Saturday, 12 July 2014

आया सावन बहका बहका

आया सावन बहका बहका

बीत गए दिन रैन तपन .के
आया सावन बहका बहका
हरी चूनरी ओढ़.धरा.....ने
मुख पर ......घूंघट.लटका
आया सावन बहका बहका

इन्द्रधनुष ने बाण चलाया
सतरंगी रंग ......छलका
बदरी बीच झांकता रवि का
मुख मण्डल भी .....दमका
आया सावन बहका बहका

इठलाती ....पवन पुरवैया
संग लेकर रिमझिम बरखा
सोंधी मिट्टी के खुशबू .से
बन उपवन भी .....महका
आया सावन बहका बहका

हरी चूड़ियां खनक रही हैं
पैरों का पायल ...छनका
चलो सखी झूला झूलन को
मेरा भी मन ........बहका
आया सावन बहका बहका ...........किरण सिंह

Thursday, 10 July 2014

आपको ब्लॉक कर देते हैं

आजकल इलेक्ट्रानिक चीजों का ऐसा ऐसा नाम है कि पढ़े लिखे लोग भी कभी कभी बेवकूफ बन जाते हैं ....इसी अनुभव पर आधारित एक ....परिहास  ........
     <<<<<<<  फेसबुकिया बुखार  >>>>>>>>>>
आज के परिवेश में स्वतंत्रता का स्थान स्वछंदता ने लेली है .......रोक टोक तो किसी को बर्दाश्त ही नही ...............विशेष तौर पर आज की पीढ़ी को .......आज के जनरेशन कीसबसे बड़ी समस्या पेरेंट्स के सोशल नेटवर्किंग साइट फेफबुक से जुडने से है ..............पहले तो वे अपने पेरेंट्स को अपने फ्रेडलिस्ट में जोडते नहीं हैं .............और यदि जोड़ लिए तो ......उनका धमकी...........सुनिए...... एक परिहास.........

मेरे बड़े बेटे ने मुझे गिफ्ट में
     टैबलेट आया
बेटे के चाचा ने पूछा
      बेटा क्या ले आया
  मैंने गर्व से कहा
       बेटे ने टैबलेट लाया
  चाचा ने पूछा बेटे से
        बेटा टैबलेट का
   क्या काम है
          बेटे ने कहा आपको
   नहीं पता मम्मी को
          फेसबुकिया बुखार है...........किरण सिंह

<<<<<<<< आपको ब्लॉक कर देना है   >>>>>>>

एक दिन अपने छोटे बेटे को
          देर तक आनलाईन देखा
और सोचा अभी नासमझ है
           इस लिए मैंने उसे टोका
मैंने कहा बेटा तू पढ ले
            सुबह तुम्हारा टेस्ट है
  बेटे ने कहा इससे पहले
            आपको ब्लॉक करना बेस्ट है ..............किरण सिंह

Monday, 7 July 2014

क्यों आसमान तुम रोते हो

क्यों आसमान तुम रोते हो

हाथों में शशि दीप लिए
प्रहरी तारे चौकन्ने... हैं
नीरवता स्वयं चल आई
फिर भी नहीं तुम सोते हो
क्यों आसमान तुम रोते हो

धीर धरा का देखो कैसे
पीड़ा में मुस्कुरा रही है
भेद सारे छुपा...रही है
तुम क्यों विचलित होते हो
क्यों आसमान तुम रोते हो

लुकछुप खेल रहे रवि भी हैं
सब कुछ देख रही धरती है
बदरी के शीतल समुद्र ..में
लगा रहे तुम गोते ......हो
क्यों आसमान तुम रोते हो

क्यों आसमान तुम रोते हो .................किरण सिंह

Friday, 4 July 2014

अतीत

फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

भागता सा शहरी जीवन
छूटता ग्रामीण ..उपवन
वो सहजता वो सरलता
गावों का चित्रण करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

आँखों में वो स्नेह अब कहाँ
अपनापन वो स्पर्श में. कहाँ
निश्छल सा वो स्नेह सरल
मन शीतल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

दादी की परियों की कहानी
नानी रामायण को ...गाती
मधुर मधुर उनकी स्वर लहरी
कर्णों में गुंजन करता.... है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

गुड्डे गुड़ियों संग खेलना
दियों की तराजू में तोलना
मिट्टी के वे सभी खिलौने
आज मन चंचल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है
फुर्सत के ..................

©किरण सिंह

माँ का आँचल

!!! माँ का आंचल!!!
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चरणों में संसार है माँ
सतत तुझे प्रणाम है माँ
लोरी गाकर हैं सुलाती
माँ तेरी पावों की पायल
छत्रछाया है माँ तेरा आँचल

सब बलाएँ लेती हो तुम
और दुआएं देती हो .तुम
बुरी नजर से बचाए
रखती तेरे नयनों का काजल
छत्रछाया है माँ तेरा आँचल

मुश्किल में पाषाणी सी
दुख हरणी कल्याणी सी
उर से पावन स्नेह छलक
ज्यों अश्रुधार गंगाजल
छत्रछाया है माँ तेरा आंचल

जब दुनिया जलती आंव सी
तब ममता तेरी छांव सी
स्पर्श मरहम सा तुम्हारा
जब कभी हुआ मन घायल
छत्रछाया है माँ तेरा आँचल
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© Copyright Kiran singh

अगली जीत तुम्हारी है

कोशिश
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मत घबराना एक हार से
बारी तो आनी जानी है
कोशिश जारी रखोगे .तो
अगली .जीत तुम्हारी .है

रणक्षेत्र सा यह जीवन है
युद्ध यहाँ  करना ही होगा
कुशल युद्ध नीति का परिचय
रणवीर तुम्हें फिर देना होगा

पथ पर कंटक बिछ भी गए
तो फिर क्या तुम रुक जाओगे
हॄदय तीर से छलनी भी हों
फिर भी तुम क्या झुक जाओगे

शस्त्र उठाओ हे रणवीरो
यहाँ हर रीति पुरानी.है
कोशिश जारी रखोगे .तो
अगली जीत तुम्हारी .है
...................................
©copyright Kiran singh