Monday, 7 July 2014

क्यों आसमान तुम रोते हो

क्यों आसमान तुम रोते हो

हाथों में शशि दीप लिए
प्रहरी तारे चौकन्ने... हैं
नीरवता स्वयं चल आई
फिर भी नहीं तुम सोते हो
क्यों आसमान तुम रोते हो

धीर धरा का देखो कैसे
पीड़ा में मुस्कुरा रही है
भेद सारे छुपा...रही है
तुम क्यों विचलित होते हो
क्यों आसमान तुम रोते हो

लुकछुप खेल रहे रवि भी हैं
सब कुछ देख रही धरती है
बदरी के शीतल समुद्र ..में
लगा रहे तुम गोते ......हो
क्यों आसमान तुम रोते हो

क्यों आसमान तुम रोते हो .................किरण सिंह

No comments:

Post a Comment