सखि काहे तोरी सुधि आए
स्मृति वन में मन हिरण
करत रहत विचरण
सब जन बीच रहूँ हम तबहूँ
एकल मन होई जाए
सखि काहे तोरी सुधि आए
राग गीत संगीत बजत हैं
किछु नहीं मन भाए
सब जन झूम झुम नाचत हैं
म्हारो मन नाहीं हरसाए
सखि काहे तोरी सुधि आए
करत रहत सब हंसी ठिठोली
म्हारो मन नैहर जाए
माटी चूल्ह माटी को बासन
खेलत ब्यजन पकाए
सखि काहे तोरी सुधि आए
छाती पीर पाती में लिखूं तब
नयन नीर झरि जाए
काहे न ईश कृपा करि हम पर
सखि तोसे देत मिलाए
सखि काहे तोरी सुधि आए
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©Copyright Kiran singh
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