Friday, 14 November 2014

खग मन

!!!!!!! खग मन !!!!!!!
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चंचल यह खग मन  
कागज की कस्ती सी 
करता स्मृति में विचरण  
निर्झर बहती दी सी 
बनाते थे बालू से घर
बूनते थे सुन्दर स्वप्न
करके आँखें अपनी बन्द
भविष्य निधि में भरते थे रत्न
कहाँ गये वो पल
प्रश्न उठता है रह रह कर
खुश हो जाता है मन
अतीत का चित्र देख सुन्दर
धीरे धीरे बढ़े हैं पग
पथ ले जाए अब जहां
सोचता है मन कभी
कि अतीत लौटेगा कहाँ 
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© copyright @ Kiran singh
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