हीरा
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खादानों में
कोयले के साथ दबे
हीरे को कहाँ पता था
कि कभी कोई
जौहरी
उसे तराश कर
इतना चमका देगा
कि
वह सुशोभित होगा
राजमुकुटों में
जड़ा जाएगा
गहनों में
वह भी तो भयभीत था कि
कि मैं भी
किसी दिन
झोंक दिया जाऊंगा
दहकती भट्ठी में
चमककर
राख हो जाएगा
मेरा भी
अस्तित्व
पर
खुदा के दरबार में देर भले ही है
अंधेर कहां
भेज ही देता है वो
अपने बंदे को
जो तराश कर
चमका ही देता है
कभी न कभी
धैर्य रख
हीरे की तरह
यकीं कर
खुद और
खुदा पर
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© copyright Kiran singh
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