!!!!!!!!!!!!!!!!प्रश्नचिन्ह!!!!!!!!!!!!!!!!!
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राष्ट्र की अखंडता पर फिर से प्रश्नचिन्ह है
बंट रहे हैं जाति धर्म सबके मत भिन्न है
भाग रहे लोग सब , .मुकाम की तलाश में
छोड़कर जमीन को वो , उड़ रहे आकाश में
जनतंत्र के देश में , जनता बेचारी है खड़ी
डालरों की दौड़ में , रुपया लाचार है पड़ी
कृषि प्रधान देश में क्यों कृषकों..की दुर्दशा
रोटी के लाले पड़े हैं ,किन्तु बढ़ रहा नशा
झूठ के बाजार में ,.. सच का भाव मन्द है
दिमाग सब चला रहे , दिल का द्वार बन्द है
बढ़ रहा अधर्म , आस्था का हुआ खण्ड है
धर्म के नाम पर , हो रहा.......पाखण्ड है
कानून व्यवस्थाओं को , . तोड़ रहा तंत्र है
न्याय के विरुद्ध , अन्याय का षड्यंत्र है
अधिकार मांग रहे सभी , कर्तव्य याद नहीं
कैसे रूके भ्रष्टाचार, सुने कोई फरियाद नहीं
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Copyright © Kiran singh
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