आज सोंचती हूँ कुछ अपने विषय में भी लिखूँ. :-)
याद है वो क्षण जब मेरे पिता ने मेरे हांथ में डायरी पकड़ाते हुए कहा था कि अभिव्यक्ति से सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण होता है ! तब मैं करीब दस वर्ष की थी और पांचवीं कक्षा में पढती थी .! कलम से कितनी ही बार मै लिख लिख कर काटती.. फिर लिखती फिर.........! मैं अपनी रचनाओं में कभी अपने विद्यालय को विषय बना देती थी तो कभी शिक्षक एवं शिक्षिकाओं को, तो कभी माता पिता और भाई बहनों पर ही काव्य गढ़ देती थी..कभी दहेज प्रथा पर तो कभी दाई नौकरों पर लिख दिया करती थी ! जब पहली बार मेरे स्कूल के पत्रिका में मेरी कविता छपी उस समय मुझे जो खुशी मिली थी उसका वर्णन मैं शब्दों में नहीं कर सकती ..............फिर चलती रही लेखनी रुक रुक कर ....!
साहित्य , संगीत और कला की तरफ बचपन से ही रुझान रहा है ! बी ए में मेरा विषय हिन्दी , मनोविज्ञान और सितार था !मै स्कूल और कालेज में खेलकूद , वादविवाद प्रतियोगिता , अंत्याक्षरी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती रही थी और पुरस्कृत भी होती रही थी !
जीव जन्तुओं से बचपन से ही प्रेम और सहानुभूति था ! एकबार मैं बचपन में बकरी कटते हुए देख ली , तब से मैंने मांसाहार छोड़ दिया और एक मुर्गा जो मेरे पास आकर छुप गया था जिसे काट कर खाने के लिए लाया गया था उसे मैंने बचा लिया नहीं काटने दिया ......तब मैं सरस्वती शिशु मंदिर में दूसरी कक्षा में पढती थी जहां कक्षा में जीवों पर दया करने का पाठ पढाया गया था !
वैसे तो मेरे पिता मुझे आगे पढ़ाना चाहते थे... मेरे लिए बहुत सारे सपने देखा करते थे किन्तु छह पुत्रियों के पिता की मैं ठहरी पहली संतान जो उनके पिता मन को सामाजिक दायित्व का बोध कराने लगा था..! जब घर में मेरे विवाह की बात चली तो बहुत ही परेशान हो गई और अपने मन में उठे हर भावों को लिख कर उनके टेबल पर रख दिया..! किन्तु पिता को परेशान नहीं देख सकती थी और विवाह के लिए आनाकानी नहीं की..! और मेरा विवाह १८ वर्ष की उम्र जब मैं बी ए के द्वितीय वर्ष में प्रवेश ही की थी कि १७ जून १९८५ में मेरा विवाह सम्पन्न हो गया !
शिव के नाम के समानार्थी मेरे पति का नाम ( श्री भोला नाथ सिंह ) जो अभी बिहार राज्य विद्युत बोर्ड में कार्यकापालक अभियन्ता हैं का स्वभाव भी कुछ शिव के समान ही है !अपने माता पिता की बड़ी संतान होने के साथ साथ मैं अपने सास ससुर की भी बड़ी और प्यारी बहू हूँ !
ईश्वर की कृपा से मुझे मायके और ससुराल दोनो ही जगह बहुत ही स्नेह और मान सम्मान मिला ! मैने भी बेटी, बहन , बहू और पत्नी की भूमिका इमानदारी से निभाया ! मैंने नौकरी करने की इच्छा जताई तो पतिदेव ने कहा तुम्हें नौकरी से जितना मिलेगा मुझसे ले लिया करना..! इसके पूर्व पिता ने भी कहा था कि शिक्षा दान किया जाता है बेचा नहीं जाता..! चूंकि मैं अपनी इच्छाओंमैं से अधिक अपनों के भावनाओं को तरजीह दी इसलिए अपनी स्थिति से समझौता कर उनकी इच्छा को सहर्ष स्वीकार कर लिया..!
