!!!!!! क्यों न तुझे ही !!!!!!
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शब्द चुनकर छन्द में गढ
उठे मन के भावना भर
सुन्दर सॄजन कर डालूं
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ
कोरा कागज़ मन मेरा है
जहाँ बेरंग चित्र तेरा है
भर प्रीत रंग चित्र रंगा लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ
नित्य भोर उठ कर्म भैरवी
प्रार्थना नित करूँ पैरवी
दिए गए कुछ वचन निभा लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ
शाम सुरीली साज सजी है
जुगलबंदी सुर ताल बजी हैं
रागिनियाँ संग राग मिला लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ
रात चाँद और तारे प्रहरी
नयन देखते स्वप्न सुनहरी
तुम रूठो मैं तुझे मना लूँ
क्यों न तुझे ही विषय बना लूँ
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© copyright Kiran singh
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