Monday, 24 November 2014

सखि काहे

सखि काहे तोरी सुधि आए

स्मृति वन में मन हिरण
करत रहत विचरण
सब जन बीच रहूँ हम तबहूँ
एकल मन होई जाए

सखि काहे तोरी सुधि आए

राग गीत संगीत बजत हैं
किछु नहीं मन भाए
सब जन झूम झुम नाचत हैं
म्हारो मन नाहीं हरसाए

सखि काहे तोरी सुधि आए

करत रहत सब हंसी ठिठोली
म्हारो मन नैहर जाए
माटी चूल्ह माटी को बासन
खेलत ब्यजन पकाए

सखि काहे तोरी सुधि आए

छाती पीर पाती में  लिखूं तब
नयन नीर झरि जाए
काहे न ईश कृपा करि हम पर
सखि तोसे देत मिलाए

सखि काहे तोरी सुधि आए
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©Copyright Kiran singh

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