!!!!जिन्दगी का हुनर !!!!!
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जिन्दगी का हुनर सीखकर
तय करती रही मैं सफ़र
खुशियों को लुटाती रही मैं
रह गए कुछ गम बचकर
गिला भी करूँ क्यूं किसी से
खुश हूँ आदत से मजबूर होकर
घर दियों से सजाती रही हूँ
चाहे बह जाए मोम पिघलकर
गूथती रही प्रेम धागों से माला
कहीं मुरझा न जाएँ वो खिलकर
खुशियों को समेटा है मैंने
निभाया है रिश्ते सम्हलकर
पलकों ने अश्रुओं को सम्हाला
गिर न पाएं कहीं वो छलककर
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© copyright Kiran singh
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