Tuesday, 28 October 2014

दहेज

एक परीचित अपने बेटे के विवाह का आमन्त्रण कार्ड लेकर मेरे घर आए थे और आत्मप्रशंसा किए जा रहे थे ! मैं उनकी आतमकथा ध्यान पूर्वक सुन रही थी !
मैंने उन लोगों को चाय का कप पकडाते हुए व्यंग्यात्मक लहजे में पूछ ही लिया -  तिलक त ढेरे मीलत होई  ? ( दहेज़ तो काफ़ी मिल रहा होगा  )
तब वो सज्जन बड़े ही मासूमियत से बोले जा रहे थे-ना ना कूछू ना हम त लइकी वाला लोग के साफे कह दीहनी हं कि देखी हामरा कुछ चाही उही ना खाली आपना लड़की केपचास भर सोना के गहना ,   बारात के खर्चा बर्चा खातिर दस बारह लाख ले रूपया , अउरी जब हम आतना कह दीहनी तब हामार पत्नी खाली अतने कहली कि हामारा हीत नाता , आ बेटी दामाद लोग के बिदाई खातिर हामरा हांथ में तीन चार लाख दे देब  ( नहीं कुछ नहीं हमने तो लड़की वालों से कह दिया है कि हमें कुछ नहीं चाहिए , सिर्फ लड़की के जेवर के लिये पचास भर सोना , बारात का पूरा खर्चा- बर्चा , बारातियों का अच्छी तरह से स्वागत - सत्कार और अच्छी तरह बारातियों की बिदाई कर दीजिएगा , और जब हमनें यह सब कह दिया तो अन्त में मेरी पत्नी बस इतना ही  कहीं कि हमारे रिश्तेदारों का बिदाई जो हम करेंगे उसके लिए सिर्फ तीन चार लाख दे दीजिएगा )और फिर उनकी पत्नी मेरी तरफ मुखातिब होकर बोलने लगी - बताईं जी अब बेटो के बियाह में घरे से खार्चा करीं ?  (  बताइए जी अब बेटे की शादी में भी घर से खर्च करें  ?
हम उनकी बातों को अपनी हंसी रोकते हुए सुन रहे थे और हमें हां में हां मिलाना पड़ रहा था क्यों कि कौन उन्हें बेकार का उपदेश देकर उनकी खुशी में खलल डालता , लेकिन मन ही मन सोंच रहे थे कि लोग बेटे की छट्ठी , जन्मदिन , और पढाई लिखाई आदि का खर्च तो खुद उठाते हैं तो फिर विवाह का खर्च खुद क्यों नहीं उठा सकते ?
किरण सिंह

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