सुप्त चेतना जागरण के लिए कलम चलती रहेगी
लक्ष्य की तरफ वो अपने , निरन्तर बढ़ती रहेगी
अवरोधक बिछे ज्यों कंटक. पांव चूमते अगर हैं
रक्त में ही डूबकर नए छन्द , कलम गढ़ती रहेगी
***********************
©Copyright Kiran singh
Saturday, 28 February 2015
मुक्तक
रिश्तों में
रिश्तों में कुछ मधु घोलकर , प्रेम प्याला में पिला दिया
चाहे जिसने याद रखा हो , या फिर मुझको भुला दिया
स्मृतियों में अंकित है मेरे , आप सभी का अपनापन
लो आ गई मैं लौटकर , लेकर अपनी अभिव्यक्तियां
***********************
©Copyright Kiran singh
रंगों की सौगात लेकर
रंगों की सौगात लेकर
आई होली आई
शीत बिटिया दूल्हन सकुचाई
रंगों में रंग सब सखि नहलाई
पिया मिलन को कर तैयारी
सज धज कर गोरी आई
रंगों की सौगात ..........
रंग रंगे बाराती संग
मस्त हुए वे पीकर भंग
ढोल मजीरा बाजन लागे
सखि सब भी मंगल गाई
रंगों की सौगात...............
आँखों में भर कारे काजर
पांवो में भर लाल महावर
गाल गुलाबी हुए शरम से
लाल अधर मुस्काई
रंगों की सौगात.........
धरा सजी रंगीन सेज सी
प्रकृति सुन्दरी लगती प्रेयसी
इठलाती बलखाती गोरी सी
फागुन लेती अंगड़ाई
रंगों की सौगात..............
***********************
©Copyright Kiran singh
होरी गाएं
क्यों न रंगाएं
*********
मधुरिम मधुकर मधुबन गुंजन
हर्षित हो मन करता नर्तन
देखत स्वप्न नयन अति सुन्दर
ऋतु फागुन रंग लागे बरसन
होरी खेलत हैं ब्रज बाला
कृष्णा रंग में भीग गयीं हैं
कोरा मन रंगन अकुलाई
देख श्याम को रीझ गयीं है
प्रीत रंग बरसन लागे
भीगन को मन भया विवश
गारी गा कुण्ठा झुलसे
मिटती कटुता हरसे अंतस
जुगलबंदी पी संग मन भाए
चलो सखी हम होरी गाएं
तन मन कोरा रह नहीं जाये
सभी रंगों में चलो रंगाएं
©किरण सिंह
Friday, 13 February 2015
जीवन के गीतों में
जीवन के गीतों के
जीवन के गीतो के
आरोह और अवरोहों में
मेरा समर्पण
पकड़
चल रही सांसों की
सरगम निरन्तर
सुन्दर
तुम्हारे मन्द्र सप्तक के
स्वर
मेरे तार सप्तक के स्वरों से
मिलकर
मध्य सप्तक को पकड़
गढ़ जाते हैं राग एक
सुन्दर
खनक कंगन
छनक पायल
तोड़ तुम्हारे नींद निशा में
भर श्रॄंगार रस
लिखा काव्य
मन से गढ़
सुन्दर
कुछ तुम कहकर
कुछ हम सहकार
प्रेम का समन्वय यह
जीवन
चल रहा है
बहती सरिता सी
छल छल
निर्मल
सुन्दर
……………………………………………
© copyright @ Kiran singh
Wednesday, 11 February 2015
उलझन
!!!!!!!!!!!!!!! उलझन !!!!!!!!!!!!!!!!!
**************************:
एक शहर में सावन बरसे दूसरे में है तपन
किस शहर में मैं रहूँ उलझन में है मन
एक शहर में कामना तो दूसरे में है समर्पण
एक शहर में ज्योति है तो दूसरे में जीवन
विवश हो बढ़ चले कदम एक शहर की ओर
दूसरा शहर है खींचे मेरे मन की डोर
एक शहर में है मुझे ज्योति अभी जलाना
दूसरे शहर में है जिंदगी सजाना
प्रश्न कर रहा मेरा मन , मैं बढू किस ओर
कैसे दे उत्तर हृदय किस पथ को दे छोड़
*********************************
© copyright @ Kiran singh
Sunday, 8 February 2015
सर्जरी से पहले
वेदना पिघल कर आँखों से छलकने को आतुर थीं.. पलकें अश्रुओं को सम्हालने में खुद को असहाय महसूस कर रही थीं...जी चाहता था कि कोई अकेला कुछ देर के लिए छोड़ देता कि जी भर के रो लेती..........फिर भी अभिनय कला में निपुण अधर मुस्कुराने में सफल हो रहीं थीं ..बहादुरी का खिताब जो मिला था उन्हें....! कैसे कोई समझ सकता था कि होठों को मुस्कुराने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ रहा था...! किसी को क्या पता था कि सर्जरी से पहले सबसे हँस हँस कर मिलना और बच्चों के साथ घूमने निकलना , रेस्तरां में मनपसंद खाना खाते समय मेरे हृदय के पन्नों पर मस्तिष्क लेखनी बार बार एक पत्र लिख लिख कर फाड़ रही थी... कि मेरे जाने के बाद.................!
ग्यारह फरवरी २००६ रात करीब आठ बजे बहन का फोन आया... पति ने बात करने के लिए कहा तब आखिरकार छलक ही पड़े थे नयनों से नीर.... और रूला ही दिए थे मेरे पूरे परिवार को... नहीं सो पाई थी उस रात को मैं .. कि सुबह ओपेन हार्ट सर्जरी होना था.... सुबह स्ट्रेचर आता है... उसपर मुझे लेटा दिया जाता है.... कुछ दूर चलकर स्ट्रेचर वापस आता है कि सर्जरी आज नहीं होगा......! कुछ लोगों ने तो अफवाह फैला दिया था कि डॉक्टर नरेश त्रेहान इंडिया पाकिस्तान का क्रिकेट मैच देखने पाकिस्तान जा रहे हैं..!
तब तो मुझे एक बहाना मिल गया था हॉस्पिटल से भागने का........ गुस्से से चिल्ला पड़ी थी मैं .. डॉक्टरों की टीम आ पहुंची थी मुझे समझाने के लिए....... तभी डॉक्टर नरेश त्रेहान भी आ पहुंचे थे......और समझाने लगे थे कि मुझे इमर्जेंसी में बाहर जाना पड़ रहा है... मैं चाहता हूँ कि मेरे प्रेजेन्स में ही आपकी सर्जरी हो............... .....!
Monday, 2 February 2015
हीरा
हीरा
************
खादानों में
कोयले के साथ दबे
हीरे को कहाँ पता था
कि कभी कोई
जौहरी
उसे तराश कर
इतना चमका देगा
कि
वह सुशोभित होगा
राजमुकुटों में
जड़ा जाएगा
गहनों में
वह भी तो भयभीत था कि
कि मैं भी
किसी दिन
झोंक दिया जाऊंगा
दहकती भट्ठी में
चमककर
राख हो जाएगा
मेरा भी
अस्तित्व
पर
खुदा के दरबार में देर भले ही है
अंधेर कहां
भेज ही देता है वो
अपने बंदे को
जो तराश कर
चमका ही देता है
कभी न कभी
धैर्य रख
हीरे की तरह
यकीं कर
खुद और
खुदा पर
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
© copyright Kiran singh