Post a Comment