क्यों न रंगाएं
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मधुरिम मधुकर मधुबन गुंजन
हर्षित हो मन करता नर्तन
देखत स्वप्न नयन अति सुन्दर
ऋतु फागुन रंग लागे बरसन
होरी खेलत हैं ब्रज बाला
कृष्णा रंग में भीग गयीं हैं
कोरा मन रंगन अकुलाई
देख श्याम को रीझ गयीं है
प्रीत रंग बरसन लागे
भीगन को मन भया विवश
गारी गा कुण्ठा झुलसे
मिटती कटुता हरसे अंतस
जुगलबंदी पी संग मन भाए
चलो सखी हम होरी गाएं
तन मन कोरा रह नहीं जाये
सभी रंगों में चलो रंगाएं
©किरण सिंह
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