Tuesday, 7 October 2014

कोयला

कोयला
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क्यों न जले कोयला
कभी क्रोध में
कभी
हीरे से बिछडकर
विरह में
तो कभी ईर्ष्या अग्नि में
कि सबके काम
आता है वो
फिर भी हीरे को सहेजा
जाता है
और उसे जलाया
जाता है
सोंचता है
जलना ही है उसकी
नियति
कोसता है
अपने आप को कि
आह
क्या है भाग्य है हीरे का
साथ ही तो था मेरे
वो भी, काला
काश
कोई जौहरी मुझे भी
तराश कर
चमका देता
बना देता मुझे भी कीमती
सजा देता
राज मुकुट में
मूर्ख
कोयले को नहीं पता
कि सिर्फ साथ रहने से
वो
हीरा नहीं है
कौन समझाए
उसे
कि वह है ही
जलने के लिए
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© copyright Kiran singh

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