२८ मार्च १९८८ में मुझे प्रथम पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम हमने कुमार ऋषि आनन्द रखा..! जाति पाति का भेदभाव के हूँ सख्त खिलाफ थे इसलिए नाम के साथ जाति का चिन्ह सिंह नहीं जोड़ा..! मै अपने सुन्दर संसार में खुद को भूलकर घर गृहस्थी में पूरी तरह से उलझ गई..! उसी बीच मैंने सितार से संगीत प्रभाकर भी किया ! २४ मार्च १९९४ में मुझे द्वितीय पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम कुमार आर्षी आनन्द है..!
बच्चों की परवरिश और पढाई लिखाई मेरी पहली प्रार्थमिकता रही ! किन्तु मेरी आत्मा जब जब सामाजिक कुरीतियाँ , भ्रष्टाचार , दबे और कुचले लोगों के साथ अत्याचार देखती तो मुझे बार बार पुकारती रहती थी कि सिर्फ घर परिवार तक ही तुम्हारा दायित्व सीमित नहीं है .......समाज के लिए भी कुछ करो .....निकलो घर की चौकठ से....! तभी एक दिन अचानक रात के करीब दो बजे मेरी सांसे तेजी से चलने लगीं जैसे बहुत तेजी से मीलों दौड़ कर चलती हैं..! फिर डाक्टर ने चेकप कर बताया कि मेरे हॄदय के वाल्व में छेद है......१३ फरवरी सन २००६ में मेरा ओपेन हार्ट सर्जरी ( स्कार्ट हार्ट हास्पिटल दिल्ली ) मे हुआ जिसमें मेरे हृदय का दो वाल्व बदला गया ...! अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ किन्तु अधिक भागदौड़ वाला काम नहीं कर सकती...!
बच्चे बड़े हो गए और उच्च शिक्षा के लिए बाहर चले गए ..! मैं थोड़ा खालीपन महसूस करने लगी .! कई बार बच्चों ने मुझे फेसबुक से जुड़ने की सलाह दी लेकिन मैने रूचि नहीं दिखाई..! अन्ततः मेरी बहन रागिनी सिंह ने जोड़ ही दिया फेसबुक से यह कहकर कि तुम अच्छा लिखती हो शायद तुम्हारे विचार लोगों को पसंद आए.........! पहले तो मैंने फेसबुक पर सिर्फ पांच मित्रों को ही जोड़ा जिसमें रागिनी दोनों बेटे और मेरे ममेरे भाई भाभी शामिल थे..! धीरे धीरे मैं अपने विचार और रचनाएँ पोस्ट करने लगी जिसे बच्चों ने भी लाईक किया..! जैसे जैसे आत्मविश्वास बढ़ने लगा मैने और मित्रों को भी मित्रता सूची में जोड़ना आरम्भ किया..! फेसबुक मित्रों द्वारा मेरी अभिव्यक्तियों को सराहना मिली और मेरा सोया हुआ कवि मन फिर से जाग उठा .....फिर करने लगी मैं भावों की अभिव्यक्ति..!
मेरे इस शौक को ध्यान में रखते हुए मेरा प्रथम पुत्र कुमार ॠषि आनन्द ने मेरे लिए उपहार स्वरूप टैबलेट भेट दिया जो मेरे पथ को और भी सरल बना दिया !फेसबुक मित्रों से मिली प्रेरक टिप्पणियाँ मेरा उत्साह वर्धन करने लगी और मुझे अधिक से अधिक लिखने को प्रेरित करने लगीं..!
पिता से मिली डायरी , पति से मिला प्रेम और पुत्र से मिले उपहार के फलस्वरूप मिल गई मुझे वो डगर जिसकी मुझे तलाश थी..! और मैं चल पड़ी इस डगर पर ... छपने लगीं पत्र पत्रिकाओं में मेरी अभिव्यक्तियाँ ! अब देखें कहाँ ले जाती हैं राहें..!
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किरण सिंह
Saturday, 17 January 2015
आत्मकथ्य
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