Friday, 4 July 2014

अतीत

फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

भागता सा शहरी जीवन
छूटता ग्रामीण ..उपवन
वो सहजता वो सरलता
गावों का चित्रण करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

आँखों में वो स्नेह अब कहाँ
अपनापन वो स्पर्श में. कहाँ
निश्छल सा वो स्नेह सरल
मन शीतल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

दादी की परियों की कहानी
नानी रामायण को ...गाती
मधुर मधुर उनकी स्वर लहरी
कर्णों में गुंजन करता.... है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है

गुड्डे गुड़ियों संग खेलना
दियों की तराजू में तोलना
मिट्टी के वे सभी खिलौने
आज मन चंचल करता है
फुर्सत के क्षण मन अतीत में विचरण करता है
फुर्सत के ..................

©किरण सिंह

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